लता मंगेशकर के उस बदमिज़ाज ड्राइवर को शायद अंदाज़ा भी नहीं होगा कि उसकी हरक़त एक दूसरी गायिका के लिए शोहरत का रास्ता तैयार करेगी। किसी वक्त के नामी फ़िल्मकार किदार शर्मा साहब ने अपनी आत्मकथा "द वन एंड लोनली किदार शर्मा" में इस घटना का ज़िक्र किया था। उस किताब में जो बताया गया है वो किस्सा कुछ यूं है कि किदार शर्मा साल फ़िल्म "हमारी याद आएगी" के म्यूज़िक की तैयारियों में लगे थे।
फ़िल्म का टाइटल ट्रैक वो लता जी से गवाना चाहते थे। अपनी आत्मकथा "द वन एंड लोनली किदार शर्मा" में किदार शर्मा जी ने लिखा है कि लता मंगेशकर दो बार इस फ़िल्म का टाइटल ट्रैक "कभी तनहाईयों में यूं हमारी याद आएगी" की रिकॉर्डिंग कैंसिल करके चली गई थी।
किदार शर्मा बताते हैं कि दोनों दफ़ा लता जी के ड्राइवर ने उनसे 140 रुपए की डिमांड की थी। वो ड्राइवर बड़े रौब से कहता था कि रिकॉर्डिंग तब होगी जब आप मुझे एक सौ चालीस रुपए दे देंगे। किदार शर्मा जी ने उससे पूछा भी कि वो एक सौ चालीस रुपए किस बात के लिए मांग रहा है?
जवाब में उस ड्राइवर ने कहा कि सब उसे रुपए देते हैं। आपको भी देने होंगे। तब किदार शर्मा ने कहा कि मैं औरों को नहीं जानता। लेकिन लता जी की जो शर्तें मुझसे तय हुई हैं मैं बस उन्हें मानूंगा। और उन शर्तों में ये बात कहीं नहीं है कि मुझे तुम्हें एक सौ चालीस रुपए देने होंगे।
किदार शर्मा जी की वो बात सुनकर लता मंगेशकर जी का ड्राइवर मुस्कुराया और बोला,"तो ठीक है। कोशिश करके देख लीजिए अगर रिकॉर्डिंग हो जाए तो।" थोड़ी देर बाद किदार शर्मा को पता चला कि लता जी स्टूडियो से चली गई हैं। ये उस दिन की बात है जिस दिन लता जी दूसरी दफ़ा उस गाने की रिकॉर्डिंग कैंसिल करके गई थी।
किदार शर्मा अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि लता जी का वो रवैया उन्हें बहुत ग़ैरज़िम्मेदाराना लगा। किदार शर्मा ने फ़ैसला किया कि वो लता मंगेशकर से उस गाने को गवाएंगे ही नहीं। उन्होंने मुबारक बेगम से बात की। और उन्हें वो गाना गवाने के लिए बुला लिया। और मुबारक बेगम ने वो गाना रिकॉर्ड कर दिया।
रिकॉर्डिंग से पहले मुबारक़ बेगम ने किदार शर्मा से एक रिक्वेस्ट की थी। मुबारक़ बेग़म ने कहा था,"शर्मा जी, मैं आपसे अकेले में बात करना चाहती हूं। क्या आप एक मिनट के लिए दूसरे कमरे में चल सकते हैं?" मुबारक बेगम ने बहुत प्यार से विनती करते हुए किदार शर्मा से ये कहा था। उस वक्त वहां संगीतकार स्नेहल भाटकर भी मौजूद थे। वो समझ गए कि कोई तो ज़रूरी बात होगी जो मुबारक बेगम ऐसा कह रही हैं। स्नेहल भाटकर मुस्कुराए और उन्होंने किदार शर्मा को दूसरे कमरे में जाने का इशारा किया।
दूसरे कमरे में आकर मुबारक बेगम किदार शर्मा से बोली,"हम बहुत गरीब हैं शर्मा जी। ये धुन बहुत शानदार है। लेकिन बहुत मुश्किल भी है। मैंने दो दिनों से कुछ नहीं खाया है। क्या आप मेरे लिए सिर्फ़ दो ब्रैड के पीस और एक कप चाय मंगा सकते हैं?" मुबारक बेगम की आंखों में आंसू आ गए थे किदार शर्मा साहब से ये बात कहते हुए। किदार शर्मा ने फौरन मुबारक बेगम के लिए दो ब्रेड स्लाइस और एक कप चाय ऑर्डर की। और मन ही मन उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि ईश्वर ने उन्हें किसी भूखे का पेट भरने का मौका दिया।
चाय-ब्रैड खाकर मुबारक बेगम ने वो गाना रिकॉर्ड किया। और इतनी खूबसूरती से रिकॉर्ड किया कि वो उस फ़िल्म का सबसे लोकप्रिय गाना बन गया। उस गाने के बोल थे 'कभी तनहाईयों में यूं हमारी याद आएगी।' ये गाना लिखा भी खुद किदार शर्मा जी ने था। ये फ़िल्म साल 1961 में रिलीज़ हुई थी। किदार शर्मा ने इसे डायरेक्ट किया था। और लिखी भी उन्होंने ही थी ये फिल्म।
इस फ़िल्म में हीरो थे किदार शर्मा के पुत्र अशोक शर्मा। और जानते हैं हीरोइन कौन थी इसमें? शोभना समर्थ की बेटी और नूतन की छोटी बहन तनुजा। ये वही फ़िल्म है जिसकी शूटिंग के दौरान किदार शर्मा ने तनुजा के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ मारा था। क्योंकि एक सीन के दौरान तनुजा गंभीर होकर काम नहीं कर रही थी।
राज कपूर के बाद तनुजा दूसरी थी जिसने किदार शर्मा से थप्पड़ खाया था। किदार शर्मा अपनी आत्मकथा में ही लिखते हैं कि लता मंगेशकर अगर उस गाने को गाती तो यकीनन वो गाना बहुत शानदार होता। लेकिन तब शायद उस गाने को वो अनूठापन ना मिलता, जो मुबारक बेगम की गायकी से मिला था।
आज मुबारक बेगम को इस दुनिया से गए 10 साल हो गए हैं। मुबारक बेगम की डेथ एनिवर्सरी है आज । 18 जुलाई 2016 को उनका देहांत हुआ था। मुबारक बेगम के जीवन पर एक विस्तृत लेख हमने लिखा था काफ़ी पहले। मुबारक बेग़म के जीवन के संघर्षों के बारे में बहुत कुछ बताया गया है उस लेख में। वो लेख आपको कमेंट सेक्शन में पढ़ने के लिए मिल जाएगा। उस लेख में मुबारक बेगम के जीवन से जुड़ी कई रोचक बातें आपको जानने को मिलेंगी। किस्सा टीवी मुबारक बेगम को नमन करता है।
ये लेख अगर आपको पसंद आया हो तो इसे लाइक-शेयर अवश्य करें। और क़िस्सा टीवी को फॉलो भी कर लें। ये जितनी भी कहानी है, वो सब किदार शर्मा साहब ने अपनी आत्मकथा में बताई है। किदार शर्मा अपना नाम ऐसे ही लिखते थे। वो केदार शर्मा नहीं लिखते थे। तो जैसे वो अपना नाम लिखते थे, हम हमेशा उनके लेख में ऐसे ही उनका नाम लिखते हैं। बाकि, आप उन्हें केदार शर्मा कहें, उसमें भी कुछ गलत नहीं है। #
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