Sunday, 25 October 2015

Sharda Rajan Iyengar, or Sharda, (25 October) ------ Sanjog Walter

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Happy Birtday-"Titli udi"
Sharda Rajan Iyengar, or Sharda, (25 October) was a playback singer in Hindi films in the 1960s and 70s. She won the Filmfare Award for Best Female Playback Singer for the cabaret "Baat Zara Hai Aapas Ki" in Jahan Pyar Miley (1970), though she is most remembered for her song "Titli Udi" in Suraj (1966). In 2007, she released the album Andaaz – e – Bayan Aur, featuring her own compositions based on Mirza Ghalib's ghazals, a musical form from Turkey.
Sharda belonged to a conservative Brahmin family from Tamil Nadu, India and was inclined towards music from childhood. She has the distinction of being a BA graduate.
Early in her career Sharda was offered a voice test by Showman Raj Kapoor when he first heard her singing in a function at Shrichand Ahuja's residence in Tehran. She got her first big break in Bollywood with the song "Titli Udi" in Suraj (1966). She was promoted by Shankar of the Shankar Jaikishan duo.
"Titli udi" turned out to be a top chartbuster in 1966. It so happens that the coveted Filmfare award for best playback singer had only one category (either male or female) until 1966. "Titli Udi" song, however, was tied as best song with Mohd Rafi's song "Baharo Phool Barsao" which had never happened before. Sharda didn't win the award but from then on Filmfare started giving two awards for best playback singer: one for male singer and the other for female singer. Thus Sharda made history. Thereafter Sharda was nominated four years in a row (1968–71) for best female playback singer and won another Filmfare award. In a short span Sharda won two Filmfare awards, when the Mangeshkar Sisters were dominating. Thereafter she continued singing for Shankar in nearly all of his films until his death. Her voice was last heard in Kaanch Ki Deewar (1986).
She sang with most of the top singers like Mohd Rafi, Asha Bhosle, Kishore Kumar, Yesudas, Mukesh and Suman Kalyanpur. She lent her voice to leading ladies of the time like Vyjayanthimala, Saira Banu, Hema Malini, Sharmila Tagore, Mumtaz, Rekha and Helen. Besides Shankar she recorded songs with Usha Khanna, Ravi, Dattaram, Iqbal Qureshi and a few others. She was the first Indian female singer to cut her own pop album in India, called Sizzlers in 1971 which was launched by HMV.
She performed on stage on several occasions like Filmfare Awards functions, charity shows, naval functions, and many others.
Sharda was never able to reach the top bracket of singers but she did manage to create a certain section of the music listeners as her fans and well wishers. She conducts music lessons for children and aspiring singers. Besides Hindi she also sang in Telugu, Marathi, English, and Gujrathi.
On 21 July 2007 Sharda released her Ghazal album Andaaz-e-Bayan Aur, a compilation of Mirza Ghalib's ghazals. The album was released at Juhu Jagriti Mumbai at the hands of actress Shabana Azmi. Music Director Khayyam was present at the release party, where Sharda thrilled the audience by singing a few songs from the album in her well-preserved voice.
Shankar composed a song "Ek Chehra jo Dil Ke Kareeb" for a film called Garam Khoon (1980), sung by Lata Mangeshkar which was penned by Sharda and picturised on Sulakshana Pandit.
She turned Music Director in the mid-1970s and gave music for films like Maa Behen Aur Biwi, Tu Meri Main Tera, Kshitij, Mandir Masjid and Maila Anchal. Mohd Rafi was nominated for Filmfare Best Male Playback Singer Award for the song "Achcha Hi Hua Dil Toot Gaya" from Maa Behen Aur Biwi (1974), which he sang under Sharda's music direction.
Popular songs
"Titli udi" (Suraj)
"Jaan e Chaman" (Gumnaam) – with Mohd Rafi
"Leja Leja mera dil" (An Evening in Paris)
"Chale jana zara" (Around The World) – with Mukesh
"Tum Pyar se dekho" (Sapno Ka Saudagar) – with Mukesh
"Woh Pari kahan se" (Pehchan) – with Mukesh and Suman Kalyanpur
"Kisike dil ko" (Kal Aaj Aur Kal)
"Jab bhi yeh dil udaas" (Seema) – with Mohd Rafi
"Aap ki Rai Mere Baare Mein" (Elaan) – with Mohd Rafi
"Jane Anjane Yahan" (Jane Anjane)
"Jaane bhi De Sanam Mujhe ,abhi jaane..." (Around the World)
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Saturday, 24 October 2015

पुण्य तिथि :मन्ना डे - तू प्यार का सागर है… - वीर विनोद छाबड़ा

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Vir Vinod Chhabra

मन्ना डे - तू प्यार का सागर है…
- वीर विनोद छाबड़ा 
प्रबोध चंद्र डे उर्फ मन्ना डे की आज पुण्य तिथि है। 

ऐ मेरे प्यारे वतन...ये कहानी है दिये और तूफ़ान की...ये रात भीगी-भीगी...प्यार हुआ इकरार हुआ...रमैया वता वैया....मुस्कुरा लाड़ले मुस्कुरा, कोई भी फूल नहीं है तुझसा खूबसूरत...याला-याला दिल ले गयी...ऐ मेरी ज़ोहरा जबीं...कौन आया मेरे दिल के द्वारे....पूछो ना कैसे मैंने रैन बिताई...लागा चुनरी में दाग़ ...झनक झनक मोरी बाजे पायलिया...किसने चिलमन से मारा…ऐ भाई ज़रा देख के चलो...चलत मुसाफिर ले लियो पिंजरे वाली मुनिया...मस्ती भरा ये समां है...कस्मे वादे, प्यार-वफ़ा सब....ना मांगू सोना-चांदी....फिर न कहना माईकल दारू पीके दंगा करता है.…प्यार की आग में तन-बदन जल गया...हंसने की चाह न मुझे....तुझे सूरज कहूं या चंदा...फुल गेंदवा ना मारो...तू प्यार का सागर है....अभी तो हाथ में जाम है.…आदि बेशुमार अमर नग़मों के गायक प्रबोध चंद्र डे घरेलू नाम ’मन्ना’ डे के नाम से विख्यात हुए।

मन्ना सोलो में ही युगल गानों के भी उस्ताद रहे। लता जी के साथ सौ से अधिक युगल गाये। मस्ती भरा ये समां है...नैन मिले चैन कहां...तुम गगन के चंद्रमा हो, मैं धरा की धूल हूं...दिल की गिरह खोल दो...चुनरी संभाल गोरी...आदि अप्रितम गायन की सीमा हैं। 
आशा के साथ भी मन्ना की जोड़ी भी खूब जमी। ये हवा, ये नदी का किनारा...तू छुपी है कहां मैं तड़पता यहां....जोड़ी हमारी जमेगा कैसे जानी...न तो कारवां की तलाश है....जिंदगी है खेल, कोई पास कोई फेल...आज भी जु़बान पर हैं। 
मोहम्मद रफी के साथ भी मन्ना ने अनगिनित गीत गाये। बड़े मियां दीवाने ऐसे न बनो...दो दीवाने दिल के...आदि के दीवाने तो आज भी हैं। 
मन्ना ने किशोर कुमार के साथ भी खूब गाया। बाबू समझो इशारे, हारन पुकारे....एक चुतर नार करके श्रंगार...तो आज भी याद हैं। 'पड़ोसन' के ‘एक चतुर नार...’ के बाद मन्ना की किशोर से अनबन हो गयी थी। दरअसल, किशोर क्लासिकल गाने के माहिर नहीं थे। बताते हैं, मन्ना ने ही उनको खूब रियाज़ कराया। लेकिन जब अंततः रिकार्ड सामने आया तो मन्ना को लगा कि उन्हें जान-बूझ कर किशोर से हारा हुआ प्रोजेक्ट किया गया है। बाद में बामुश्किल मन्ना की ग़लतफ़हमी दूर की गयी कि वो हार उनकी नहीं क़िरदार की थी। उन्होंने किशोर के साथ फिर से कई गाने गाये। इसमें यह गाना तो बेहद पापुलर हुआ- ये दोस्ती हम नहीं छोडेंगे....। मन्ना ने लता व आशा के साथ सौ से ज्यादा और रफी व किशोर के साथ पचास से ज्यादा जुगलबंदियां कीं।
मन्ना के प्रेरणा स्त्रोत उनके चाचा विख्यात संगीतज्ञ-गायक के.सी.डे रहे। वो जन्मांध थे। उनकी मदद के वास्ते ही मन्ना कलकत्ता से मुंबई आए थे। शास़्त्रीय संगीत में मन्ना की पकड़ इतनी अच्छी थी कि महापंडित भीमसेन जोशी भी उनके गायन के मुरीद थे। मन्ना को एकल गाने का पहला ब्रेक १९४३ में मिला। हुआ यों कि ‘राम राज्य’के लिये के.सी. डे को प्लेबैक का ऑफर मिला। लेकिन उन्होंने मना कर दिया कि अपनी आवाज़ किसी अन्य एक्टर को उधार नहीं दे सकता। तब उनके साथ आये मन्ना से डायरेक्टर विजय भट्ट और संगीत निर्देशक शंकर राव व्यास ने बात की। तनिक झिझक के बाद वो तैयार हो गए। ये गीत था- गयी तू गयी, सीता सती...। 
मन्ना किसी एक एक्टर की आवाज़ नहीं रहे। उनके एक से बढ़ कर एक मशहूर गाने राजकपूर, देवानंद, शम्मीकपूर, बलराज साहनी, राजकुमार, अशोक कुमार, प्राण सरीखे नामी अभिनेताओं पर फिल्माए गये। हालांकि कोशिश ज़रूर हुई कि उन्हें सिर्फ आगा, अनूप कुमार, महमूद आदि कामेडियन की आवाज़ तक सीमित रखा जाए। 
कहा जाता है कि किसी भी गायक को कॉपी करना आसान है मगर मन्ना की आवाज़ की जस-की-तस कॉपी करना नामुमकिन रहा। भला भी आत्मा से निकली आवाज़ की कभी कॉपी हो सकती है। 
हर इंसान के कैरीयर का अंत सुनिश्चित है।चाहे वो छोटा हो या बड़ा। नए-नए गायकों के आने के कारण साठ के दशक का अंत आते-आते मन्ना की डिमांड घटने लगी। सत्तर के दशक में उन्होंने कम गाया। अस्सी के दशक में उन्हें न के बराबर काम मिला। अंततः उन्होंने फिल्म इंडस्टी को अलविदा कह दी। 
फुटबाल, क्रिकेट, कुश्ती व पतंगबाजी के बेहद शौकीन मन्ना ने संगीत से शास्त्रीयता व मिठास को गायब होते देख २००१ में मंबई को अलविदा कह दिया और छोटी बेटी सुमिता के घर बैंगलौर आ गए। उन्हों साठ से ज्यादा साल तक गायन को अपनी आत्मा दी थी। 
बांग्ला में प्रकाशित ‘जीबोनेर जलसा घरे’उनकी आत्मकथा है जो हिंदी में ‘यादें जी उठीं’के नाम से प्रकाशित हुई। पद्मश्री, पद्मविभूषण, दादा साहब फालके, फ़िल्मफे़यर लाईफ़टाईम आदि अनेक अवार्ड उन्हें मिले। मगर हर बार यही दिखा कि इससे मन्ना नहीं अपितु अवार्ड का मान बढ़ा। अवार्ड उनकी बहुआयामी प्रतिभा व व्यक्त्वि के समक्ष हमेशा बौने रहे। 
मन्ना डे का जन्म ०१ मई १९१९ को कलकत्ता में हुआ था और २४ अक्टूबर २०१३ को बंगलूर में अमर आवाज़ों की दुनिया का ये जादूगर दुनिया के समक्ष ये पहेली छोड़ कर परमात्मा में विलीन हो हो गया- ज़िंदगी कैसी है पहेली...। 
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२४-१०-२०१५

Saturday, 17 October 2015

Simi Garewal (born 17 October 1947) --- Sanjog Waltar/ डा एस के सिंह



 · October 17, 2014 


Simi Garewal (born 17 October 1947) is an actress. She is known for her work in the films Do Badan, Saathi, Mera Naam Joker, Siddhartha and Karz.
Simi Garewal was born in Delhi. Her father, J S Garewal served in the army rising to the rank of brigadier. Simi grew up in England and studied at Newland House School with her sister Amrita.
After spending much of her childhood in England, Garewal returned to India while a teenager. Her felicity with the English language induced the makers of the English-language film Tarzan Goes to India to offer her a role. A gangly 15-year-old, Garewal made her debut alongside Feroz Khan in this film in 1962. Her performance was good enough for her to fetch many more film offers. During the 1960s and '70s, she was in several notable Indian films, working with leading directors such as Mehboob Khan's Son of India, Raj Kapoor in Mera Naam Joker (1970), Satyajit Ray in Aranyer Din Ratri (Days and Nights in the Forest), Mrinal Sen in Padatik (The Guerilla Fighter) and Raj Khosla in Do Badan. She starred opposite Shashi Kapoor in Columbia Pictures' Siddhartha, an English-language movie based on the novel by Hermann Hesse. Garewal did a semi-nude scene in this film which caused some controversy in India.[3] Later, in the mid-1970s, she made an appearance in the popular film Kabhi Kabhie (1976), made by her brother-in-law Yash Chopra, and had a starring role in Chalte Chalte (1976).[4] Another notable role she played was as a vamp in Karz (1980). She starred in the BBC docu-drama Maharajas (1987), based on the book by Charles Allen.
In the early 1980s, her attention turned to writing and direction. She formed her own production company, Siga Arts International. She hosted, produced and directed a TV series for Doordarshan called It's a Woman's World (1983). She also made a documentary for Channel 4 in the UK called Living Legend Raj Kapoor (1984). This was followed by a three-part documentary on Rajiv Gandhi titled India's Rajiv. She wrote and directed a Hindi feature film Rukhsat and produced television commercials, for which she won the first prize from the 1988 Paters Award in Australia.
Garewal anchored the talk show Rendezvous with Simi Garewal.
She usually wears her signature white clothes on TV shows and at award ceremonies, and is popularly known as "The Lady in White". Garewal recently appeared on Say Shava Shava 2008 as a host and judge. After the Mumbai terrorist attacks of November 2008, Simi Garewal caused a storm of criticism in India and abroad by publicly calling for the Indian government to "carpet-bomb" the terrorist camps of its neighbour, Pakistan.
She returned to television with her new talk show India's Most Desirable on Star Plus which would interview Bollywood actors, business and media icons, and Indian cricketers about their "ideal and desirable beaus".
Simi Garewal has her own website which she uses to interact with her fans: www.simigarewal.com. The site has her voice reading the text.
In the early 1980s, Simi Garewal had a year long affair with Salman Taseer a renowned Pakistani businessman and later Governor of Punjab, Pakistan. Simi Garewal was married to Ravi Mohan of Khatri Chunnamal family from Old Delhi but her marriage was short and she is now divorced.
Simi Garewal is a popular TV host and has acted in few Bollywood movies. In 1972, for her nude scene in Siddhartha with actor Shashi Kapoor, the movie couldn't be released in India due to censorship and created controversy.



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एक लड़की जिसके खून में है क्रांति ..............
जन्मदिन / सिमी ग्रेवाल (17 अक्तूबर)
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दो बदन , मेरा नाम जोकर , सिद्धार्थ और कर्ज़ जैसी हिट फिल्मों की नायिका सिमी का जन्म 1947 में लुधियाना के एक जाट सिख परिवार में हुआ था । पिता फौज में ऊंचे पद पर थे सो उन्होने सिमी को पढ़ने के लिए लंदन भेज दिया । सिमी ने खुद स्वीकार किया है कि लंदन में उनके पड़ोसी जामनगर के महाराजा हिज़ हाइनेस दिग्विजय सिंह से उन्हें प्यार हो गया ,यह प्यार 3 साल चला ,दोनों ने खूब इस प्यार को जिया । 17 साल की उम्र में भारत लौटी और अँग्रेजी फिल्म Tarzan Goes to India में काम किया लेकिन राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ से उनको प्रसिद्धि मिली । कोलम्बिया पिक्चर्स की अँग्रेजी फिल्म Siddhartha में नग्न दृश्य देकर इतनी विवादित हुईं कि भारतीय सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को भारत में प्रदर्शित नहीं होने दिया । चाचा यश चोपड़ा की फिल्म ‘कभी-कभी’ में भी काम किया । फिर अपनी प्रॉडक्शन कंपनी Siga Arts International के बैनर तले दूरदर्शन का धारावाहिक It's a Woman's World का निर्माण किया । बीबीसी के लिए भी राज कपूर और राजीव गांधी पर धारावाहिकों का निर्माण किया । वे सबसे ज्यादा चर्चित अपने टॉक शो Rendezvous with Simi Garewal से हुईं जिसमें बड़ी-बड़ी हस्तियों के इंटरव्यू दिखाए जाते थे । स्टार प्लस पर उनका India's Most Desirable सीरियल भी इसी तरह का था । सत्यजीत रे की फिल्म ‘अरण्येर दिनरात्रि’ में उन्होने एक संथाली लड़की जैसी लुक देने के लिए पूरे शरीर पर कालिख पोत ली थी । पाकिस्तानी उद्योगपति सलमान तासीर से प्यार हुआ लेकिन दिल्ली के सेठ रवि मोहन से उन्होने शादी की , यह शादी भी विफल रही ,तलाक हुआ और सिमी आजकल सिंगल जीवन जी रही हैं ।
आज सिमी 68वें साल में कदम रखने जा रहीं हैं, लेकिन उन्हें देखकर कोई कह नहीं सकता है कि वे इतनी उम्रदराज हैं। वे कहती हैं : "मैंने अपनी जिंदगी में अपने निजी जीवन को निजी ही बनाकर रखा। ऎसा करने से मुझे लगा कि मैं एक अदृश्य दुनिया में जीवन यापन कर कर रही हूं।“ उन्होने अपनी वेबसाइट www.simigarewal.com 2008 में लॉन्च की है जिसपर वो आज भी सक्रिय रहती हैं और अपने चाहने वालों के प्रश्नों का जवाब देती हैं ।
जन्मदिन पर सिमी को दीर्घ सक्रिय जीवन के लिए अशेष शुभकामनायेँ !

( सिमी गरेवाल जी का जन्मदिन मुबारक हो। हम उनके सुंदर,स्वस्थ,सुखद,समृद्ध उज्ज्वल भविष्य एवं दीर्घायुष्य की मंगल कामना करते हैं।)

स्मिता पाटिल : संवेदनशील और भावप्रवण अदाकारा --- ध्रुव गुप्त



Dhruv Gupt

सुनाई देती है जिसकी धड़कन, तुम्हारा दिल या हमारा दिल है !
आधुनिक भारतीय सिनेमा की महानतम अभिनेत्रियों में एक स्व. स्मिता पाटिल ने हिंदी और मराठी सिनेमा में संवेदनशील और यथार्थवादी अभिनय के जो आयाम जोड़े, उसकी मिसाल विश्व सिनेमा में भी कम ही मिलती है। वह उन अभिनेत्रियों में थीं जिन्हें देह-संचालन से नहीं, अपने चेहरे की भंगिमाओं और आंखों से अभिनय की कला आती थी। रंगमंच से सिनेमा में आई स्मिता ने 1975 में श्याम बेनेगल की फिल्मों - 'चरणदास चोर' और 'निशान्त' से अपनी अभिनय-यात्रा आरम्भ की थी ! उनके संवेदनशील और भावप्रवण अदायगी ने उन्हें उस दौर की दूसरी महान अभिनेत्री शबाना आज़मी के साथ तत्कालीन समांतर और कला सिनेमा का अनिवार्य हिस्सा बना दिया। यथार्थवादी सिनेमा के बाद व्यावसायिक फिल्मों में भी दर्शकों ने उन्हें हाथोहाथ लिया ! अपने मात्र एक दशक लंबे फिल्म कैरियर में स्मिता ने अस्सी से ज्यादा हिंदी और मराठी फिल्मों में अपने अभिनय के झंडे गाड़े, जिनमें कुछ चर्चित हिंदी फ़िल्में थीं - निशान्त, मंथन, भूमिका, गमन, आक्रोश, अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है, चक्र, सदगति, बाज़ार, अर्थ, मंडी, मिर्च मसाला, अर्धसत्य, भवनी भवाई, शक्ति, नमक हलाल, गुलामी, भींगी पलकें, सितम, दर्द का रिश्ता, चटपटी, आज की आवाज़, अनोखा रिश्ता और ठिकाना। फिल्म 'भूमिका' और 'चक्र' में श्रेष्ठ अभिनय के लिए दो राष्ट्रीय पुरस्कारों के अलावा उन्हें दूसरी फिल्मों के लिए चार फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले थे। अभिनेता राज बब्बर से प्रेम और शादी उनके जीवन की त्रासदी साबित हुई ! शादी के कुछ ही वर्षों बाद 1986 में उनकी मृत्यु हो गई।
स्मिता पाटिल के जन्मदिन (17 अक्टूबर) पर भावभीनी श्रधांजलि !

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Smita Patil (17 October 1955 -- 13 December 1986) was an Indian actress of film, television and theatre.
was an Indian actress of film, television and theatre. Regarded among the finest stage and film actresses of her times, Patil appeared in over 80 Hindi and Marathi films in a career that spanned just over a decade. During her career, she received two National Film Awards and a Filmfare Award. She was the recipient of the Padma Shri, India's fourth-highest civilian honour in 1985. Patil graduated from the Film and Television Institute of India in Pune and made her film debut with Shyam Benegal's Charandas Chor (1975). She became one of the leading actresses of parallel cinema, a New Wave movement in India cinema, though she also appeared in several mainstream movies throughout her career. Her performances were often acclaimed, and her most notable roles include Manthan (1977), Bhumika (1977), Aakrosh (1980), Chakra (1981), Chidambaram (1985) and Mirch Masala (1985). Patil was married to actor Raj Babbar. She died on 13 December 1986 at the age of 31 due to childbirth complications. Over ten of her films were released after her death. Her son Prateik Babbar is a film actor who made his debut in 2008.

Saturday, 10 October 2015

किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं 'रेखा' : जन्मदिवस (10 अक्तूबर ) पर विशेष --- विजय राजबली माथुर

जन्मदिवस (10 अक्तूबर ) पर विशेष  :
सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री 'रेखा'
हिंदुस्तान,आगरा,03 जून 2007 मे प्रकाशित 'रेखा'की जन्म कुंडली 

सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री 'रेखा' किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। उनके पिता सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता 'जेमिनी' गनेशन ने उनकी माता सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री पुष्पावल्ली से विधिवत विवाह नहीं किया था। उन्हें पिता का सुख प्राप्त नहीं हुआ और न ही पिता का धन ही प्राप्त हुआ। कुल-खानदान से भी लाभ नहीं मिला और समाज से भी आलोचनाओ का सामना करना पड़ा। इतनी जानकारी पत्र-पत्रिकाओं मे छ्पी है। किन्तु ऐसा क्यों हुआ हम ज्योतिष के आधार पर देखेंगे।

धनु लग्न और कुम्भ राशि मे जन्मी रेखा घोर 'मंगली'हैं और उनके द्वादश भाव मे 'शुक्र'ग्रह स्थित है जिसने उन्हे परिवार व समाज से लाभ नहीं प्राप्त होने दिया है। उनके दशम भाव मे जो पिता,कर्म व राज्य का हेतु होता है -कन्या राशि का सूर्य है। इस भाव मे सूर्य की स्थिति उनकी माता और पिता के विचारों मे असमानता का द्योतक है। इसी सूर्य ने उनकी माता को उनके पिता से अलग रखा और इसी सूर्य ने उन्हें खुद को पिता,परिवार व कुल से लाभ नहीं मिलने दिया। तृतीय भाव मे चंद्र ने बैठ कर कुटुंब सुख को और कम किया तथा पति भाव-सप्तम मे बैठ कर 'केतू' ने पति-सुख से वंचित रखा। द्वादश भाव मे 'शुक्र' मंगल की वृश्चिक राशि मे स्थित है जो जीवन भर 'उपद्रव'कराने वाला है और इसी ने उन्हें व्यसनी भी बनाया।


लग्न मे बैठे 'मंगल' की दृष्टि ने वैवाहिक सुख तो नहीं मिलने दिया किन्तु कला-ज्ञान और धन की प्रचुरता उसी ने उपलब्ध करवाई। लग्न मे ही बैठे 'राहू' ने उन्हें शारीरिक 'स्थूलता' प्रदान की थी जिसे उन्होने अपने प्रयासों से नियंत्रित कर लिया है। यही 'राहू'  उन्हें छोटी परंतु पैनी आँखें ,संकरा तथा अंदर खिचा हुआ सीना,चालाकी तथा ऐय्याशी भी प्रदान कर रहा है।

तृतीय भाव मे बैठा चंद्र 'रेखा' को अल्पभाषी,व मृदुल  व्यवहार वाला भी बना रहा है जिसके प्रभाव से वह कम से कम बोल कर अधिक से अधिक कार्य करके दिखा सकी हैं। अष्टम भाव मे उच्च का बृहस्पति  उन्हें दीर्घायु भी प्रदान कर रहा है तथा धनवान व स्वस्थ भी रख रहा है।

राज योग 

दशम भाव मे कन्या राशि का सूर्य 'रेखा' को 'राज्य-भंग ' योग भी प्रदान कर रहा है। इसका अर्थ हुआ कि पहले उन्हें 'राज्य-सुख 'और 'राज्य से धन'प्राप्ति होगी फिर उसके बाद ही वह भंग हो सकता है। लग्न मे बैठा 'राहू' भी उन्हें राजनीति-निपुण बना रहा है। एकादश भाव मे बैठा उच्च का 'शनि' उन्हें 'कुशल प्रशासक' बनने की क्षमता प्रदान कर रहा है। नवम  भाव मे 'सिंह' राशि का होना जीवन के उत्तरार्द्ध मे सफलता का द्योतक है। अभी वह कुंडली के दशम भाव मे 58(मूल लेख 2012 का है ) वे वर्ष मे चल रही हैं और आगामी जन्मदिन के बाद एकादश भाव मे 59 वे वर्ष मे प्रवेश करेंगी। समय उनके लिए अनुकूल चल रहा है।

राज्येश'बुध' की महादशा मे 12 अगस्त 2010 से 23 फरवरी 2017 तक की अंतर्दशाये भाग्योदय कारक,अनुकूल सुखदायक और उन्नति प्रदान करने वाली हैं। 24 फरवरी 2017 से 29 जून 2017 तक बुध मे 'सूर्य' की अंतर्दशा रहेगी जो लाभदायक राज्योन्नति प्रदान करने वाली होगी।

अभी तक रेखा के किसी भी राजनीतिक रुझान की कोई जानकारी किसी भी माध्यम से प्रकाश मे नहीं आई है ,किन्तु उनकी कुंडली मे प्रबल राज्य-योग हैं। जब ग्रहों के दूसरे परिणाम चरितार्थ हुये हैं तो निश्चित रूप से इस राज्य-योग का भी लाभ मिलना ही चाहिए। हम 'रेखा' के राजनीतिक रूप से भी सफल होने की मंगलकामना करते हैं। 
(Thursday, April 19, 2012

रेखा -राजनीति मे आने की सम्भावना---विजय राजबली माथुर

http://krantiswar.blogspot.in/2012/04/blog-post_19.html 

26 अप्रैल 2012 को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी द्वारा 'रेखा जी' को राज्यसभा सदस्य मनोनीत किया गया है जिससे एक सप्ताह पूर्व दिये विश्लेषण की परिपुष्टि हो जाती है )

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Wednesday, 7 October 2015

यादकरें :- उषा खन्ना;- (7 October 1941)






#आओयादकरें :-
उषा खन्ना;- (7 October 1941-present ):

"जिंदगी प्यार का गीत है, इसे हर दिल को गाना पड़ेगा " गीत को अपने संगीत से सजाने से बहुत पहले ही उन्होंने गीतों के इर्द-गिर्द अपनी एक दुनिया बनाने का सपना बुन लिया था़ और इस सपने को लेकर वे बड़ी हुईं। आयीं तो गायिका बनने थीं, लेकिन उनमें एक बेहतरीन संगीतकार का हुनर था। अपने संगीत से उन्होंने तीन दशक तक लगभग ढाई सौ फिल्मों के गीतों को अपनी धुनों से सजाया़ आज उनके नाम का जिक्र भले कभी-कभार होता हो, लेकिन हिंदी सिनेमा के संगीतकारों की बात उनके नाम के बिना पूरी नहीं हो सकती़। संगीतकारों की दुनियां में जहाँ हमेशा से ही पुरुषो का दबदबा रहा है,अपनी संगीत से लोगों को दीवाना बनाने वाली इस बेमिसाल महिला संगीतकार का का नाम है "उषा खन्ना " । सिने संगीत में उषा खन्ना एकमात्र ऐसी महिला रही हैं जिनका पर्दापण किसी धूमकेतु की भांति हुआ था और वे इसी रूपक की भांति खो गईं. उषा खन्ना की पहचान भारतीय सिने इतिहास की पहली स्थापित महिला संगीतकार के तौर पर बनी थी. अफसोस, यह कायम ना रह सकी।
संगीत इन्हे विरासत में मिली थी। पिता मनोहर खन्ना शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता थे और गीत लिखा करते थे़। पिता के संगीत प्रेम ने उषा को भी संगीत की ओर मोड़ा़ वे पिता के लिखे गानों की धुन बनातीं, फिर उन्हें खुद गाती भी थीं। अरबी संगीत ने भी उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया़। अपनी पहली धुन महज सोलह साल की उम्र में बनाने वाली उषा जब गायिका के तौर पर मौका पाने के लिए शशिधर मुखर्जी से मिलीं, तो उन्होंने अपनी ही धुनों से सजाये कुछ गीत उन्हें सुनाये़। उनके गीत सुन कर शशिधर मुखर्जी ने कहा ‘क्या तुम्हें लगता है कि तुम लता और आशा जैसी गायिकाओं से अच्छा गाती हो? ये गीत अगर तुमने बनाये हैं, तो तुम संगीतकार क्यों नहीं बन जातीं? अगले कुछ महीनों तक वे उषा से हर रोज दो गानों की धुन बनवाते़। अच्छी तरह परखने और उनकी बनायी कई धुनों को सुनने के बाद 1959 उन्होंने ‘दिल दे के देखो’ में उषा को बतौर संगीतकार मौका दिया़। इस पहली ही फिल्म के गीतों की सफलता ने उनके लिए संगीत की दुनिया का रास्ता तैयार कर दिया़।
असल में, उषा खन्ना पूर्णिमा—अमावस की तरह रहीं. ना पूरी तरह जाहिर ना पूरी तरह नजरबंद. उनका होना, उनके होते हुए भी नहीं होने के बराबर रहा. यह ऐसा ही रहा जैसे वे मौजूद रहीं लेकिन पूरी तरह से कभी सामने नहीं आईं. बीच—बीच में आकर आभास कराती रहीं मौजूदगी का, जब उनकी मौजदूगी प्रखर होने लगतीं वे फिर लंबे समय के लिए खो जातीं। आज वे 74 साल की हैं और किसी प्रकार की सुखिर्यों का हिस्सा नहीं बनतीं ,किसी पार्टी में नहीं जाती हैं .संगीत आधारित किसी कार्यक्रम में भी शिरकत नहीं करतीं. सफलता के चरम पर भी वे मुख्यधारा में नहीं रहीं तो अब कैसे रह सकती हैं।
उन्होंने जिन फिल्मों में संगीत दिया ,उनमे से प्रमुख हैं :- दिल देके देखो (1959 ),शबनम (1964) , निशान (1965), आग (1967 ),,मुनीमजी (1972 ),अपराधी (1974 ), सौतन (1983 ),दिल परदेशी हो गया (2003) आदि। बात अगर गीत की करें तो इनके द्वारा संगीतबद्ध किये इतने प्यारे तथा मीठे गीत हैं ,अगर जिक्र करना शुरू करूँ तो वक़्त की कमी ही जाएगी।
उन्होंने आज गायिकी में स्थापित कई बड़े नाम मसलन, पंकज उदास, रूप कुमार राठौर और सोनू निगम को पहला मौका दिया था़ लेकिन उगते सूरज को सलाम करने के आज के समय में लाखों श्रोताओं के दिलों में सुकून का दीया जलानेवाली उषा खन्ना का जिक्र कहीं नहीं दिखता।
'धन्यवाद "
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