Thursday, 27 August 2026

हंगल साहब ------किस्सा टीवी

 



हंगल साहब से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा कुछ यूं है कि फिल्म नमक हराम में इन्होंने ट्रेड यूनियन लीडर का किरदार इतनी शानदार तरीके से निभाया था कि एक पुलिस वाला ये मान बैठा कि हंगल साहब वाकई में किसी यूनियन के लीडर हैं। 

वो पुलिस वाला इनके घर पहुंचा और यूनियन शुरू करने के बारे में इनसे सवाल करने लगा। जब हंगल साहब ने उसे साफ शब्दों में बताया कि वो तो बस एक एक्टर हैं और उन्हें नहीं पता कि यूनियन कैसे शुरू की जाती है, तब वो पुलिस वाला माना।

हंगल साहब से ही जुड़ा एक और दिलचस्प किस्सा कुछ इस प्रकार है कि साल 1993 में ये पाकिस्तान गए थे। ये वहां अपनी डॉक्यूमेंट्री के सिलसिले में अपना पुश्तैनी मकान देखने गए थे। 

इत्तेफाक से उसी दौरान पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस पड़ गया। पाकिस्तान के कुछ लोगों ने इन्हें अपने स्वतंत्रता दिवस समारोह में बतौर चीफ गेस्ट इनवाइट किया और ये उस समारोह में शरीक भी हो गए। 

ये बात जब बालासाहेब ठाकरे को मालूम चली तो वो इनसे बेहद नाराज़ हुए। बाला साहेब ने फिल्म इंडस्ट्री में इन्हें बैन करा दिया। बाला साहेब द्वारा लगाया गया वो अघोषित बैन लगभग दो सालों तक चला था 

इस दौरान हंगल साहब को बड़ी परेशानियों से गुज़रना पड़ा। कहा जाता है कि हंगल साहब ने बाला साहेब से मिलकर उनसे माफी मांगी थी तब कहीं जाकर उन्हें बैन से आज़ादी मिली थी।  

01 फरवरी 1914 को सियालकोट में हंगल साहब का जन्म हुआ था। ये एक ऐसे  कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे जो बहुत साल पहले कश्मीर छोड़कर लखनऊ आ बसा था। मगर बाद में ए.के.हंगल साहब के दादा सरकारी कमिश्नर की हैसियत से लखनऊ छोड़कर पेशावर पहुंच गए। बाद में सियालकोट शिफ़्ट हो गए। 

ये हंगल साहब के पिता थे जिन्हें संगीत और नाटकों का शौक था। पिता अक्सर हंगल साहब को भी अपने साथ नाटक दिखाने ले जाते थे। वहीं से हंगल साहब को नाटकों में दिलचस्पी पैदा हुई थी।

हंगल साहब के ननिहाल में अंग्रेजी शासन से नफ़रत का माहौल था। हंगल साहब पर भी उसका प्रभाव पड़ा। जबकी उनके पिता व दादा अंग्रेज सरकार में उच्च पदों पर आसीन थे। 

मगर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ़ बगावत करने का फ़ैसला किया। और एक स्थानीय क्रांतिकारी ग्रुप से जुड़ गए। हंगल साहब के पिता उनसे बहुत नाराज़ हुए। क्योंकि पिता चाहते थे कि ए.के.हंगल भी उनकी ही तरह अंग्रेजों की सरकारी नौकरी करें। 

लेकिन हंगल साहब तो अंग्रेजों को दुश्मन मानते थे। अंग्रेजों की नौकरी तो उन्हें किसी भी हाल में नहीं करनी थी। तो हंगल साहब ने कुछ और काम करने का फ़ैसला किया। और उन्होंने सीखी टेलरिंग। यानि दर्जी का काम। 

फिर एक वक्त आया जब सियालकोट छोड़कर हंगल परिवार कराची आकर रहने लगा। कराची की ही एक मशहूर फ़र्म 'एस.आर. दास एंड सन्स' में बहैसियत 'चीफ़ कटर' हंगल साहब नौकरी करने लगे। तनख्वाह थी इनकी 450 रुपए महीना। यानि बढ़िया तनख्वाह थी।

नौकरी के साथ हंगल साहब थिएटर भी किया करते थे। वो 'कराची हारमोनिका क्लब' के मेंबर बन गए थे। ये क्लब नाटकों का आयोजन करता था। हंगल साहब भी यहां नाटकों में भाग लेते थे। और यही वो जगह थी जहां नौजवान ए.के.हंगल के मन में समाजवादी विचारों का आगमन हो रहा था। फिर वो कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़ गए थे।

आज एक.के. हंगल की पुण्यतिथि है। साल 2012 में आज ही के दिन, 26 अगस्त को उनका देहांत हुआ था। हंगल साहब की विस्तृत जीवनी आपको इस पोस्ट के कमेंट सेक्शन में मिल जाएगी। उसे ज़रूर पढ़िएगा। हंगल साहब के बारे में बहुत कुछ आपको जानने को मिलेगा उस लेख में। किस्सा टीवी हंगल साहब को ससम्मान याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता है। #

Tuesday, 25 August 2026

फिल्म "आरसी" (Arsi)! ------ Manjesh Boora'




🎞️ ऐसी फिल्म... जिसकी आधी शूटिंग लाहौर के दंगों में जल गई, और आधी मुंबई में पूरी हुई! 💔🔥

आज बात करेंगे सन 1947 की एक ऐसी ऐतिहासिक और अनोखी फिल्म की, जिसकी रील पर भारत के विभाजन (Partition) के घाव हमेशा के लिए छप गए— फिल्म "आरसी" (Arsi)!

तस्वीर में नजर आ रही यह खूबसूरत जोड़ी अभिनेता अल-नासिर (Al-Nasir) और सदाबहार अभिनेत्री मीना शोरी (Meena Shorey) की है, जो इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे। लेकिन इस फिल्म के पीछे का असली इतिहास आपके रोंगटे खड़े कर देगा:

🏢 जब दंगों की आग में जल उठा 'लाहौर स्टूडियो' 

🎬इस फिल्म की शुरुआत अविभाजित भारत के सांस्कृतिक केंद्र लाहौर में हुई थी। लेकिन 1947 में विभाजन की घोषणा होते ही लाहौर सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस उठा। उस दौर के ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स बताते हैं कि दंगों के दौरान लाहौर के दो सबसे बड़े फिल्म स्टूडियो— 'शोरी पिक्चर्स स्टूडियो' (Shorey Pictures) और 'पंचोली आर्ट पिक्चर्स स्टूडियो' (Pancholi Art Pictures) को उपद्रवियों ने पूरी तरह जलाकर खाक कर दिया था!

🚂 आधी फिल्म लाहौर में... आधी मुंबई में! 

🎥स्टूडियो के तबाह हो जाने और चारों तरफ फैली हिंसा के कारण फिल्म की शूटिंग बीच में ही ठप हो गई। अपनी जान बचाकर फिल्म के निर्देशक दाऊद चांद मीना शोरी और अल-नासिर समेत पूरी यूनिट लाहौर छोड़कर मुंबई (तब बॉम्बे) आ गई। फिल्म का आधा हिस्सा लाहौर में शूट हो चुका था, जबकि बची हुई आधी अधूरी शूटिंग को मुंबई के स्टूडियोज में आनन-फानन में पूरा किया गया।

💔 बंटवारे के बाद लाहौर में हुई रिलीजदिलचस्प बात यह है कि मुंबई में पूरी होने के बाद, विभाजन के तुरंत बाद ही इस फिल्म को वापस सरहद पार लाहौर के कैसर सिनेमा में रिलीज किया गया था, जहाँ यह बेहद कामयाब रही। यह फिल्म इस बात का गवाह है कि कला को सरहदें और दंगे भी नहीं रोक सकते।

🎼 फिल्म "आरसी" (1947) के संगीतकार और गीतकार:संगीत निर्देशक: इस फिल्म का जादुई संगीत दो संगीतकारों ने मिलकर तैयार किया था— श्याम सुंदर और लच्छीराम तोमर।

 (संगीतकार श्याम सुंदर वही हैं जिन्होंने आगे चलकर हिंदी सिनेमा को महान गायक मोहम्मद रफ़ी साहब जैसा हीरा दिया था)।

गीतकार : इस फिल्म के सभी भावुक और सुंदर गीतों के बोल मशहूर गीतकार सरशार सैलानी  ने लिखे थे।

🎵 फिल्म के सबसे बढ़िया और सुपरहिट गाने :



बंटवारे के दर्द और जुदाई के उस दौर में इस फिल्म के गाने लोगों के दिलों को छू गए थे। इस फिल्म के 3 सबसे बेहतरीन और प्रसिद्ध गाने इस प्रकार हैं:

1. तेरे बिना बालम जिया मोरा डोले 🌸 (सबसे बड़ा सुपरहिट)


गायिका: ज़ीनत बेगम ।

खास बात: यह इस फिल्म का सबसे लोकप्रिय और मधुर गाना माना जाता है। ज़ीनत बेगम की सुरीली आवाज़ और श्याम सुंदर की धुन ने इसे उस दौर का एक बड़ा चार्टबस्टर बना दिया था। जुदाई के दर्द को बयां करता यह गीत आज भी पुराने गानों के शौकीनों का पसंदीदा है।

2. आशियाना अपना लुटा अपनी नज़र के सामने 💔 (बेहद भावुक गीत।

गायक: एस. डी. बातिश 

खास बात: यह गाना फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) है। विडंबना देखिए, इस गाने के बोल थे— "आशियाना अपना लुटा अपनी नज़र के सामने...", और ठीक इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान लाहौर में दंगे भड़क उठे और कलाकारों का असली आशियाना (लाहौर स्टूडियो) सचमुच जलकर खाक हो गया! जब यह गाना थिएटर्स में बजा, तो लोग फूट-फूट कर रो पड़े थे।

3. दुनिया छूटे पर ना छूटे तेरी महफ़िल 🤝 

(शानदार युगल गीत)

गायक: एस. डी. बातिश और ज़ीनत बेगम ।

खास बात: यह अल-नासिर और मीना शोरी पर फिल्माया गया एक खूबसूरत और धीमा रोमांटिक गाना है। कठिन परिस्थितियों में भी एक-दूसरे का साथ न छोड़ने का वादा करता यह गीत संगीत के शौकीनों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ।

⏳ साथियों, बस थोड़ा सा इंतज़ार और...! 👇आज शाम ठीक 5:00 बजे 'आरसी' फिल्म के एक बेहद ख़ास रील "तेरे बिना बालम जिया मोरा डोले"🎻 आपके लिए आने वाली है! सभी साथी 5:00 बजे का इंतज़ार ज़रूर करें और पोस्ट में यह जानकारी कमेंट बॉक्स में बताएं कि आपको इतिहास का यह पन्ना कैसा लगा! 📻

Saturday, 22 August 2026

किशोर साहू ------- संजोग वाल्टर



Hum Deewanon Ki Kya Hasti  · Kishore Sahu

 ·

#किशोरसाहू का जन्म 22 नवम्बर 1915 को सेंट्रल प्रोविन्स के #राजनांदगांव,में हुआ था। जो  अब #छत्तीसगढ़ में है। किशोर साहू ने हर प्रकार की फिल्मों का निर्माण निर्देशन किया था । किशोर साहू अपने ज़माने में सफल निर्देशन अभिनेता के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। लगभग 50 फिल्मों में अपनी अभिनय कला की छाप छोड़ने वाले किशोर साहू ने ‘बुजदिल’, ‘गाईड’, ‘ज़लज़ला’ में अपने शानदार अभिनय से सभी लोगो के दिल में जगह बना ली थी । बतौर निर्माता ‘नदिया के पार’ किशोर साहू निर्देशित कामयाब फिल्म थी। जिसमे दिलीप कुमार कामिनी कौशल की भूमिका थी। प्रतिमा दासगुप्ता, अनुराधा, बीनाराय,इंदिरा पांचाल,आशा माथुर ,माला सिन्हा, कुमुद छुगानी, परवीन बॉबी को रुपहले पर्दे पर लाये ।

किशोर साहू जी का #लखनऊ से भी सबंध था। उस दौर के बहुत से फिल्म कारों के दफ़तर लखनऊ मे भी हुआ करते थे। सो किशोर साहू भी लखनऊ आते  जाते रहते थे

किशोर  साहू  ने ‘कुंवारा बाप’ नाम की फ़िल्म बनायी जो आज भी भारत की बेहतरीन हास्य फ़िल्मों में शुमार की जाती है। किशोर साहू ने अपने मित्र और हिंदी के प्रसिद्ध लेखक #अमृतलालनागर से ‘कुंवारा बाप’ के डायलाग लिखवाए और अभिनय भी कराया था।

फिल्म हरे कांच की चूडिय़ां  की अभिनेत्री  किशोर साहू की पुत्री नैना साहू का निधन 22 जनवरी 2017 को हो गया था।  उनके बेटे विक्रम साहू ने फिल्म सत्ते पर सत्ता में अभिताभ बच्चन के एक भाई की भूमिका निभाई थी, वे भी इन दिनों छोटे-मोटे सीरियलों में काम करके अपनी गुजर-बसर कर रहे हैं।

 22 अगस्त 1980 को बैंकाक, में हार्ट अटैक से किशोर साहू  की मौत हो गई थी । 

हिन्दी सिनेमा के बिरले फिल्मकार को नमन।

धुंधली_तस्वीरे_और_अतीत_के_सुनहरे_दिन S











Thursday, 6 August 2026

भारत की पहली मिस इंडिया और अभिनेत्री : प्रमिला ------ संजोग वाल्टर

 


एस्थर विक्टोरिया अब्राहम: भारत की पहली मिस इंडिया और अभिनेत्री जिन्हें स्टेज नाम #प्रमिला से जाना जाता है,  जन्म 30 दिसंबर 1916 को #कलकत्ता के  बगदादी यहूदी परिवार में हुआ था। 17 वर्ष की आयु में घर छोड़कर उन्होंने मनोरंजन की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत पारसी थिएटर में नृत्यांगना के रूप में की, फिर स्टंट अभिनेत्री के तौर पर लगभग 30 फिल्मों में काम किया। बसंत, उल्टी गंगा और जंगल किंग फिल्म में उनकी  भूमिकाएं याद की जाती हैं। 
1947 में स्वतंत्र भारत की पहली मिस इंडिया का ताज उन्होंने जीता—उस समय उनकी उम्र 31 वर्ष थी और वे अपने पांचवें बच्चे के साथ गर्भवती थीं।अपने पति अभिनेता कुमार (मुगल ए आज़म मे संतराश) (सैयद हसन अली जैदी) के साथ उन्होंने ‘सिल्वर प्रोडक्शंस’ की स्थापना की और 16 फिल्में बनाकर इतिहास रचा। उनकी बेटी नाकी जहां भी 1967 में मिस इंडिया बनीं, जिससे वे मां-बेटी जोड़ी के रूप में यह उपलब्धि हासिल करने वाली एकमात्र जोड़ी बन गईं।प्रमिला ने दो विवाह किए और पांच बच्चों का पालन-पोषण किया। 6 अगस्त 2006 को लगभग 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था.
एस्थर विक्टोरिया अब्राहम (प्रमिला) के 4 बेटे थे।पहली शादी (मणिकलाल डांगी से) से एक बेटा: मॉरिस अब्राहम ।  
दूसरी शादी (सैयद हसन अली जैदी उर्फ कुमार से) से तीन बेटे:  अकबर  
असगर हैदर अली  सबसे छोटे बेटे, जो अभिनेता और पटकथा लेखक हैं (टीवी )। 


Saturday, 1 August 2026

मीना कुमारी : जन्मदिन पर स्मरण ------ Medhavini Mohann

 


पति है, पत्नी है, कोई अन्तरंग दृश्य नहीं। खाली एक मनुहार है अपने प्रीतम से कि प्रियतमा को छोड़ कर न जाया जाए...न जाओ सैयां, छुड़ा के बैयाँ, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी...रो पड़ूँगी! पौने चार मिनट का एक पूरा गाना महज एक कमरे में फ़िल्माया जाए। तिस पर उसका तक़रीबन 90 फ़ीसदी हिस्सा कमरे में बिछे बस एक पलंग पर गाया जाए। 

आज की फिल्मों में एक गाना ही अक्सर देखने वालों को दुनिया की सैर करा देता है। ऐसे में अगर आज भी एक कमरे के एक पलंग पर एक ही कपड़ों में फिल्माए 1962 की किसी फ़िल्म के गाने को लोग बार-बार देखना चाहते हैं, तो ज़रूर उस चेहरे में कुछ बात रही होगी, जो इतनी देर तक स्क्रीन पर दिखता है। वो चेहरा था मीना कुमारी का।

फ़िल्म थी साहिब, बीबी और गुलाम। मीना कुमारी के चेहरे के चढ़ते-उतरते भाव, उनकी आँखों की अदाकारी और माथे पर टँकी बड़ी-सी बिन्दी...सब मिल कर इस तरह बाँध लेते हैं कि गाना ख़त्म होने पर सम्मोहन-सा टूटता है। ऐसा जादू था महज़बीन बानो से पहले बेबी मीना, फिर मीना कुमारी बनी 60 से 70 के दशक की कभी न भूली जा सकने वाली इस अदाकारा में।

भारतीय सिनेमा की 'ट्रैजिडी क्वीन' कही जाने वाली मीना कुमारी के बारे में एक बात अक्सर कही जाती है। वो यह कि उनके दर्द ने उन्हें मीना कुमारी बनाया। न चाहते हुए हुए भी बचपन में ही स्कूल की बजाय फ़िल्मों के सेट का रास्ता दिखा दिया जाना, ताकि परिवार की ज़िन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए वो भी एक पहिया बन सकें। परदे पर सफलता मिलने के शुरुआती दौर में ही एक एक्सीडेंट की वजह से अपने-परायों का असल चेहरा सामने आना और एक साथ कई फ़िल्में हाथ से छिन जाना। उस हाथ से, जिसकी दो उँगलियाँ भी उन्होंने एक्सीडेंट में खो दी थीं।

आगे चल कर एक शादीशुदा फ़िल्म निर्देशक के प्यार में पड़ना, उससे शादी करना, फिर उस शादी का न चलना। जहाँ-जहाँ मोहब्बत की तलाश की, वहाँ धोखे खाना। शायद ये ही कड़वे तजुर्बात उन्हें ज़िन्दगी भर सालते रहे। नाम, शोहरत, प्रशंसकों की चाहत, दौलत सब कुछ मिल कर भी उनके मन के खालीपन को नहीं भर पाता था। इस खालीपन को उन्होंने शराब के जामों से भरने की कोशिश की, पर मिली सिर्फ़ बीमारी। यही वजह थी कि 1 अगस्त 1933 में जन्मी मीना कुमारी चालीस बरस पूरे करने से पहले ही चल बसी थीं।

'गोमती के किनारे' उनकी आख़िरी फ़िल्म थी। उससे पहले 'पाकीज़ा' आई थी, जिसे उन्होंने पति कमाल अमरोही के साथ शुरू किया था। रिश्ता टूटने पर फ़िल्म पूरी होने की आस भी छूट गई थी। फिर भी किसी तरह इसकी दोबारा शूटिंग शुरू हुई। ज़िन्दगी और करियर के अपने आख़िरी दौर में मीना अब पुरानी मीना नहीं रही थीं। 10 साल पहले अपने भावमयी चेहरे की बिनाह पर जो अदाकारा लोगों को पलकें झपकाने का मौका नहीं देती थी, उसी की आख़िरी फ़िल्म में बहुत सारे दृश्य दूर से फ़िल्माने पड़े, कैमरे को उनसे ज़्यादा आसपास के नज़ारे दिखाने पड़े, क्योंकि बीमारी ने उन्हें बदल दिया था।

बताते हैं कि मीना कुमारी के नसीब ने उनके साथ खिलवाड़ उनके पैदा होते ही शुरू कर दिया था। घर की तंग हालत के चलते उनके पिता उन्हें एक अनाथालय में छोड़ आए थे। पर फिर उनका मन न माना और ज़ोर-ज़ोर से रोती अपनी बच्ची को वापस उठा लाए थे। इस बीच उस नन्हीं-सी बच्ची को चींटों ने बेहिसाब काट लिया था, जिस वजह से उसके नाजुक शरीर पर लाल-लाल निशान हो गए थे। बाद में वे निशान तो चले गए, पर दर्द के निशान शायद हमेशा के लिए उनकी रूह पर पड़ गए थे। उनकी रूह ज़िन्दगी भर एक अजीब क़िस्म की बेचैनी से जूझती रही। शायद यही बेचैनी उन्हें वक़्त से बहुत पहले निगल भी गई।

कभी अशोक कुमार ने मीना से उनके बचपन में मज़ाक किया था कि तुम जल्दी-से बड़ी हो जाओ, फिर मेरे साथ फ़िल्मों में हीरोइन बनना। यह सुन कर वहाँ मौजूद सभी लोग हँस पड़े थे। अशोक और मीना की उम्र में इतना ज्यादा फ़र्क़ जो था। तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि आगे चल कर वो सच में अशोक कुमार के साथ तमाशा, बहू-बेगम और जवाब जैसी फ़िल्में करेंगी।

'बहू-बेगम' में एक दृश्य के लिए उनके साथी कलाकार उन्हें हमेशा याद करते आए हैं। इसमें पिता अपनी बेटी को घर से बाहर निकाल रहा होता है और बेटी उन्हें ऐसा न करने की दुहाई दे रही होती है। बताते हैं कि उस करुण दृश्य के ख़त्म होने के बाद भी मीना कुमारी देर तक फूट-फूट कर रोती रही थीं। इस क़दर वह अपने किरदार में उतर जाती थीं या यह कहा जाए कि ज़िन्दगी से मिले दर्द उनके किरदार में उतर आते थे। शायद इस दृश्य को वह असल ज़िन्दगी में पहले ही जी चुकी थीं, जब कमाल अमरोही से शादी करने का फ़ैसला करने पर उनके पिता ने उनसे सारे रिश्ते तोड़ने चाहे थे।

दर्द मीना की ज़िन्दगी में उनकी उन दो कटी उँगलियों की तरह था, जिन्हें वह अपने दुपट्टे या साड़ी के आँचल में छुपाए रहती थीं। फ़र्क़ इतना था कि लोग लाख कोशिश करने पर भी परदे पर उनकी उन उँगलियों को देख नहीं पाते थे, मगर दर्द कभी आँखों, कभी चेहरे, कभी किरदारों की अदायगी में बयाँ हो ही जाता था। लोग सच ही कहते हैं। मीना कुमारी के दर्द ने ही उन्हें मीना कुमारी बनाया होगा।

Wednesday, 22 July 2026

"दर्द भरी सुरीली आवाज के सरताज" : मुकेश चन्द्र माथुर ------ रजनीश कुमार श्रीवास्तव




 "दर्द भरी सुरीली आवाज के सरताज", "आवाज के जादूगर" और "दर्द भरे गीतों के बेताज बादशाह" #मुकेश चन्द्र माथुर जो फिल्म फेयर पुरस्कार पाने वाले पहले पुरूष पार्श्व गायक बने थे, के १०४  वें जन्मदिन पर उनका शत शत नमन।

           हिन्दी सिनेमा की पार्श्व गायकी के सुपर स्टार मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 ई० को एक सम्पन्न कायस्थ परिवार में पिता जोरावर चन्द्र माथुर और माता चाँद रानी के घर दिल्ली में हुआ था।आवाज के इस जादूगर ने 1940 ई० से 27 अगस्त 1976 ई० तक अपने देहावसान के समय तक हिन्दी सिनेमा के 200 से ज्यादा फिल्मों में 1300 से ज्यादा बेमिसाल गीत गाए और अपने सदाबहार गीतों की वजह से लगातार तीन दशक तक श्रोताओं के दिल पर राज किया।भारत के अलावा रूस और अमेरिका में भी इनके करोड़ों चाहने वाले थे।रूस में जहाँ उनका गीत,"मेरा जूता है जापानी" लोगों के जुबान पर लम्बे समय तक चढ़ा रहा तो अमेरिका के डेट्रॉयट(मिशिगन) के एक समारोह में अपना प्रसिद्ध गीत "इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल,जग में रह जाएँगे प्यारे तेरे बोल " गाते हुए हृदयघात हो जाने से 27 अगस्त 1976 ई० को वे सदा के लिए अमर हो गए और रह गये तो सिर्फ उनके सुरीले बोल।

         हिन्दी सिनेमा गायकी में उनका प्रवेश उनके दूर के रिश्तेदार प्रसिद्ध अभिनेता मोती लाल जी ने कराया था।इनके अविस्मर्णीय सहयोग से दिल्ली में पी डब्लू डी में असिस्टेन्ट सर्वेयर की नौकरी करने वाले मुकेश ने 1941 ई०  में फिल्म "निर्दोष" से अपना कैरियर शुरू कर 1945 ई० में फिल्म "पहली नज़र" के प्रसिद्ध गीत "दिल जलता है तो जलने दे,आँसू ना बहा फरियाद ना कर" के द्वारा अपना जलवा पूरे फिल्मी जगत में फैला दिया  और फिर इस उभरते सितारे का यादगार सफर तीन दशकों तक तीन सर्वकालिक महान  अभिनेताओं #दिलीप कुमार,#राजकपूर और #मनोज कुमार की आवाज बनकर प्रसिद्धि के नित नए प्रतिमान गढ़ने लगा।तात्कालिक समय के पार्श्व गायकी के दिग्गज और अपने आदर्श कुन्दन लाल सहगल तथा पंकज मलिक की छत्रछाया से बाहर निकल कर हिन्दी सिनेमा की पार्श्व गायकी के स्वर्ण युग में मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के अद्भुत गायकी के विशिष्ट दौर में अपनी अनमोल छाँप छोड़कर ट्रेजड़ी किंग दिलीप कुमार, हिन्दी सिनेमा के शो मैन राजकपूर और बेमिसाल सुपर स्टार मनोज कुमार की लगातार तीन दशकों तक आवाज बने रहना एक बेमिसाल कारनामें से कम नहीं था।तभी तो मुकेश के देहावसान पर शोक में डूबे शो मैन राजकपूर ने सार्वजनिक उदघोष करते हुए कहा था कि,"मैने अपनी आवाज सदा के लिए खो दी है।" राजकपूर अक्सर कहा करते थे कि," मैं तो बस शरीर हूँ मेरी आत्मा तो  मुकेश है।" 

          संगीतकार नौसाद,अनिल विश्वास और शंकर जयकिशन के साथ मुकेश की अदभुत गायकी ने एक से बढ़कर एक अनमोल गीत भारतीय सिनेमा को दिए।मुकेश को अपनी लाजवाब गायकी के कारण 1959, 1970, 1972 और 1976 ई० में चार बार फिल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ तो 1974 ई० में फिल्म रजनीगंधा के गीत "कई बार यूँ भी देखा है" के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

 रोशन, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीप्यारे के साथ भी इनका काम उल्लेखनीय रहा। उनके तीन फिल्मफेयर बेस्ट सिंगर पुरस्कार में संगीत एस जे डुओ का एवं एक फिल्म फेयर पुरस्कार में संगीत खय्याम का रहा है।

"किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार" से लेकर "सावन का महीना पवन करे शोर" और फिर "दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई" से लेकर "सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है" के सदाबहार गीतों को अपनी बेमिसाल गायकी से अमर कर देने वाले मुकेश केवल पल दो पल के शायर ही नहीं बल्कि हर पल के नायाब फनकार थे।इस सर्वकालिक महान पार्श्व गायक का उनके जन्मदिन पर शत शत नमन।

Monday, 20 July 2026

मुबारक़ बेग़म / केदार शर्मा ------ Qissa TV's Post

 



लता मंगेशकर के उस बदमिज़ाज ड्राइवर को शायद अंदाज़ा भी नहीं होगा कि उसकी हरक़त एक दूसरी गायिका के लिए शोहरत का रास्ता तैयार करेगी। किसी वक्त के नामी फ़िल्मकार किदार शर्मा साहब ने अपनी आत्मकथा "द वन एंड लोनली किदार शर्मा" में इस घटना का ज़िक्र किया था। उस किताब में जो बताया गया है वो किस्सा कुछ यूं है कि किदार शर्मा साल फ़िल्म "हमारी याद आएगी" के म्यूज़िक की तैयारियों में लगे थे। 
फ़िल्म का टाइटल ट्रैक वो लता जी से गवाना चाहते थे। अपनी आत्मकथा "द वन एंड लोनली किदार शर्मा" में किदार शर्मा जी ने लिखा है कि लता मंगेशकर दो बार इस फ़िल्म का टाइटल ट्रैक "कभी तनहाईयों में यूं हमारी याद आएगी" की रिकॉर्डिंग कैंसिल करके चली गई थी। 
किदार शर्मा बताते हैं कि दोनों दफ़ा लता जी के ड्राइवर ने उनसे 140 रुपए की डिमांड की थी। वो ड्राइवर बड़े रौब से कहता था कि रिकॉर्डिंग तब होगी जब आप मुझे एक सौ चालीस रुपए दे देंगे। किदार शर्मा जी ने उससे पूछा भी कि वो एक सौ चालीस रुपए किस बात के लिए मांग रहा है? 
जवाब में उस ड्राइवर ने कहा कि सब उसे रुपए देते हैं। आपको भी देने होंगे। तब किदार शर्मा ने कहा कि मैं औरों को नहीं जानता। लेकिन लता जी की जो शर्तें मुझसे तय हुई हैं मैं बस उन्हें मानूंगा। और उन शर्तों में ये बात कहीं नहीं है कि मुझे तुम्हें एक सौ चालीस रुपए देने होंगे।
किदार शर्मा जी की वो बात सुनकर लता मंगेशकर जी का ड्राइवर मुस्कुराया और बोला,"तो ठीक है। कोशिश करके देख लीजिए अगर रिकॉर्डिंग हो जाए तो।" थोड़ी देर बाद किदार शर्मा को पता चला कि लता जी स्टूडियो से चली गई हैं। ये उस दिन की बात है जिस दिन लता जी दूसरी दफ़ा उस गाने की रिकॉर्डिंग कैंसिल करके गई थी। 
किदार शर्मा अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि लता जी का वो रवैया उन्हें बहुत ग़ैरज़िम्मेदाराना लगा। किदार शर्मा ने फ़ैसला किया कि वो लता मंगेशकर से उस गाने को गवाएंगे ही नहीं। उन्होंने मुबारक बेगम से बात की। और उन्हें वो गाना गवाने के लिए बुला लिया। और मुबारक बेगम ने वो गाना रिकॉर्ड कर दिया। 
रिकॉर्डिंग से पहले मुबारक़ बेगम ने किदार शर्मा से एक रिक्वेस्ट की थी। मुबारक़ बेग़म ने कहा था,"शर्मा जी, मैं आपसे अकेले में बात करना चाहती हूं। क्या आप एक मिनट के लिए दूसरे कमरे में चल सकते हैं?" मुबारक बेगम ने बहुत प्यार से विनती करते हुए किदार शर्मा से ये कहा था। उस वक्त वहां संगीतकार स्नेहल भाटकर भी मौजूद थे। वो समझ गए कि कोई तो ज़रूरी बात होगी जो मुबारक बेगम ऐसा कह रही हैं। स्नेहल भाटकर मुस्कुराए और उन्होंने किदार शर्मा को दूसरे कमरे में जाने का इशारा किया। 
दूसरे कमरे में आकर मुबारक बेगम किदार शर्मा से बोली,"हम बहुत गरीब हैं शर्मा जी। ये धुन बहुत शानदार है। लेकिन बहुत मुश्किल भी है। मैंने दो दिनों से कुछ नहीं खाया है। क्या आप मेरे लिए सिर्फ़ दो ब्रैड के पीस और एक कप चाय मंगा सकते हैं?" मुबारक बेगम की आंखों में आंसू आ गए थे किदार शर्मा साहब से ये बात कहते हुए। किदार शर्मा ने फौरन मुबारक बेगम के लिए दो ब्रेड स्लाइस और एक कप चाय ऑर्डर की। और मन ही मन उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि ईश्वर ने उन्हें किसी भूखे का पेट भरने का मौका दिया। 
चाय-ब्रैड खाकर मुबारक बेगम ने वो गाना रिकॉर्ड किया। और इतनी खूबसूरती से रिकॉर्ड किया कि वो उस फ़िल्म का सबसे लोकप्रिय गाना बन गया। उस गाने के बोल थे 'कभी तनहाईयों में यूं हमारी याद आएगी।' ये गाना लिखा भी खुद किदार शर्मा जी ने था। ये फ़िल्म साल 1961 में रिलीज़ हुई थी। किदार शर्मा ने इसे डायरेक्ट किया था। और लिखी भी उन्होंने ही थी ये फिल्म। 
इस फ़िल्म में हीरो थे किदार शर्मा के पुत्र अशोक शर्मा। और जानते हैं हीरोइन कौन थी इसमें? शोभना समर्थ की बेटी और नूतन की छोटी बहन तनुजा। ये वही फ़िल्म है जिसकी शूटिंग के दौरान किदार शर्मा ने तनुजा के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ मारा था। क्योंकि एक सीन के दौरान तनुजा गंभीर होकर काम नहीं कर रही थी। 
राज कपूर के बाद तनुजा दूसरी थी जिसने किदार शर्मा से थप्पड़ खाया था। किदार शर्मा अपनी आत्मकथा में ही लिखते हैं कि लता मंगेशकर अगर उस गाने को गाती तो यकीनन वो गाना बहुत शानदार होता। लेकिन तब शायद उस गाने को वो अनूठापन ना मिलता, जो मुबारक बेगम की गायकी से मिला था। 
आज मुबारक बेगम को इस दुनिया से गए 10 साल हो गए हैं। मुबारक बेगम की डेथ एनिवर्सरी है आज । 18 जुलाई 2016 को उनका देहांत हुआ था। मुबारक बेगम के जीवन पर एक विस्तृत लेख हमने लिखा था काफ़ी पहले। मुबारक बेग़म के जीवन के संघर्षों के बारे में बहुत कुछ बताया गया है उस लेख में। वो लेख आपको कमेंट सेक्शन में पढ़ने के लिए मिल जाएगा। उस लेख में मुबारक बेगम के जीवन से जुड़ी कई रोचक बातें आपको जानने को मिलेंगी। किस्सा टीवी मुबारक बेगम को नमन करता है। 
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