Monday, 20 July 2026

मुबारक़ बेग़म / केदार शर्मा ------ Qissa TV's Post

 



लता मंगेशकर के उस बदमिज़ाज ड्राइवर को शायद अंदाज़ा भी नहीं होगा कि उसकी हरक़त एक दूसरी गायिका के लिए शोहरत का रास्ता तैयार करेगी। किसी वक्त के नामी फ़िल्मकार किदार शर्मा साहब ने अपनी आत्मकथा "द वन एंड लोनली किदार शर्मा" में इस घटना का ज़िक्र किया था। उस किताब में जो बताया गया है वो किस्सा कुछ यूं है कि किदार शर्मा साल फ़िल्म "हमारी याद आएगी" के म्यूज़िक की तैयारियों में लगे थे। 
फ़िल्म का टाइटल ट्रैक वो लता जी से गवाना चाहते थे। अपनी आत्मकथा "द वन एंड लोनली किदार शर्मा" में किदार शर्मा जी ने लिखा है कि लता मंगेशकर दो बार इस फ़िल्म का टाइटल ट्रैक "कभी तनहाईयों में यूं हमारी याद आएगी" की रिकॉर्डिंग कैंसिल करके चली गई थी। 
किदार शर्मा बताते हैं कि दोनों दफ़ा लता जी के ड्राइवर ने उनसे 140 रुपए की डिमांड की थी। वो ड्राइवर बड़े रौब से कहता था कि रिकॉर्डिंग तब होगी जब आप मुझे एक सौ चालीस रुपए दे देंगे। किदार शर्मा जी ने उससे पूछा भी कि वो एक सौ चालीस रुपए किस बात के लिए मांग रहा है? 
जवाब में उस ड्राइवर ने कहा कि सब उसे रुपए देते हैं। आपको भी देने होंगे। तब किदार शर्मा ने कहा कि मैं औरों को नहीं जानता। लेकिन लता जी की जो शर्तें मुझसे तय हुई हैं मैं बस उन्हें मानूंगा। और उन शर्तों में ये बात कहीं नहीं है कि मुझे तुम्हें एक सौ चालीस रुपए देने होंगे।
किदार शर्मा जी की वो बात सुनकर लता मंगेशकर जी का ड्राइवर मुस्कुराया और बोला,"तो ठीक है। कोशिश करके देख लीजिए अगर रिकॉर्डिंग हो जाए तो।" थोड़ी देर बाद किदार शर्मा को पता चला कि लता जी स्टूडियो से चली गई हैं। ये उस दिन की बात है जिस दिन लता जी दूसरी दफ़ा उस गाने की रिकॉर्डिंग कैंसिल करके गई थी। 
किदार शर्मा अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि लता जी का वो रवैया उन्हें बहुत ग़ैरज़िम्मेदाराना लगा। किदार शर्मा ने फ़ैसला किया कि वो लता मंगेशकर से उस गाने को गवाएंगे ही नहीं। उन्होंने मुबारक बेगम से बात की। और उन्हें वो गाना गवाने के लिए बुला लिया। और मुबारक बेगम ने वो गाना रिकॉर्ड कर दिया। 
रिकॉर्डिंग से पहले मुबारक़ बेगम ने किदार शर्मा से एक रिक्वेस्ट की थी। मुबारक़ बेग़म ने कहा था,"शर्मा जी, मैं आपसे अकेले में बात करना चाहती हूं। क्या आप एक मिनट के लिए दूसरे कमरे में चल सकते हैं?" मुबारक बेगम ने बहुत प्यार से विनती करते हुए किदार शर्मा से ये कहा था। उस वक्त वहां संगीतकार स्नेहल भाटकर भी मौजूद थे। वो समझ गए कि कोई तो ज़रूरी बात होगी जो मुबारक बेगम ऐसा कह रही हैं। स्नेहल भाटकर मुस्कुराए और उन्होंने किदार शर्मा को दूसरे कमरे में जाने का इशारा किया। 
दूसरे कमरे में आकर मुबारक बेगम किदार शर्मा से बोली,"हम बहुत गरीब हैं शर्मा जी। ये धुन बहुत शानदार है। लेकिन बहुत मुश्किल भी है। मैंने दो दिनों से कुछ नहीं खाया है। क्या आप मेरे लिए सिर्फ़ दो ब्रैड के पीस और एक कप चाय मंगा सकते हैं?" मुबारक बेगम की आंखों में आंसू आ गए थे किदार शर्मा साहब से ये बात कहते हुए। किदार शर्मा ने फौरन मुबारक बेगम के लिए दो ब्रेड स्लाइस और एक कप चाय ऑर्डर की। और मन ही मन उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि ईश्वर ने उन्हें किसी भूखे का पेट भरने का मौका दिया। 
चाय-ब्रैड खाकर मुबारक बेगम ने वो गाना रिकॉर्ड किया। और इतनी खूबसूरती से रिकॉर्ड किया कि वो उस फ़िल्म का सबसे लोकप्रिय गाना बन गया। उस गाने के बोल थे 'कभी तनहाईयों में यूं हमारी याद आएगी।' ये गाना लिखा भी खुद किदार शर्मा जी ने था। ये फ़िल्म साल 1961 में रिलीज़ हुई थी। किदार शर्मा ने इसे डायरेक्ट किया था। और लिखी भी उन्होंने ही थी ये फिल्म। 
इस फ़िल्म में हीरो थे किदार शर्मा के पुत्र अशोक शर्मा। और जानते हैं हीरोइन कौन थी इसमें? शोभना समर्थ की बेटी और नूतन की छोटी बहन तनुजा। ये वही फ़िल्म है जिसकी शूटिंग के दौरान किदार शर्मा ने तनुजा के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ मारा था। क्योंकि एक सीन के दौरान तनुजा गंभीर होकर काम नहीं कर रही थी। 
राज कपूर के बाद तनुजा दूसरी थी जिसने किदार शर्मा से थप्पड़ खाया था। किदार शर्मा अपनी आत्मकथा में ही लिखते हैं कि लता मंगेशकर अगर उस गाने को गाती तो यकीनन वो गाना बहुत शानदार होता। लेकिन तब शायद उस गाने को वो अनूठापन ना मिलता, जो मुबारक बेगम की गायकी से मिला था। 
आज मुबारक बेगम को इस दुनिया से गए 10 साल हो गए हैं। मुबारक बेगम की डेथ एनिवर्सरी है आज । 18 जुलाई 2016 को उनका देहांत हुआ था। मुबारक बेगम के जीवन पर एक विस्तृत लेख हमने लिखा था काफ़ी पहले। मुबारक बेग़म के जीवन के संघर्षों के बारे में बहुत कुछ बताया गया है उस लेख में। वो लेख आपको कमेंट सेक्शन में पढ़ने के लिए मिल जाएगा। उस लेख में मुबारक बेगम के जीवन से जुड़ी कई रोचक बातें आपको जानने को मिलेंगी। किस्सा टीवी मुबारक बेगम को नमन करता है। 
ये लेख अगर आपको पसंद आया हो तो इसे लाइक-शेयर अवश्य करें। और क़िस्सा टीवी को फॉलो भी कर लें। ये जितनी भी कहानी है, वो सब किदार शर्मा साहब ने अपनी आत्मकथा में बताई है। किदार शर्मा अपना नाम ऐसे ही लिखते थे। वो केदार शर्मा नहीं लिखते थे। तो जैसे वो अपना नाम लिखते थे, हम हमेशा उनके लेख में ऐसे ही उनका नाम लिखते हैं। बाकि, आप उन्हें केदार शर्मा कहें, उसमें भी कुछ गलत नहीं है। #


अरुणा आसफ अली ------ Old is Gold Films's Post

 



भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे नाम हैं जिन्हें इतिहास की किताबों में कुछ पन्नों तक सीमित कर दिया गया, जबकि उनका योगदान किसी पूरे अध्याय से कम नहीं था। जब भी "भारत छोड़ो आंदोलन" की बात होती है, हमारे मन में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य बड़े नेताओं की छवि उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 9 अगस्त 1942 की वह सुबह, जब लगभग पूरा कांग्रेस नेतृत्व अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका था, तब एक महिला ने हजारों लोगों के सामने तिरंगा फहराकर पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दे दी थी। यही महिला थीं अरुणा आसफ अली।

उन्हें "भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका", "1942 की रानी" और बाद में "Grand Old Lady of the Independence Movement" कहा गया। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान केवल तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महात्मा गांधी के सम्मान के बावजूद, जब उन्हें लगा कि उनका रास्ता अलग है, तब गांधी जी की सलाह तक मानने से इनकार कर दिया। आखिर ऐसी कौन-सी महिला थी, जिसने देश की आजादी के लिए अपना घर, संपत्ति, पहचान और वर्षों का जीवन दांव पर लगा दिया? यही कहानी है उस असाधारण व्यक्तित्व की, जिसे आज भी भारत पूरी तरह जान नहीं पाया है।

एक ऐसे परिवार में जन्म, जहाँ विचारों की आजादी विरासत थी

16 जुलाई 1909 को ब्रिटिश भारत के कालका (आज का हरियाणा) में जन्मी अरुणा गांगुली एक शिक्षित बंगाली ब्राह्मण परिवार से थीं। उनका परिवार ब्रह्म समाज से जुड़ा हुआ था, जो उस दौर में सामाजिक सुधार और आधुनिक विचारों का समर्थन करता था। उनके पिता उपेंद्रनाथ गांगुली एक व्यवसायी थे, जबकि माँ अंबालिका देवी प्रसिद्ध समाज सुधारक त्रैलोक्यनाथ सान्याल की पुत्री थीं।

उनका परिवार साहित्य, शिक्षा और समाज सुधार से गहराई से जुड़ा था। उनके चाचा धीरेंद्रनाथ गांगुली भारतीय सिनेमा के शुरुआती फिल्म निर्देशकों में गिने जाते हैं, जबकि दूसरे चाचा नागेंद्रनाथ गांगुली ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बेटी मीरा देवी से विवाह किया था। उनकी बहन पूर्णिमा बनर्जी आगे चलकर भारत की संविधान सभा की सदस्य बनीं।

ऐसे वातावरण में पली-बढ़ी अरुणा ने बचपन से ही स्वतंत्र सोच, शिक्षा और सामाजिक न्याय के मूल्य सीखे। उन्होंने लाहौर के Sacred Heart Convent और नैनीताल के All Saints' College में शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे कोलकाता के गोखले मेमोरियल स्कूल में अध्यापिका बनीं। लेकिन शायद नियति ने उनके लिए केवल अध्यापन नहीं, बल्कि इतिहास लिखना तय कर रखा था।

एक ऐसा विवाह जिसने पूरे समाज को हिला दिया

इलाहाबाद में उनकी मुलाकात कांग्रेस नेता और प्रसिद्ध वकील आसफ अली से हुई। आसफ अली वही व्यक्ति थे जिन्होंने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का अदालत में बचाव किया था। वे अरुणा से लगभग 23 वर्ष बड़े थे और मुस्लिम थे।

1928 में दोनों ने विवाह करने का निर्णय लिया।

आज के समय में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन उस दौर में यह फैसला सामाजिक विद्रोह से कम नहीं था। परिवार ने इस रिश्ते का तीखा विरोध किया। अरुणा के संरक्षक चाचा ने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि उनके लिए अरुणा मर चुकी हैं और उन्होंने उनका श्राद्ध तक कर दिया।

लेकिन अरुणा ने समाज के डर के बजाय अपने विवेक की आवाज सुनी। यही साहस आगे चलकर उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य के सामने भी अडिग खड़ा करने वाला था।

जब जेल उनके संघर्ष की पहली पाठशाला बनी

विवाह के बाद अरुणा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गईं और नमक सत्याग्रह सहित अनेक आंदोलनों में सक्रिय भाग लेने लगीं।

1931 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। गांधी-इरविन समझौते के बाद अधिकांश राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने अरुणा को छोड़ने से इनकार कर दिया। जेल की अन्य महिला कैदियों ने भी जेल छोड़ने से मना कर दिया और कहा कि यदि अरुणा नहीं जाएँगी तो वे भी नहीं जाएँगी।

आखिरकार जनता के दबाव और महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया।

लेकिन उनका संघर्ष यहीं नहीं रुका।

1932 में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया और तिहाड़ जेल भेजा गया। वहाँ राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनके आंदोलन के बाद जेल प्रशासन को कई सुधार करने पड़े। हालांकि इसकी सजा उन्हें एकांत कारावास के रूप में मिली और बाद में अंबाला जेल भेज दिया गया।

9 अगस्त 1942... जब पूरा नेतृत्व जेल में था, तब एक महिला ने इतिहास बदल दिया

8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस ने "भारत छोड़ो आंदोलन" का प्रस्ताव पारित किया। महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का आह्वान किया।

ब्रिटिश सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए गांधी, नेहरू, पटेल और लगभग पूरे कांग्रेस नेतृत्व को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया।

अंग्रेजों को लगा कि नेतृत्व खत्म होते ही आंदोलन भी खत्म हो जाएगा।

लेकिन वे अरुणा आसफ अली को भूल चुके थे।

9 अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) में हजारों लोगों की भीड़ जमा थी। पुलिस चारों ओर तैनात थी। गिरफ्तारी और गोलियों का खतरा था।

ऐसे समय में अरुणा आसफ अली मंच पर पहुँचीं।

उन्होंने निर्भीक होकर तिरंगा फहराया।

यह केवल एक झंडा फहराने की घटना नहीं थी। यह संदेश था कि आंदोलन नेताओं की गिरफ्तारी से नहीं रुकेगा।

उस क्षण की तस्वीर पूरे भारत में प्रतिरोध का प्रतीक बन गई। अंग्रेजों के लिए यह खुली चुनौती थी और भारतीय युवाओं के लिए यह क्रांति का नया बिगुल।

जब अंग्रेजों ने उनकी हर चीज छीन ली, लेकिन उनका हौसला नहीं

तिरंगा फहराने के बाद अंग्रेजों ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।

उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई।

घर और सामान नीलाम कर दिए गए।

उनके सिर पर इनाम घोषित किया गया।

लेकिन अरुणा गिरफ्तार नहीं हुईं।

वे भूमिगत हो गईं और लगभग चार वर्षों तक अंग्रेजों को चकमा देती रहीं। इसी दौरान उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर कांग्रेस की गुप्त पत्रिका "इंकलाब" का संपादन किया।

उनके लेख युवाओं को केवल भाषण सुनने के लिए नहीं, बल्कि क्रांति में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते थे।

उन्होंने लिखा कि अब समय केवल बहस का नहीं, बल्कि कार्रवाई का है।

जब उन्होंने महात्मा गांधी की सलाह भी नहीं मानी

1946 में अरुणा लगातार भूमिगत जीवन जीते-जीते बेहद कमजोर हो चुकी थीं।

महात्मा गांधी ने उन्हें एक भावनात्मक पत्र लिखा।

उन्होंने कहा कि तुम्हारा साहस और बलिदान प्रेरणादायक है। अब सामने आकर आत्मसमर्पण कर दो। तुम्हारी गिरफ्तारी पर रखा गया इनाम हरिजन कल्याण में लगाया जा सकता है।

यह पत्र आज भी भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित पत्रों में गिना जाता है।

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अरुणा ने गांधी जी की इस सलाह को स्वीकार नहीं किया।

उन्होंने निर्णय लिया कि जब तक अंग्रेज स्वयं उनके खिलाफ जारी वारंट वापस नहीं लेते, तब तक वे सामने नहीं आएँगी।

बाद में जब इनाम और वारंट दोनों वापस लिए गए, तभी उन्होंने सार्वजनिक जीवन में वापसी की।

यह घटना दिखाती है कि वे गांधी जी का सम्मान करती थीं, लेकिन अंधानुकरण नहीं।

आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुआ उनका संघर्ष

1947 में देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन अरुणा का मिशन समाप्त नहीं हुआ।

उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक न्याय की लड़ाई अभी बाकी है।

1948 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी का दामन थाम लिया।

कुछ वर्षों बाद वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से भी जुड़ीं, हालांकि 1956 में सोवियत संघ की राजनीतिक घटनाओं के बाद उन्होंने उससे भी दूरी बना ली।

उन्होंने जीवनभर वामपंथी सामाजिक सोच, मजदूर अधिकार, महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक समानता के मुद्दों पर काम जारी रखा।

दिल्ली की पहली महिला मेयर बनने तक का सफर

1958 में अरुणा आसफ अली दिल्ली की पहली महिला मेयर चुनी गईं।

उन्होंने केवल राजनीति नहीं की बल्कि दिल्ली के विकास, नागरिक सुविधाओं, शिक्षा और सामाजिक कल्याण पर विशेष ध्यान दिया।

उन्होंने "Patriot" नामक दैनिक समाचार पत्र और "Link" साप्ताहिक पत्रिका की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पत्रकारिता को उन्होंने सत्ता की प्रशंसा का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवाज माना।

महिलाओं, दलितों और समाज के वंचित वर्गों के लिए आजीवन संघर्ष

अरुणा आसफ अली का मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है।

वे दलितों, मजदूरों और गरीबों के अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाती रहीं।

उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया।

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने महिलाओं के लिए आरक्षण का खुलकर समर्थन नहीं किया। उनका विश्वास था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ महिलाओं को कहीं अधिक मजबूत बनाएँगी।

उन्होंने अनियंत्रित औद्योगिकीकरण का भी विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि इससे पर्यावरण और समाज दोनों को नुकसान होगा।

सम्मान जिनसे बड़ी थी उनकी सादगी

अरुणा आसफ अली को जीवनभर अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।

उन्हें International Lenin Peace Prize, Jawaharlal Nehru Award for International Understanding, Padma Vibhushan और मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।

दिल्ली की एक प्रमुख सड़क अरुणा आसफ अली मार्ग उनके नाम पर है। उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया और दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल का नाम भी उनके नाम पर रखा गया।

लेकिन जिन लोगों ने उन्हें करीब से जाना, वे कहते हैं कि उन्हें पुरस्कारों से अधिक संतोष उस दिन मिला था, जब उन्होंने अंग्रेजों की आँखों में आँखें डालकर तिरंगा फहराया था।

क्यों आज भी अरुणा आसफ अली की कहानी अधूरी लगती है?

इतिहास में अक्सर वही चेहरे सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं जो सत्ता के केंद्र में रहे। लेकिन कई बार असली परिवर्तन उन लोगों ने किया, जिन्होंने सबसे कठिन समय में नेतृत्व संभाला।

अरुणा आसफ अली उन्हीं लोगों में से एक थीं।



उन्होंने सामाजिक बंधनों को तोड़ा, अंतरधार्मिक विवाह किया, जेल की यातनाएँ झेलीं, भूख हड़ताल की, अंग्रेजों से वर्षों तक बचती रहीं, भूमिगत रहकर आंदोलन को जीवित रखा, गांधी जी से मतभेद होने पर भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और आजादी के बाद भी समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम करती रहीं।

आज जब हम भारत छोड़ो आंदोलन को याद करते हैं, तो केवल 9 अगस्त 1942 का तिरंगा ही नहीं, बल्कि उस तिरंगे के पीछे खड़ी उस निर्भीक महिला को भी याद करना चाहिए जिसने साबित कर दिया था कि इतिहास केवल बड़े नेताओं से नहीं, बल्कि साहस से लिखा जाता है।

अरुणा आसफ अली का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त वही है जो परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाए।

OLDISGOLDFILMS ऐसी ही भूली-बिसरी ऐतिहासिक हस्तियों की अनसुनी कहानियों को आपके सामने लाता रहेगा, ताकि इतिहास केवल याद न रहे, बल्कि समझा भी जाए।


https://www.facebook.com/OldIsGoldFilmsOfficial/posts/pfbid0UnsYSH14ULRRtMTm5ZJVpPuA8JTgdtudFTE1GQagAv2D8Gbcvj5YpYqVykRC5USXl?__cft__[0]=AZZhQv2juugTQcC6AKHO7nqr_SrN8IRRU62qlVXCqNiIKZHkFTvBHZETCfHxuYhl0hkoTZSPDFTleOUSn-1x-4LSOfUY-8xSmmw_O-o0a33mW3F2Z-SHWnoCnd7Re9PbxGUj5kayL7-tLNG7yPV4Q9GiUaYBoEyltG0RyDcc0KcBrg&__tn__=%2CO%2CP-R