हंगल साहब से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा कुछ यूं है कि फिल्म नमक हराम में इन्होंने ट्रेड यूनियन लीडर का किरदार इतनी शानदार तरीके से निभाया था कि एक पुलिस वाला ये मान बैठा कि हंगल साहब वाकई में किसी यूनियन के लीडर हैं।
वो पुलिस वाला इनके घर पहुंचा और यूनियन शुरू करने के बारे में इनसे सवाल करने लगा। जब हंगल साहब ने उसे साफ शब्दों में बताया कि वो तो बस एक एक्टर हैं और उन्हें नहीं पता कि यूनियन कैसे शुरू की जाती है, तब वो पुलिस वाला माना।
हंगल साहब से ही जुड़ा एक और दिलचस्प किस्सा कुछ इस प्रकार है कि साल 1993 में ये पाकिस्तान गए थे। ये वहां अपनी डॉक्यूमेंट्री के सिलसिले में अपना पुश्तैनी मकान देखने गए थे।
इत्तेफाक से उसी दौरान पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस पड़ गया। पाकिस्तान के कुछ लोगों ने इन्हें अपने स्वतंत्रता दिवस समारोह में बतौर चीफ गेस्ट इनवाइट किया और ये उस समारोह में शरीक भी हो गए।
ये बात जब बालासाहेब ठाकरे को मालूम चली तो वो इनसे बेहद नाराज़ हुए। बाला साहेब ने फिल्म इंडस्ट्री में इन्हें बैन करा दिया। बाला साहेब द्वारा लगाया गया वो अघोषित बैन लगभग दो सालों तक चला था
इस दौरान हंगल साहब को बड़ी परेशानियों से गुज़रना पड़ा। कहा जाता है कि हंगल साहब ने बाला साहेब से मिलकर उनसे माफी मांगी थी तब कहीं जाकर उन्हें बैन से आज़ादी मिली थी।
01 फरवरी 1914 को सियालकोट में हंगल साहब का जन्म हुआ था। ये एक ऐसे कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे जो बहुत साल पहले कश्मीर छोड़कर लखनऊ आ बसा था। मगर बाद में ए.के.हंगल साहब के दादा सरकारी कमिश्नर की हैसियत से लखनऊ छोड़कर पेशावर पहुंच गए। बाद में सियालकोट शिफ़्ट हो गए।
ये हंगल साहब के पिता थे जिन्हें संगीत और नाटकों का शौक था। पिता अक्सर हंगल साहब को भी अपने साथ नाटक दिखाने ले जाते थे। वहीं से हंगल साहब को नाटकों में दिलचस्पी पैदा हुई थी।
हंगल साहब के ननिहाल में अंग्रेजी शासन से नफ़रत का माहौल था। हंगल साहब पर भी उसका प्रभाव पड़ा। जबकी उनके पिता व दादा अंग्रेज सरकार में उच्च पदों पर आसीन थे।
मगर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ़ बगावत करने का फ़ैसला किया। और एक स्थानीय क्रांतिकारी ग्रुप से जुड़ गए। हंगल साहब के पिता उनसे बहुत नाराज़ हुए। क्योंकि पिता चाहते थे कि ए.के.हंगल भी उनकी ही तरह अंग्रेजों की सरकारी नौकरी करें।
लेकिन हंगल साहब तो अंग्रेजों को दुश्मन मानते थे। अंग्रेजों की नौकरी तो उन्हें किसी भी हाल में नहीं करनी थी। तो हंगल साहब ने कुछ और काम करने का फ़ैसला किया। और उन्होंने सीखी टेलरिंग। यानि दर्जी का काम।
फिर एक वक्त आया जब सियालकोट छोड़कर हंगल परिवार कराची आकर रहने लगा। कराची की ही एक मशहूर फ़र्म 'एस.आर. दास एंड सन्स' में बहैसियत 'चीफ़ कटर' हंगल साहब नौकरी करने लगे। तनख्वाह थी इनकी 450 रुपए महीना। यानि बढ़िया तनख्वाह थी।
नौकरी के साथ हंगल साहब थिएटर भी किया करते थे। वो 'कराची हारमोनिका क्लब' के मेंबर बन गए थे। ये क्लब नाटकों का आयोजन करता था। हंगल साहब भी यहां नाटकों में भाग लेते थे। और यही वो जगह थी जहां नौजवान ए.के.हंगल के मन में समाजवादी विचारों का आगमन हो रहा था। फिर वो कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़ गए थे।
आज एक.के. हंगल की पुण्यतिथि है। साल 2012 में आज ही के दिन, 26 अगस्त को उनका देहांत हुआ था। हंगल साहब की विस्तृत जीवनी आपको इस पोस्ट के कमेंट सेक्शन में मिल जाएगी। उसे ज़रूर पढ़िएगा। हंगल साहब के बारे में बहुत कुछ आपको जानने को मिलेगा उस लेख में। किस्सा टीवी हंगल साहब को ससम्मान याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता है। #