Thursday, 6 August 2026
भारत की पहली मिस इंडिया और अभिनेत्री : प्रमिला ------ संजोग वाल्टर
Saturday, 1 August 2026
मीना कुमारी : जन्मदिन पर स्मरण ------ Medhavini Mohann
पति है, पत्नी है, कोई अन्तरंग दृश्य नहीं। खाली एक मनुहार है अपने प्रीतम से कि प्रियतमा को छोड़ कर न जाया जाए...न जाओ सैयां, छुड़ा के बैयाँ, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी...रो पड़ूँगी! पौने चार मिनट का एक पूरा गाना महज एक कमरे में फ़िल्माया जाए। तिस पर उसका तक़रीबन 90 फ़ीसदी हिस्सा कमरे में बिछे बस एक पलंग पर गाया जाए।
आज की फिल्मों में एक गाना ही अक्सर देखने वालों को दुनिया की सैर करा देता है। ऐसे में अगर आज भी एक कमरे के एक पलंग पर एक ही कपड़ों में फिल्माए 1962 की किसी फ़िल्म के गाने को लोग बार-बार देखना चाहते हैं, तो ज़रूर उस चेहरे में कुछ बात रही होगी, जो इतनी देर तक स्क्रीन पर दिखता है। वो चेहरा था मीना कुमारी का।
फ़िल्म थी साहिब, बीबी और गुलाम। मीना कुमारी के चेहरे के चढ़ते-उतरते भाव, उनकी आँखों की अदाकारी और माथे पर टँकी बड़ी-सी बिन्दी...सब मिल कर इस तरह बाँध लेते हैं कि गाना ख़त्म होने पर सम्मोहन-सा टूटता है। ऐसा जादू था महज़बीन बानो से पहले बेबी मीना, फिर मीना कुमारी बनी 60 से 70 के दशक की कभी न भूली जा सकने वाली इस अदाकारा में।
भारतीय सिनेमा की 'ट्रैजिडी क्वीन' कही जाने वाली मीना कुमारी के बारे में एक बात अक्सर कही जाती है। वो यह कि उनके दर्द ने उन्हें मीना कुमारी बनाया। न चाहते हुए हुए भी बचपन में ही स्कूल की बजाय फ़िल्मों के सेट का रास्ता दिखा दिया जाना, ताकि परिवार की ज़िन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए वो भी एक पहिया बन सकें। परदे पर सफलता मिलने के शुरुआती दौर में ही एक एक्सीडेंट की वजह से अपने-परायों का असल चेहरा सामने आना और एक साथ कई फ़िल्में हाथ से छिन जाना। उस हाथ से, जिसकी दो उँगलियाँ भी उन्होंने एक्सीडेंट में खो दी थीं।
आगे चल कर एक शादीशुदा फ़िल्म निर्देशक के प्यार में पड़ना, उससे शादी करना, फिर उस शादी का न चलना। जहाँ-जहाँ मोहब्बत की तलाश की, वहाँ धोखे खाना। शायद ये ही कड़वे तजुर्बात उन्हें ज़िन्दगी भर सालते रहे। नाम, शोहरत, प्रशंसकों की चाहत, दौलत सब कुछ मिल कर भी उनके मन के खालीपन को नहीं भर पाता था। इस खालीपन को उन्होंने शराब के जामों से भरने की कोशिश की, पर मिली सिर्फ़ बीमारी। यही वजह थी कि 1 अगस्त 1933 में जन्मी मीना कुमारी चालीस बरस पूरे करने से पहले ही चल बसी थीं।
'गोमती के किनारे' उनकी आख़िरी फ़िल्म थी। उससे पहले 'पाकीज़ा' आई थी, जिसे उन्होंने पति कमाल अमरोही के साथ शुरू किया था। रिश्ता टूटने पर फ़िल्म पूरी होने की आस भी छूट गई थी। फिर भी किसी तरह इसकी दोबारा शूटिंग शुरू हुई। ज़िन्दगी और करियर के अपने आख़िरी दौर में मीना अब पुरानी मीना नहीं रही थीं। 10 साल पहले अपने भावमयी चेहरे की बिनाह पर जो अदाकारा लोगों को पलकें झपकाने का मौका नहीं देती थी, उसी की आख़िरी फ़िल्म में बहुत सारे दृश्य दूर से फ़िल्माने पड़े, कैमरे को उनसे ज़्यादा आसपास के नज़ारे दिखाने पड़े, क्योंकि बीमारी ने उन्हें बदल दिया था।
बताते हैं कि मीना कुमारी के नसीब ने उनके साथ खिलवाड़ उनके पैदा होते ही शुरू कर दिया था। घर की तंग हालत के चलते उनके पिता उन्हें एक अनाथालय में छोड़ आए थे। पर फिर उनका मन न माना और ज़ोर-ज़ोर से रोती अपनी बच्ची को वापस उठा लाए थे। इस बीच उस नन्हीं-सी बच्ची को चींटों ने बेहिसाब काट लिया था, जिस वजह से उसके नाजुक शरीर पर लाल-लाल निशान हो गए थे। बाद में वे निशान तो चले गए, पर दर्द के निशान शायद हमेशा के लिए उनकी रूह पर पड़ गए थे। उनकी रूह ज़िन्दगी भर एक अजीब क़िस्म की बेचैनी से जूझती रही। शायद यही बेचैनी उन्हें वक़्त से बहुत पहले निगल भी गई।
कभी अशोक कुमार ने मीना से उनके बचपन में मज़ाक किया था कि तुम जल्दी-से बड़ी हो जाओ, फिर मेरे साथ फ़िल्मों में हीरोइन बनना। यह सुन कर वहाँ मौजूद सभी लोग हँस पड़े थे। अशोक और मीना की उम्र में इतना ज्यादा फ़र्क़ जो था। तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि आगे चल कर वो सच में अशोक कुमार के साथ तमाशा, बहू-बेगम और जवाब जैसी फ़िल्में करेंगी।
'बहू-बेगम' में एक दृश्य के लिए उनके साथी कलाकार उन्हें हमेशा याद करते आए हैं। इसमें पिता अपनी बेटी को घर से बाहर निकाल रहा होता है और बेटी उन्हें ऐसा न करने की दुहाई दे रही होती है। बताते हैं कि उस करुण दृश्य के ख़त्म होने के बाद भी मीना कुमारी देर तक फूट-फूट कर रोती रही थीं। इस क़दर वह अपने किरदार में उतर जाती थीं या यह कहा जाए कि ज़िन्दगी से मिले दर्द उनके किरदार में उतर आते थे। शायद इस दृश्य को वह असल ज़िन्दगी में पहले ही जी चुकी थीं, जब कमाल अमरोही से शादी करने का फ़ैसला करने पर उनके पिता ने उनसे सारे रिश्ते तोड़ने चाहे थे।
दर्द मीना की ज़िन्दगी में उनकी उन दो कटी उँगलियों की तरह था, जिन्हें वह अपने दुपट्टे या साड़ी के आँचल में छुपाए रहती थीं। फ़र्क़ इतना था कि लोग लाख कोशिश करने पर भी परदे पर उनकी उन उँगलियों को देख नहीं पाते थे, मगर दर्द कभी आँखों, कभी चेहरे, कभी किरदारों की अदायगी में बयाँ हो ही जाता था। लोग सच ही कहते हैं। मीना कुमारी के दर्द ने ही उन्हें मीना कुमारी बनाया होगा।
Wednesday, 22 July 2026
"दर्द भरी सुरीली आवाज के सरताज" : मुकेश चन्द्र माथुर ------ रजनीश कुमार श्रीवास्तव
"दर्द भरी सुरीली आवाज के सरताज", "आवाज के जादूगर" और "दर्द भरे गीतों के बेताज बादशाह" #मुकेश चन्द्र माथुर जो फिल्म फेयर पुरस्कार पाने वाले पहले पुरूष पार्श्व गायक बने थे, के १०४ वें जन्मदिन पर उनका शत शत नमन।
हिन्दी सिनेमा की पार्श्व गायकी के सुपर स्टार मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 ई० को एक सम्पन्न कायस्थ परिवार में पिता जोरावर चन्द्र माथुर और माता चाँद रानी के घर दिल्ली में हुआ था।आवाज के इस जादूगर ने 1940 ई० से 27 अगस्त 1976 ई० तक अपने देहावसान के समय तक हिन्दी सिनेमा के 200 से ज्यादा फिल्मों में 1300 से ज्यादा बेमिसाल गीत गाए और अपने सदाबहार गीतों की वजह से लगातार तीन दशक तक श्रोताओं के दिल पर राज किया।भारत के अलावा रूस और अमेरिका में भी इनके करोड़ों चाहने वाले थे।रूस में जहाँ उनका गीत,"मेरा जूता है जापानी" लोगों के जुबान पर लम्बे समय तक चढ़ा रहा तो अमेरिका के डेट्रॉयट(मिशिगन) के एक समारोह में अपना प्रसिद्ध गीत "इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल,जग में रह जाएँगे प्यारे तेरे बोल " गाते हुए हृदयघात हो जाने से 27 अगस्त 1976 ई० को वे सदा के लिए अमर हो गए और रह गये तो सिर्फ उनके सुरीले बोल।
हिन्दी सिनेमा गायकी में उनका प्रवेश उनके दूर के रिश्तेदार प्रसिद्ध अभिनेता मोती लाल जी ने कराया था।इनके अविस्मर्णीय सहयोग से दिल्ली में पी डब्लू डी में असिस्टेन्ट सर्वेयर की नौकरी करने वाले मुकेश ने 1941 ई० में फिल्म "निर्दोष" से अपना कैरियर शुरू कर 1945 ई० में फिल्म "पहली नज़र" के प्रसिद्ध गीत "दिल जलता है तो जलने दे,आँसू ना बहा फरियाद ना कर" के द्वारा अपना जलवा पूरे फिल्मी जगत में फैला दिया और फिर इस उभरते सितारे का यादगार सफर तीन दशकों तक तीन सर्वकालिक महान अभिनेताओं #दिलीप कुमार,#राजकपूर और #मनोज कुमार की आवाज बनकर प्रसिद्धि के नित नए प्रतिमान गढ़ने लगा।तात्कालिक समय के पार्श्व गायकी के दिग्गज और अपने आदर्श कुन्दन लाल सहगल तथा पंकज मलिक की छत्रछाया से बाहर निकल कर हिन्दी सिनेमा की पार्श्व गायकी के स्वर्ण युग में मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के अद्भुत गायकी के विशिष्ट दौर में अपनी अनमोल छाँप छोड़कर ट्रेजड़ी किंग दिलीप कुमार, हिन्दी सिनेमा के शो मैन राजकपूर और बेमिसाल सुपर स्टार मनोज कुमार की लगातार तीन दशकों तक आवाज बने रहना एक बेमिसाल कारनामें से कम नहीं था।तभी तो मुकेश के देहावसान पर शोक में डूबे शो मैन राजकपूर ने सार्वजनिक उदघोष करते हुए कहा था कि,"मैने अपनी आवाज सदा के लिए खो दी है।" राजकपूर अक्सर कहा करते थे कि," मैं तो बस शरीर हूँ मेरी आत्मा तो मुकेश है।"
संगीतकार नौसाद,अनिल विश्वास और शंकर जयकिशन के साथ मुकेश की अदभुत गायकी ने एक से बढ़कर एक अनमोल गीत भारतीय सिनेमा को दिए।मुकेश को अपनी लाजवाब गायकी के कारण 1959, 1970, 1972 और 1976 ई० में चार बार फिल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ तो 1974 ई० में फिल्म रजनीगंधा के गीत "कई बार यूँ भी देखा है" के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
रोशन, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीप्यारे के साथ भी इनका काम उल्लेखनीय रहा। उनके तीन फिल्मफेयर बेस्ट सिंगर पुरस्कार में संगीत एस जे डुओ का एवं एक फिल्म फेयर पुरस्कार में संगीत खय्याम का रहा है।
"किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार" से लेकर "सावन का महीना पवन करे शोर" और फिर "दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई" से लेकर "सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है" के सदाबहार गीतों को अपनी बेमिसाल गायकी से अमर कर देने वाले मुकेश केवल पल दो पल के शायर ही नहीं बल्कि हर पल के नायाब फनकार थे।इस सर्वकालिक महान पार्श्व गायक का उनके जन्मदिन पर शत शत नमन।
Monday, 20 July 2026
मुबारक़ बेग़म / केदार शर्मा ------ Qissa TV's Post
अरुणा आसफ अली ------ Old is Gold Films's Post
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे नाम हैं जिन्हें इतिहास की किताबों में कुछ पन्नों तक सीमित कर दिया गया, जबकि उनका योगदान किसी पूरे अध्याय से कम नहीं था। जब भी "भारत छोड़ो आंदोलन" की बात होती है, हमारे मन में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य बड़े नेताओं की छवि उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 9 अगस्त 1942 की वह सुबह, जब लगभग पूरा कांग्रेस नेतृत्व अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका था, तब एक महिला ने हजारों लोगों के सामने तिरंगा फहराकर पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दे दी थी। यही महिला थीं अरुणा आसफ अली।
उन्हें "भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका", "1942 की रानी" और बाद में "Grand Old Lady of the Independence Movement" कहा गया। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान केवल तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महात्मा गांधी के सम्मान के बावजूद, जब उन्हें लगा कि उनका रास्ता अलग है, तब गांधी जी की सलाह तक मानने से इनकार कर दिया। आखिर ऐसी कौन-सी महिला थी, जिसने देश की आजादी के लिए अपना घर, संपत्ति, पहचान और वर्षों का जीवन दांव पर लगा दिया? यही कहानी है उस असाधारण व्यक्तित्व की, जिसे आज भी भारत पूरी तरह जान नहीं पाया है।
एक ऐसे परिवार में जन्म, जहाँ विचारों की आजादी विरासत थी
16 जुलाई 1909 को ब्रिटिश भारत के कालका (आज का हरियाणा) में जन्मी अरुणा गांगुली एक शिक्षित बंगाली ब्राह्मण परिवार से थीं। उनका परिवार ब्रह्म समाज से जुड़ा हुआ था, जो उस दौर में सामाजिक सुधार और आधुनिक विचारों का समर्थन करता था। उनके पिता उपेंद्रनाथ गांगुली एक व्यवसायी थे, जबकि माँ अंबालिका देवी प्रसिद्ध समाज सुधारक त्रैलोक्यनाथ सान्याल की पुत्री थीं।
उनका परिवार साहित्य, शिक्षा और समाज सुधार से गहराई से जुड़ा था। उनके चाचा धीरेंद्रनाथ गांगुली भारतीय सिनेमा के शुरुआती फिल्म निर्देशकों में गिने जाते हैं, जबकि दूसरे चाचा नागेंद्रनाथ गांगुली ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बेटी मीरा देवी से विवाह किया था। उनकी बहन पूर्णिमा बनर्जी आगे चलकर भारत की संविधान सभा की सदस्य बनीं।
ऐसे वातावरण में पली-बढ़ी अरुणा ने बचपन से ही स्वतंत्र सोच, शिक्षा और सामाजिक न्याय के मूल्य सीखे। उन्होंने लाहौर के Sacred Heart Convent और नैनीताल के All Saints' College में शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे कोलकाता के गोखले मेमोरियल स्कूल में अध्यापिका बनीं। लेकिन शायद नियति ने उनके लिए केवल अध्यापन नहीं, बल्कि इतिहास लिखना तय कर रखा था।
एक ऐसा विवाह जिसने पूरे समाज को हिला दिया
इलाहाबाद में उनकी मुलाकात कांग्रेस नेता और प्रसिद्ध वकील आसफ अली से हुई। आसफ अली वही व्यक्ति थे जिन्होंने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का अदालत में बचाव किया था। वे अरुणा से लगभग 23 वर्ष बड़े थे और मुस्लिम थे।
1928 में दोनों ने विवाह करने का निर्णय लिया।
आज के समय में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन उस दौर में यह फैसला सामाजिक विद्रोह से कम नहीं था। परिवार ने इस रिश्ते का तीखा विरोध किया। अरुणा के संरक्षक चाचा ने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि उनके लिए अरुणा मर चुकी हैं और उन्होंने उनका श्राद्ध तक कर दिया।
लेकिन अरुणा ने समाज के डर के बजाय अपने विवेक की आवाज सुनी। यही साहस आगे चलकर उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य के सामने भी अडिग खड़ा करने वाला था।
जब जेल उनके संघर्ष की पहली पाठशाला बनी
विवाह के बाद अरुणा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गईं और नमक सत्याग्रह सहित अनेक आंदोलनों में सक्रिय भाग लेने लगीं।
1931 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। गांधी-इरविन समझौते के बाद अधिकांश राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने अरुणा को छोड़ने से इनकार कर दिया। जेल की अन्य महिला कैदियों ने भी जेल छोड़ने से मना कर दिया और कहा कि यदि अरुणा नहीं जाएँगी तो वे भी नहीं जाएँगी।
आखिरकार जनता के दबाव और महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया।
लेकिन उनका संघर्ष यहीं नहीं रुका।
1932 में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया और तिहाड़ जेल भेजा गया। वहाँ राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनके आंदोलन के बाद जेल प्रशासन को कई सुधार करने पड़े। हालांकि इसकी सजा उन्हें एकांत कारावास के रूप में मिली और बाद में अंबाला जेल भेज दिया गया।
9 अगस्त 1942... जब पूरा नेतृत्व जेल में था, तब एक महिला ने इतिहास बदल दिया
8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस ने "भारत छोड़ो आंदोलन" का प्रस्ताव पारित किया। महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का आह्वान किया।
ब्रिटिश सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए गांधी, नेहरू, पटेल और लगभग पूरे कांग्रेस नेतृत्व को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया।
अंग्रेजों को लगा कि नेतृत्व खत्म होते ही आंदोलन भी खत्म हो जाएगा।
लेकिन वे अरुणा आसफ अली को भूल चुके थे।
9 अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) में हजारों लोगों की भीड़ जमा थी। पुलिस चारों ओर तैनात थी। गिरफ्तारी और गोलियों का खतरा था।
ऐसे समय में अरुणा आसफ अली मंच पर पहुँचीं।
उन्होंने निर्भीक होकर तिरंगा फहराया।
यह केवल एक झंडा फहराने की घटना नहीं थी। यह संदेश था कि आंदोलन नेताओं की गिरफ्तारी से नहीं रुकेगा।
उस क्षण की तस्वीर पूरे भारत में प्रतिरोध का प्रतीक बन गई। अंग्रेजों के लिए यह खुली चुनौती थी और भारतीय युवाओं के लिए यह क्रांति का नया बिगुल।
जब अंग्रेजों ने उनकी हर चीज छीन ली, लेकिन उनका हौसला नहीं
तिरंगा फहराने के बाद अंग्रेजों ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।
उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई।
घर और सामान नीलाम कर दिए गए।
उनके सिर पर इनाम घोषित किया गया।
लेकिन अरुणा गिरफ्तार नहीं हुईं।
वे भूमिगत हो गईं और लगभग चार वर्षों तक अंग्रेजों को चकमा देती रहीं। इसी दौरान उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर कांग्रेस की गुप्त पत्रिका "इंकलाब" का संपादन किया।
उनके लेख युवाओं को केवल भाषण सुनने के लिए नहीं, बल्कि क्रांति में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते थे।
उन्होंने लिखा कि अब समय केवल बहस का नहीं, बल्कि कार्रवाई का है।
जब उन्होंने महात्मा गांधी की सलाह भी नहीं मानी
1946 में अरुणा लगातार भूमिगत जीवन जीते-जीते बेहद कमजोर हो चुकी थीं।
महात्मा गांधी ने उन्हें एक भावनात्मक पत्र लिखा।
उन्होंने कहा कि तुम्हारा साहस और बलिदान प्रेरणादायक है। अब सामने आकर आत्मसमर्पण कर दो। तुम्हारी गिरफ्तारी पर रखा गया इनाम हरिजन कल्याण में लगाया जा सकता है।
यह पत्र आज भी भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित पत्रों में गिना जाता है।
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अरुणा ने गांधी जी की इस सलाह को स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने निर्णय लिया कि जब तक अंग्रेज स्वयं उनके खिलाफ जारी वारंट वापस नहीं लेते, तब तक वे सामने नहीं आएँगी।
बाद में जब इनाम और वारंट दोनों वापस लिए गए, तभी उन्होंने सार्वजनिक जीवन में वापसी की।
यह घटना दिखाती है कि वे गांधी जी का सम्मान करती थीं, लेकिन अंधानुकरण नहीं।
आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुआ उनका संघर्ष
1947 में देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन अरुणा का मिशन समाप्त नहीं हुआ।
उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक न्याय की लड़ाई अभी बाकी है।
1948 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी का दामन थाम लिया।
कुछ वर्षों बाद वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से भी जुड़ीं, हालांकि 1956 में सोवियत संघ की राजनीतिक घटनाओं के बाद उन्होंने उससे भी दूरी बना ली।
उन्होंने जीवनभर वामपंथी सामाजिक सोच, मजदूर अधिकार, महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक समानता के मुद्दों पर काम जारी रखा।
दिल्ली की पहली महिला मेयर बनने तक का सफर
1958 में अरुणा आसफ अली दिल्ली की पहली महिला मेयर चुनी गईं।
उन्होंने केवल राजनीति नहीं की बल्कि दिल्ली के विकास, नागरिक सुविधाओं, शिक्षा और सामाजिक कल्याण पर विशेष ध्यान दिया।
उन्होंने "Patriot" नामक दैनिक समाचार पत्र और "Link" साप्ताहिक पत्रिका की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पत्रकारिता को उन्होंने सत्ता की प्रशंसा का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवाज माना।
महिलाओं, दलितों और समाज के वंचित वर्गों के लिए आजीवन संघर्ष
अरुणा आसफ अली का मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है।
वे दलितों, मजदूरों और गरीबों के अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाती रहीं।
उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया।
दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने महिलाओं के लिए आरक्षण का खुलकर समर्थन नहीं किया। उनका विश्वास था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ महिलाओं को कहीं अधिक मजबूत बनाएँगी।
उन्होंने अनियंत्रित औद्योगिकीकरण का भी विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि इससे पर्यावरण और समाज दोनों को नुकसान होगा।
सम्मान जिनसे बड़ी थी उनकी सादगी
अरुणा आसफ अली को जीवनभर अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।
उन्हें International Lenin Peace Prize, Jawaharlal Nehru Award for International Understanding, Padma Vibhushan और मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।
दिल्ली की एक प्रमुख सड़क अरुणा आसफ अली मार्ग उनके नाम पर है। उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया और दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल का नाम भी उनके नाम पर रखा गया।
लेकिन जिन लोगों ने उन्हें करीब से जाना, वे कहते हैं कि उन्हें पुरस्कारों से अधिक संतोष उस दिन मिला था, जब उन्होंने अंग्रेजों की आँखों में आँखें डालकर तिरंगा फहराया था।
क्यों आज भी अरुणा आसफ अली की कहानी अधूरी लगती है?
इतिहास में अक्सर वही चेहरे सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं जो सत्ता के केंद्र में रहे। लेकिन कई बार असली परिवर्तन उन लोगों ने किया, जिन्होंने सबसे कठिन समय में नेतृत्व संभाला।
अरुणा आसफ अली उन्हीं लोगों में से एक थीं।
उन्होंने सामाजिक बंधनों को तोड़ा, अंतरधार्मिक विवाह किया, जेल की यातनाएँ झेलीं, भूख हड़ताल की, अंग्रेजों से वर्षों तक बचती रहीं, भूमिगत रहकर आंदोलन को जीवित रखा, गांधी जी से मतभेद होने पर भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और आजादी के बाद भी समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम करती रहीं।
आज जब हम भारत छोड़ो आंदोलन को याद करते हैं, तो केवल 9 अगस्त 1942 का तिरंगा ही नहीं, बल्कि उस तिरंगे के पीछे खड़ी उस निर्भीक महिला को भी याद करना चाहिए जिसने साबित कर दिया था कि इतिहास केवल बड़े नेताओं से नहीं, बल्कि साहस से लिखा जाता है।
अरुणा आसफ अली का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त वही है जो परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाए।
OLDISGOLDFILMS ऐसी ही भूली-बिसरी ऐतिहासिक हस्तियों की अनसुनी कहानियों को आपके सामने लाता रहेगा, ताकि इतिहास केवल याद न रहे, बल्कि समझा भी जाए।
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