जन्म ------ १८ सितंबर १९४९
| प्रीति सिंह |
लोग अक्सर मुझे और जावेद को एक परफेक्ट कपल या रोल मॉडल कहते हैं, लेकिन सच तो ये है कि अगर शादी के शुरुआती सालों में हम दोनों ने एक-दूसरे का मर्डर न करने का फैसला नहीं लिया होता, तो आज हम इस मुकाम पर नहीं होते!"
ये किसी फिल्म का डायलॉग नहीं है बल्कि खुद दिग्गज अभिनेत्री शबाना आज़मी का अपनी शादीशुदा जिंदगी को लेकर दिया गया एक बयान है जो उन्होंने किसी इंटरव्यू में दिया था।
आज जब पूरी दुनिया शबाना जी के जन्मदिन पर उनकी बेमिसाल एक्टिंग और पांच नेशनल अवॉर्ड्स की चर्चा कर रही है, तब उनके इस बयान के पीछे छिपा दर्द और संघर्ष देखना बेहद जरूरी हो जाता है।
दरअसल, शबाना आज़मी को निजी जिंदगी में भी काफ़ी इम्तिहान देने पड़े हैं।
शबाना आज़मी का जन्म भले ही हैदराबाद में हुआ, लेकिन उनका बचपन मुंबई के एक कम्युनिस्ट कम्यून में बीता, जहाँ उनका घर का नाम मुन्नी था। उनके पिता कैफ़ी आज़मी और मां शौकत आज़मी कम्युनिस्ट पार्टी के इतने सक्रिय सदस्य थे कि घर में हमेशा बौद्धिक बहसें चलती थीं।
लेकिन इस माहौल के पीछे एक कड़ा आर्थिक संघर्ष भी छिपा था।
शबाना आज़मी का पूरा परिवार एक ऐसे घर में रहता था जहाँ 8 परिवारों के बीच सिर्फ एक ही टॉयलेट और बाथरूम हुआ करता था।
हालात इतने तंग थे कि अपनी जेब खर्च निकालने और मां की मदद करने के लिए कॉलेज के दिनों में शबाना आज़मी ने पेट्रोल पंप पर जाकर तीन महीने तक कॉफी बेचने का काम भी किया था।
इस तंगहाली के बीच भी उन्होंने अपनी पढ़ाई से समझौता नहीं किया और मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से मनोविज्ञान में ग्रेजुएशन पूरा किया। दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में उनका इरादा कभी एक्ट्रेस बनने का था ही नहीं।
लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था
कॉलेज के बाद एक बार उन्होंने फिल्म इंस्टीट्यूट की एक डिप्लोमा फिल्म सुमन देखी। इस फिल्म में जया भादुड़ी की एक्टिंग को देखकर शबाना इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने उसी पल फैसला कर लिया कि वह सिर्फ और सिर्फ अभिनय की दुनिया में ही अपना करियर बनाएंगी।
इसके बाद उन्होंने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में दाखिला लिया और अपनी प्रतिभा के दम पर वहां गोल्ड मेडल हासिल किया।
जब वे एफटीआईआई में पढ़ रही थीं तब उनकी मुलाकात थियेटर और फिल्म अभिनेता बेंजामिन गिलानी से हुई, जो वहां उनके क्लासमेट थे। साथ में एक्टिंग सीखते, पढ़ते-पढ़ते दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो गया।
1970 के दशक में शुरू हुआ यह कॉलेज का प्यार इतना परवान चढ़ा कि दोनों ने सगाई कर ली। लेकिन सगाई के कुछ समय बाद ही शबाना आज़मी को उनकी पहली फिल्म अंकुर के लिए नेशनल अवॉर्ड मिल गया और वह रातों-रात स्टार बन गईं।
उन दिनों फिल्मी गलियारों में चर्चाएं रही कि शबाना की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता इस रिश्ते के आड़े आ गई, जिससे दोनों के बीच दूरियाँ बढ़ गई और आखिरकार दोनों की सगाई टूट गई।
बेंजामिन से सगाई टूटने के बाद शबाना जी की जिंदगी में एंट्री हुई शेखर कपूर की, जो उस वक्त फिल्मों में बतौर एक्टर हाथ आजमा रहे थे। दोनों ने फिल्म टूटे खिलौने में साथ काम किया और यहीं से प्यार की शुरुआत हुई।
इन दोनों का प्यार इतना गहरा था कि उस रूढ़िवादी दौर में भी दोनों ने समाज की परवाह न करते हुए लगभग 7 सालों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का साहसी फैसला किया।
जिसमें से 5 साल वे एक ही छत के नीचे रहे.
दोनों का ये रिश्ता पर्सनल ही नहीं, प्रोफेशनल तौर पर भी बेहद गहरा था.
जब शेखर कपूर ने डायरेक्टर के रूप में अपनी मशहूर फिल्म मासूम बनाई, तो उन्होंने शबाना को ही लीड एक्ट्रेस चुना।
फिल्म सुपरहिट रही और दोनों का रिश्ता शादी के मुहाने तक पहुंच गया था। लेकिन समय के साथ उनके बीच वैचारिक मतभेद इतने बढ़ गए कि यह रिश्ता शादी के मंडप तक पहुंचने से पहले ही टूट गया।
इस ब्रेकअप का दर्द इतना गहरा था कि शबाना जी और शेखर कपूर ने इसके बाद लगभग 40 सालों तक कभी साथ काम नहीं किया.
शेखर कपूर से अलग होने के बाद शबाना आज़मी अंदर से काफी टूट चुकी थीं, लेकिन तभी उनकी जिंदगी में एक ऐसे शख्स की एंट्री हुई जो उनका आखिरी हमसफर बनने वाला था यानी जावेद अख्तर।
जावेद साहब अक्सर उनके पिता कैफ़ी आज़मी से मिलने उनके घर आते थे, और यहीं से दोनों में प्यार हो गया। लेकिन दिक्कत यह थी कि जावेद साहब पहले से शादीशुदा थे और दो बच्चों के पिता थे। शबाना आज़मी के पिता कैफ़ी आज़मी इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी किसी का घर तोड़े। इस बगावती इश्क की वजह से शबाना को समाज में काफी बदनामी झेलनी पड़ी।
खुद शबाना ने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि उस वक्त उन्हें ऐसा लगा था जैसे वह किसी दूसरी औरत का घर तोड़ रही हैं। लेकिन दोनों का प्यार सच्चा था, इसलिए तमाम विरोधों के बावजूद उन्होंने शादी कर ली।
तमाम मुश्किलों को झेलकर जावेद साहब से निकाह करने के बाद भी शबाना आज़मी की निजी जिंदगी का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। दोनों की अपनी कोई संतान नहीं हुई।
शबाना आज़मी ने एक इंटरव्यू में इनफर्टिलिटी (बांझपन) के दर्द को बयां करते हुए कहा था कि हमारा समाज महिलाओं को यह अहसास कराता है कि यदि वे बच्चे को जन्म नहीं दे सकतीं, तो वे अधूरी हैं।
हालांकि, उन्होंने सरोगेसी या बच्चा गोद लेने का रास्ता नहीं चुना क्योंकि जावेद के बच्चों फरहान और जोया अख्तर ने उन्हें कभी मां के खालीपन का अहसास होने ही नहीं दिया।
समय के साथ उन्होंने जावेद की पहली पत्नी हनी ईरानी के साथ भी अपने रिश्ते इतने अच्छे कर लिए कि आज पूरा परिवार हर सुख-दुख में एक साथ खड़ा रहता है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि शबाना आज़मी का परिवार बॉलीवुड के कई बड़े सितारों से सीधे जुड़ा हुआ है।
मशहूर अभिनेत्री तब्बू और उनकी बहन फराह नाज़, शबाना आज़मी के भाई की बेटियां हैं। और एक्ट्रेस तनवी आज़मी उनके भाई बाबा आज़मी की पत्नी हैं।
निजी जिंदगी के इतने उतार-चढ़ावों के बावजूद शबाना आज़मी सोशल एक्टिविज्म भी करती हैं। जब मुंबई के कोलाबा में झुग्गी-झोपड़ियों को उजाड़ा जा रहा था, तब उन्होंने गरीबों के हक के लिए 5 दिनों तक लगातार भूख हड़ताल की, जिसके आगे सरकार को झुकना पड़ा।
और विस्थापितों को जमीन देनी पड़ी. वो आज भी निवारा हक नामक संस्था चलाती हैं.
उनके इसी जज्बे और सामाजिक कार्यों को देखते हुए उन्हें संयुक्त राष्ट्र की पहली भारतीय महिला गुडविल एंबेसडर बनाया गया और बाद में वह राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा की सांसद भी मनोनीत की गईं।
शबाना जी को जन्मदिन की शुभकामनाएं…
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