Thursday, 8 September 2016
Friday, 2 September 2016
साधना : जन्मदिन (2 सितंबर): --- ध्रुव गुप्त /संजोग वाल्टर
अभी ना जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं !
हिंदी सिनेमा के छठे दशक की बेहद खूबसूरत और संवेदनशील अभिनेत्री साधना ने अपने संक्षिप्त फिल्म कैरियर में सौंदर्य और फैशन के कई नए प्रतिमान गढ़े थे। लड़कियों के बीच चूड़ीदार सलवार और साधना कट बाल को प्रचलन में लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है।1955 में राज कपूर की फिल्म 'श्री 420' के एक गीत 'मुड़ मुड़ के ना देख' में एक्स्ट्रा की भूमिका से अपनी फिल्मी पारी की शुरूआत करने वाली साधना छठे दशक की फिल्म 'दुल्हा दुल्हन' में राज कपूर की नायिका बनी। वैसे नायिका के रूप में उनकी पहली फिल्म थी 1960 की 'लव इन शिमला'। इस फिल्म की सफलता ने उनके लिए फिल्मों के दरवाजे खोल दिए थे। अगले दस वर्षों में साधना की प्रमुख फ़िल्में थीं - परख, हम दोनों, प्रेम पत्र, मनमौजी, एक मुसाफिर एक हसीना, असली नकली, मेरे महबूब, वो कौन थी, राजकुमार, दुल्हा दुल्हन, वक़्त, आरज़ू, मेरा साया, गबन, बदतमीज, अनीता, इंतकाम, एक फूल दो माली, अमानत और आप आए बहार आई। फिल्म निर्देशक आर.के. नैय्यर से शादी और एक दुर्घटना में अपनी आंखों की सुंदरता खो देने के बाद साधना ने सातवे दशक के आरंभ में फिल्मों को अलविदा कह दिया। आर.के. नैय्यर की मृत्यु के बाद वर्षों से एकांत और अलग-थलग जीवन जी रही साधना को जन्मदिन (2 सितंबर) की ढेर सारी शुभकामनाएं, उनकी फिल्म 'वो कौन थी' के एक अमर गीत के साथ !
हिंदी सिनेमा के छठे दशक की बेहद खूबसूरत और संवेदनशील अभिनेत्री साधना ने अपने संक्षिप्त फिल्म कैरियर में सौंदर्य और फैशन के कई नए प्रतिमान गढ़े थे। लड़कियों के बीच चूड़ीदार सलवार और साधना कट बाल को प्रचलन में लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है।1955 में राज कपूर की फिल्म 'श्री 420' के एक गीत 'मुड़ मुड़ के ना देख' में एक्स्ट्रा की भूमिका से अपनी फिल्मी पारी की शुरूआत करने वाली साधना छठे दशक की फिल्म 'दुल्हा दुल्हन' में राज कपूर की नायिका बनी। वैसे नायिका के रूप में उनकी पहली फिल्म थी 1960 की 'लव इन शिमला'। इस फिल्म की सफलता ने उनके लिए फिल्मों के दरवाजे खोल दिए थे। अगले दस वर्षों में साधना की प्रमुख फ़िल्में थीं - परख, हम दोनों, प्रेम पत्र, मनमौजी, एक मुसाफिर एक हसीना, असली नकली, मेरे महबूब, वो कौन थी, राजकुमार, दुल्हा दुल्हन, वक़्त, आरज़ू, मेरा साया, गबन, बदतमीज, अनीता, इंतकाम, एक फूल दो माली, अमानत और आप आए बहार आई। फिल्म निर्देशक आर.के. नैय्यर से शादी और एक दुर्घटना में अपनी आंखों की सुंदरता खो देने के बाद साधना ने सातवे दशक के आरंभ में फिल्मों को अलविदा कह दिया। आर.के. नैय्यर की मृत्यु के बाद वर्षों से एकांत और अलग-थलग जीवन जी रही साधना को जन्मदिन (2 सितंबर) की ढेर सारी शुभकामनाएं, उनकी फिल्म 'वो कौन थी' के एक अमर गीत के साथ !
ये घडियां नसीब से
जी भर के देख लीजिए
हमको क़रीब से
फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो
लग जा गले कि फिर ये
हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में
मुलाक़ात हो न हो !
हमको मिली हैं आज
ये घडियां नसीब से
जी भर के देख लीजिए
हमको क़रीब से
फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो
लग जा गले कि फिर ये
हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में
मुलाक़ात हो न हो !
साभार :
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संजोग वॉल्टर
साधना अपने पिता की मदद करने के लिए वो फिल्मों में आई, क्यों की उनके परिवार का सब कुछ करांची में छुट गया था साधना एकलौती औलाद थी साधना यह नाम दिया था उनके पिता ने उस दौर में साधना बोस बतौर अभिनेत्री लोगों के दिलो दिमाग पर छाई थी,साल था 1955 “राज कपूर” की फिल्म श्री 420 के गीत ” ईचक दाना बीचक दाना” में एक कोरस लड़की की भूमिका मिली थी साधना को उस वक्त वो 15 साल की थी,दरअसल साधना को ADVT.कपनी ने मौक़ा दिया था.
2 सितम्बर, 1941, कराची,(अब पाकिस्तान ) में हुआ था साधना अपने माता पिता की एकमात्र संतान थीं और 1947 मे देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार कराची छोड़कर मुंबई आ गया। भारत की पहली सिंधी फिल्म अबना, (1958) में काम करने का मौक़ा मिला जिसमें उन्होंने अभिनेत्री शीला रमानी की छोटी बहन की भूमिका निभाई थी और इस फिल्म के लिए उन्हें 1 रुपए की टोकन राशि का भुगतान किया गया था. इस सिंधी ब्यूटी को सशधर मुखर्जी, ने देखा.जो उस वक्त बहुत बड़े फिल्मकार थे, सशधर मुखर्जी को अपने बेटे जॉय मुखर्जी, के लिए जो उनके साथ हेरोइन का किरदार करे एक नये चेहरे की तलाश थी साल था 1960 ” लव इन शिमला” रिलीज़ हुई, इस फिल्म के डाइरेक्टर थे आर.के. नैयर, और उन्होंने ही साधना को नया लुक दिया “साधना कट” दरअसल साधना का माथा बहुत चौड़ा था उसे कवर किया गया बालों से उस स्टाईल का नाम ही पड़ गया “साधना कट” And from this movie onwrds Sadhna has become most stylish with the special hair cut called “साधना कट” फिल्मालय से उनका तीन साल का अनुबंध था,इसी कड़ी में थी एक मुसाफिर एक हसीना एक और मुज़िकल हिट.जिसके डाइरेक्टर थे राज खोसला. बिमल रॉय ने उन्हें परख में मौक़ा दिया परख को कई अवार्ड भी मिले थे फिल्म में साधना ने साधारण गांव लड़की का किरदार निभाया था.. 1961 में एक और “हिट” फिल्म हम दोनों में देव आनंद के साथ थी इस B/W फिल्म को colourized किया गया था और 2011 में फिर से रिलीज़ किया गया था 1962 में वह फिर से निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा असली – नकली में देव आनंद के साथ थी. 1963 में, टेक्नीकलर फिल्म मेरे मेहबूब एच एस रवैल द्वारा निर्देशित उनके फ़िल्मी कैरियर ब्लॉकबस्टर फिल्म थी यह फिल्म 1963 की भी ब्लॉकबस्टर फिल्म थी और 1960 के दशक के शीर्ष 5 फिल्मों में स्थान पर रहीं.मेरे मेहबूब में निम्मी पहले साधना वाला रोल करने जा रही थी न जाने क्या सोच कर निम्मी ने साधना वाला रोल ठुकरा निम्मी ने राजेंद्र कुमार की बहन का रोल किया.साधना के बुर्के वाला सीन इंडियन क्लासिक में दर्ज है. साल 1964 में उनके डबल रोल की फिल्म रिलीज़ हुई मनोज कुमार हीरो थे “वो कौन थी” सफेद साड़ी पहने महिला भूतनी का यह किरदार हिन्दुस्तानी सिनेमा में अमर हो गया इस फिल्म से हिन्दुस्तानी सिनेमा को नया विलेन भी मिला जिसका नाम था प्रेम चोपड़ा साधना को लाज़वाब एक्टिंग के लिए प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में पहला फिल्मफेयर नामांकन भी मिला था, क्लासिक्स फिल्म वो कौन थी , मदन मोहन के लाज़वाब संगीत और लता मंगेशकर की लाज़वाब गायकी के लिए भी याद की जाती है “नैना बरसे रिमझिम ” का आज भी कोई जवाब नहीं है इस फिल्म के लिए साधना को मोना लिसा की तरह मुस्कान के साथ” शो डाट कहा गया था यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर “हिट” थी.साल 1964 में साधना का नाम एक हिट से जुड़ा यह फिल्म थी राजकुमार,हीरो थे शम्मी कपूर राज कुमार भी साल 1964 की ,ब्लॉकबस्टर फिल्म थी. साल 1965 की मल्टी स्टार कास्ट की फिल्म वक्त रिलीज़ हुई ब्लॉकबस्टर थी इस साल की राज कुमार सुनीलदत्त, शशीकपूर, बलराज साहनी,अचला सचदेव और शर्मिला टैगोर वक्त में थे,वक्त में साधना ने तंग चूड़ीदार- कुर्ता पहना जो इस पहले किसी भी हेरोइन ने नहीं पहना था. साल 1965 साधना के लिए एक और कामयाबी लाया था इसी साल रिलीज़ हुई रामनन्द सागर की “आरजू”शंकर जयकिशन का लाजवाब संगीत हसरत जयपुरी का लिखा यह गीत जो गाया था लता जी ने “अजी रूठ कर अब कहाँ जायेगा” “आरजू के खाते में कई अवार्ड आये,1965 की एक और ब्लॉकबस्टर फिल्म जिसने कई और रिकार्ड भी कायम किये थे. फिल्म “आरजू” में भी साधना ने अपनी स्टाईल को बरकरार रखा. साधना ने रहस्यमयी फ़िल्में मेरा साया (1966)सुनील दत्त और अनीता मनोज कुमार (1967) दोनों की फिल्मों की हेरोइन साधना डबल रोल में थी, संगीतकार एक बार मदन मोहन ही थे,फिल्म मेरा साया का थीम सोंग ” तू जहा जहा चलेगा, मेरा साया साथ होगा” “नैनो में बदरा छाए” जैसे गीत आज भी दिल को छुते है.अनीता (1967) से सरोज खान को मौक़ा मिला था,सरोज खान उन दिनों के मशहूर डांस मास्टर सोहन लाल की सहायक थी गाना था झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में इस गाने को आवाज़ दी दी थी आशा भोसले ने उस दौर में जब यह यह गाना स्क्रीन पर आता था तो दर्शक दीवाने हो जाते थे,और परदे पर सिक्कों की बौछार शुरू हो जाती थी जिन्हें लुटने के लिए लोग आपस में लड़ जाते थे. इस फिल्म के गीत भी राजा मेंहदी अली खान ने लिखे थे.कहते हैं की साधना को नजर लग गयी थी उन्हें थायरॉयड हो गया था अपने ऊँचे फ़िल्मी कैरियर के बीच वो इलाज़ के लिए अमेरिका के बोस्टन चली गयी अमेरिका से लौटने के बाद, वो फिर फ़िल्मी दुनिया में लौटी और कई कामयाब फ़िल्में उन्होंने की इंतकाम (1969) में अभिनय किया, एक फूल माली इन दोनों फिल्मों के हीरो थे संजय (1969), बीमारी ने साधना का साथ नहीं छोड़ा अपनी बीमारी को छिपाने के लिए उन्होंने अपने गले में पट्टी बंधी अक्सर गले में दुपट्टा बांध लेती थी,यही साधना आइकन बन गया था और उस दौर की लड़कियों ने इसे भी फैशन के रूप में लिया था,साल 1974 गीता मेरा नाम रिलीज़ हुई जो उनकी आखिरी कमर्शियल हिट थी,इस फिल्म की डाइरेक्टर वो थी इस फिल्म में भी उनका डबल रोल था सुनील दत्त और फ़िरोज़ खान हीरो थे. साधना की कई फ़िल्में बहुत देर से रिलीज़ हुई 1970 के आस पास अमानत को रिलीज़ होना था वो 1975 में रिलीज़ हुई तब बहुत कुछ बदल चुका था 1978 में महफ़िल और 1994 में उल्फत की नयी मंजिलें.
साधना ने 6 मार्च 1966 को निर्देशक आर.के. नैयर, के साथ शादी कर ली जो 1995 में हमेशा के उनका साथ छोड़ गये इस शादी से साधना के पिता खुश नहीं थे,क्यों आर.के. नैयर दमे के मरीज़ थे,दमा दम के साथ जता है और आर.के. नैयर के साथ भी यही हुआ साधना के कोई आस औलाद नहीं हुई.कहा जाता है की राज खोसला और आर.के. नैयर साधना की ज़िन्दगी यही दो नाम थे दोनों ही साधना के दीवाने थे राज खोसला और आर.के. नैयर ने साधना के साथ जितनी भी फ़िल्में की उस में पूरी जान इन दोनों ने लगा दी थी,राज खोसला और आर.के. नैयर ने अलग अलग वक्त में साधना के फ़िल्मी सफर को नये मुकाम तक पहुंचाया था.
कई हिंदी फिल्मों में उनके पिता का रोल उनके सगे चाचा हरी शिवदासानी ने किया था जो अभिनेत्री बबिता के पिता है(नयी उम्र की नयी फसल के लिए,करिश्मा और करीना के नाना) साधना की चचेरी बहन बबिता ने फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा यह बात और है बबिता अपनी बहन से बहुत ज्यादा प्रभावित थी लिहाजा उन्होंने ने भी साधना स्टाईल को अपनाया बबिता ने फिल्म अभिनेता रंधीर कपूर से शादी कर फिल्मों को अलविदा कह दिया.अपने फ़िल्मी करियर को लेकर साधना बहुत संजीदा थी.She suffered from a disorder of her eyes due to hyperthyroidism .
कई साल वो तनहा रही उनकी तन्हाई को कम करने के लिए उनकी दोस्त नंदा हेलन वहीदा रहमान उनसे मिलने जाती थी ,साल 2010 में साधना एक बार फिर ख़बरों में आई बिल्डर यूसुफ लकड़ावाला ने उनसे उस फ्लैट को खाली करने को कहा था जिसमें वो रह रही थी यह अपार्टमेन्ट आशा भोसलें का है जहा बरसों से वो किराये पर रह रही थी फ़िलहाल यह मामला अब कोर्ट में हैं. 2014 में वो रणबीर कपूर के साथ रैंप पर भी दिखी थीं.
2014 में मुँह के कैंसर की वजह से साधना की सर्जरी हुई थी. इसी बीमारी के चलते 25 दिसंबर 2015 में उनका निधन हो गया।
हिंदी सिनेमा में योगदान के लिए, अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फिल्म अकादमी (आईफा) द्वारा 2002 में लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है. 1955 श्री 420, गीत “ईचक दाना बीचक दाना” में कोरस लड़की की भूमिका, 1958 अबना पहली सिंधी फिल्म,1960 लव इन शिमला,परख 1961 हम दोनों ,1962 एक मुसाफिर एक हसीना,प्रेम पत्र,मन मौजी,असली नकली,1963 मेरे मेहबूब ,1964 वो कौन थी,राजकुमार,पिकनिक,दूल्हा दुल्हन 1965 वक्त,आरजू 1966 मेरा साया 1967 अनीता 1968 स्त्री उड़िया 1969 सच्चाई, इंतकाम,एक दो फूल माली 1970 इश्क पर जोर नहीं 1971 आप आये बहार आयी 1972 दिल दौलत दुनिया 1973 हम सब चोर हैं 1974 गीता मेरा नाम, छोटे सरकार, वंदना 1975 अमानत 1978 महफिल 1987 नफरत 1988 आखिरी निश्चय 1994 उल्फत की नयी मंजिलें।
http://swapnilsansar.org/2016/09/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%87%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%B6-%E0%A4%86%E0%A4%87%E0%A4%95%E0%A5%89%E0%A4%A8-%E0%A4%A5%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%A8%E0%A4%BE/
Saturday, 27 August 2016
पुण्यतिथि/ महान पार्श्वगायक मुकेश ----- कुलदीप कुमार 'निष्पक्ष'
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कुलदीप कुमार 'निष्पक्ष'
फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है...!पुण्यतिथि/ महान पार्श्वगायक मुकेश
'छोड़ गए बालम, मुझे हाय अकेला छोड़ गए' और 'किसी की मुस्कुराहटों पर हो निसार' जैसे गीतों से श्वेत-श्याम पटल पर दर्द को रंग और संवेदना को सहारा देने वालें गायक मुकेश जी ने हर तरह के गीत गाएं हैं। लेकिन उन्हें उनके दर्द भरे गीतों के लिए विशेषरूप से याद किया जाता है। उनकी कशिश भरी आवाज़ और दर्द भरे अंदाज़ मन को एक अलग शांति देतें हैं। मुकेश जी का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता एक अभियंता थें। उनकी 10 संतान थीं और मुकेश उनकी छटवीं संतान। जब मुकेश जी छोटें थें तब उनकी बहन को संगीत की शिक्षा देने एक शिक्षक आतें थें। मुकेश जी उनको छिपकर सुनते थे। धीरे-धीरे वह संगीत की बारीकियों से परिचित हुयें और गायिकी की तरफ उनका रुझान होने लगा। हाईस्कूल पास करने के बाद वह पीडब्लूडी में काम करने लगे। उसी समय उनके दूर के रिश्तेदार मोतीलाल उनसे मिले और उनसे प्रभावित होकर उन्हें मुम्बई ले आए। यहीं से मुकेश जी के फ़िल्मी कैरियर की शुरुवात हुई। बतौर अभिनेता और गायक उनकी पहली फ़िल्म 1941 में आयी 'निर्दोष' थी। उनके कैरियर का पहला गीत था 'दिल ही बुझ गया होता' इसके अलावा बतौर अभिनेता उन्होंने 'माशुका, आह, अनुराग और दुल्हन' फ़िल्म में काम किया। यह सभी फिल्में असफल रही।
मुकेश जी के आदर्श गायक सहगल जी थें। जब मुकेश जी फिल्मी दुनिया में नहीं आए थे तब वह अपने दोस्तों को सहगल जी के गाये गाने उनकी आवाज़ में कॉपी करके सुनाते थे। इसका प्रभाव उनके गायिकी पर भी पड़ा। एक वह भी दौर आया जब लोग आपस में शर्त लगाने लगे कि 'यह गीत सहगल ने गाया है या मुकेश ने।' एक बार सहगल जी भी मुकेश जी को सुनकर अचंभे में पड़ गए थे। अपने 40 साल लम्बे फ़िल्मी कैरियर में मुकेश जी ने लगभग 200 फिल्मों के लिए गीत गाए। 40 के दशक के उन्होंने अधिकतर गीत दिलीप कुमार, 50 के दशक में वह राजकपूर और 60 के दशक में राजेन्द्र कुमार मनोज कुमार के लिए कई यादगार गीत गाए हैं। 50 का दशक उनके कैरियर और हिंदी सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण दशक है। इस दौरान वो राजकपूर जी की आवाज़ बने और बॉलीवुड की सबसे सफल तिकड़ी शैलेन्द्र-मुकेश-शंकर जयकिशन एक साथ काम करने शुरू किये। इस तिकड़ी ने आम भारतीय जनमानस में फ़िल्मी गीतों को काफी लोकप्रियता दिलाई। हसरत जयपुरी साहब के लिखे कई बेहतरीन गीतों को भी मुकेश जी ने आवाज़ दी। राजकपूर जी के साथ उन्होंने 'अंदाज़, आवारा, श्री 420, छलिया, अनाड़ी, संगम, जिस देश में गंगा बहती है, मेरा नाम जोकर, तीसरी कसम' जैसी म्यूजिकल हिट्स फिल्मों में काम किया। 1951 में आयी फ़िल्म 'मल्हार' और 1956 में आयी फ़िल्म 'अनुराग' के निर्माता मुकेश जी थे। यह दोनों फ़िल्में भी असफल रही थीं। मुकेश जी सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्म फेयर अवार्ड पाने वाले पहले गायक हैं। उन्होंने अपने कैरियर में 4 बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त किया। उनका अंतिम फ़िल्म फेयर उनकी मृत्यु के बाद मिला। उन्हें फ़िल्म फेयर पुरस्कार 'सब कुछ सीखा हमने (अनाड़ी 1959), सबसे बड़ा नादान वहीँ (पहचान 1970), जय बोलो बेईमान की (बेईमान 1972) और कभी कभी मेरे दिल में (कभी कभी 1976)' के लिए मिला। उन्हें साल 1974 में आयी फ़िल्म 'रजनीगंधा' के गीत 'कई बार यूँ ही देखा है' के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ। मुकेश जी 27 अगस्त 1976 को अमेरिका में एक कार्यक्रम में ' एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल' गीत गा रहे थे तभी उनको दिल का दौरा पड़ा और उनकी उसी समय मौत हो गयी। उनके मृत्यु का समाचार सुनकर राजकपूर ने कहा था 'आज मेरी आवाज़ और आत्मा दोनों चली गयी'
महान पार्श्वगायक को उनके एक गीत के साथ श्रद्धांजलि !
'दीवानों से ये मत पूछो, दीवानों पे क्या गुज़री है
हाँ उनके दिलों से ये पूछो, अरमानों पे क्या गुज़री है
औरों को पिलाते रहते हैं और खुद प्यासे रह जाते हैं
ये पीनेवाले क्या जाने, पैमानों पे क्या गुज़री है
मालिक ने बनाया इंसां को, इंसान मोहब्बत कर बैठा
वो उपर बैठा क्या जाने, इंसानों पे क्या गुज़री है'
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=598222747026339&set=a.102967489885203.3918.100005158561797&type=3
Sunday, 31 July 2016
मुमताज़ जिसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं है --- संजोग वाल्टर
जन्मदिवस 31 जुलाई के शुभ अवसर पर मुमताज़ जी को शुभकामनायें :
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मुमताज़ ( 31 जुलाई 1947) :
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मुमताज़ ( 31 जुलाई 1947) :
मुमताज़
हिंदी फ़िल्में का वो नाम है जिसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं है मामूली रोल
से शुरुआत और फिर अपनी मेंहनत और ईमानदारी की वजह से टाप पर पहुँचने की कोई
दूसरी मिसाल नहीं है,मुमताज़ ( 31 जुलाई 1947, बॉम्बे ) का नाम ज़ेहन
में आता है तो याद आती है वो फ़िल्में जिनमें उन्होंने extra का रोल किया
था मुझे जीने दो (1963 ) में उनके हिस्से में सम्वाद था माँ भैया आये
है,उनका गहरा दाग (1963 ) में राजेन्द्र
कुमार की बहन का रोल,मेरे सनम (1965) में वैम्प का किरदार "यह है
रेशमी जुल्फों का अँधेरा" यह गाना तो आज भी मशहूर है मुमताज़ ने जम कर
दोस्ती भी निभाई,फिरोज खान जब 1970 में अपराध से निर्माता बने तो मुमताज़
ने हीरो प्रधान फिल्म में काम किया और फ़िरोज़ खान के कहने पर बिकनी भी
पहनी,अपनी बेटी नताशा की शादी फिरोज खान के बेटे फरदीन खान से कर अपनी
दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल दिया,जीतेन्द्र की फिल्म हमजोली में एक आइटम
सिंह किया टिक टिक मेरा दिल बोले देव साहब के कहने पर फिल्म हरे रामा हरे
कृष्ण भी इस फिल्म में मुमताज़ सिर्फ नाम की हेरोइन थी,पूरी फिल्म जीनत
अमान के इर्द गिर्द थी,तेरे मेरे सपने (1971), खिलौना (1970) मुमताज़
की वो चुनिन्दा फ़िल्में जिनमें उन्होने जान डाल थी खिलौना के लिए
Filmfare Best Movie Award.के साथ Filmfare Best Actress Award,भी हासिल
किया था,मुमताज़ के वालिद-वालिदा का नाम था अब्दुल सलीम अस्करी- शादी
हबीब आगा.मुझे जीने दो (1963 ) में दिखी एक छोटे से किरदार,इस दौर में
उनकी जोड़ी बनी दारा सिंह के सात इस जोड़ी की 16 फ़िल्में आई थी बौक्सर,
सेमसन,टार्ज़न,किंग कोंग, फौलाद ,वीर भीमसेन , हर्क्यूलिस Tarzan Comes
to Delhi, Sikandar E Azam, Rustom-E-Hind, Raaka, Boxer, Daku Mangal
सिंह,तब दारा सिंह को मिलते ४.५ लाख रुय्पे एक फिल्म के मुमताज़ को २.५
लाख रूपये,मुमताज़ बी ग्रेड की फिल्मों में हेरोइन बन कर आ रही थी तो ऐ
ग्रेड की फिल्मों में छोटे छोटे रोल कर रही थी पत्थर के सनम इसकी मिसाल
है,राम और श्याम (1967). में उन्होंने दिलीप कुमार के साथ काम किया जो
1967 की टॉप हिट फिल्म थी शर्मीला टैगोर के साथ सावन की घटा (1966 ),
यह रात फिर न आएगी (1966) मेरे हमदम मेरे दोस्त (1968) .राजेश
खन्ना के साथ दो रास्ते (1969) और बंधन के बाद इस जोड़ी ने आठ फ़िल्में
की. सच्चा झूठा (1970 ) में शशी कपूर ने उनके साथ काम करने से मना कर दिया
था,(हीरो राजेश खन्ना) 1974 की सुपर हिट फिल्म "चोर मचाये सर शोर" शशी कपूर
की यह कम बैक फिल्म थी,मुमताज़ ने यह जानते हुए भी इस फिल्म के हीरो शशी
है काम करने से मना नहीं किया,मुमताज़ ने करीब 108 फिल्मों में काम किया
था,धर्मेन्द्र,संजीव कुमार,जेतेंद्र सुनील दत्त,फिरोज खान,बिस्वजीत,देव
आन्नद,अमिताभ बच्चन के साथ भी काम किया 1969-१९७५ के बीक उनकी और राजेश
खन्ना की जोड़ी ने कई हिट फ़िल्में दी.राजेश खन्ना के साथ उनकी कमाल की
जुगल बंदी थी.१९७४ में जब मुमताज़ अपने करियर की उंचाई पर थी तब
millionaire मयूर माधवानी से शादी का फैसला कर लिया तब बाकी था काम आप
की कसम ,रोटी और प्रेम कहानी का इन तीनों फिल्मों में उनके हीरो थे राजेश
खन्ना इसके अलावा उन्होंने लफंगे (रंधीर कपूर) और नागिन का काम पूरा करने
के बाद फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया और लन्दन जा बसी.1989 में वो
फिल्म आंधिया में आई य फिल्म भारत में फलाप रही पर पकिस्तान में इस फिल्म
ने सिल्वर जुबली की थी,In 1996 she received the Filmfare Lifetime
Achievement Award.In June 2008, she was honored for her "Achievement in
Indian Cinema" by the International Indian Film Academy (IIFA) in
Bangkok. Mumtaz has featured recently in UniGlobe Entertainment's cancer
docudrama 1 a Minute with a number of international stars.मुमताज़ की दो
बेटियां है,मुमताज़ का नाम राजेश खन्ना के साथ भी जुड़ा,पर उनके और शम्मी
कपूर के बीच रोमांस की खूब चर्चा है,बताया जाता है इस रिश्ते से "पापा
कपूर" नहीं खुश थे वो नहीं चाहते थे उनके खानदान में एक और बहु फ़िल्मी
दुनिया से हो (गीता बाली) शम्मी ने बाद में भाव नगर की नीला देवी से शादी
कर ली थी "फिल्म ब्रह्मचारी के दौरान मुमताज़ शम्मी का रोमांस जोरो पर था "
फिल्म ब्रह्मचारी का एक गाना इस रिश्त्ते पर मोहर भी लगाता है "आज कल तेर मेरे प्यार
के चर्चे हर जुबान पर.मुमताज़ स्टायलिश हेरोइन थी,उनकी मुमताज़ साड़ी बहुत
मशहूर उस ज़माने में खूब बिक्री होती थी "मुमताज़ साड़ी" की ( इस पर फिर
कभी) बेहतरीन अदाकारा के साथ वो लाज़वाब डांसर भी थी ।
Tuesday, 19 July 2016
वो न आएंगे पलट के उन्हें लाख हम बुलाएं ! ------ ध्रुव गुप्त
वो न आएंगे पलट के उन्हें लाख हम बुलाएं !
अपनी सुरीली, भावुक, उनींदी और रेशमी आवाज़ के लिए मशहूर गुज़रे ज़माने की विख्यात गायिका मुबारक़ बेगम का पिछली रात निधन एक स्तब्ध कर देने वाली ख़बर है। लगभग अस्सी साल की बेगम अपनी बीमारी और आर्थिक अभाव की वजह से पिछले कुछ सालों से अपने जीवन के सबसे बड़े संकट से गुज़र रही थीं। मुंबई के जोगेश्वरी इलाके में अपने एक पुराने फ्लैट के बेडरूम में अकेली रहने वाली बेगम अकेलेपन में ही चल बसी । पिछले दिनों उनके हालात पर मेरा पोस्ट पढ़ने के बाद कई मित्रों ने उनकी आर्थिक मदद भी की थी। हिंदी फिल्मों की संगीत राजनीति की वज़ह से बेगम को बहुत मौके नहीं मिले, लेकिन उनके गाए कुछ गीत हमारी संगीत धरोहर के अमूल्य हिस्से हैं। उनकी गहरी, कच्ची, भावुक आवाज़ हमारी पीढ़ी के लोगों के हिस्से के इश्क़ और अधूरेपन की कभी हमराह हुआ करती थी। उनके गाए कुछ प्रमुख गीत हैं - कभी तन्हाइयों में भी हमारी याद आएगी (हमारी याद आएगी), वो न आएंगे पलट के उन्हें लाख हम बुलाएं (देवदास), हम हाले दिल सुनायेंगे, सुनिए कि न सुनिए (मधुमती), बेमुरव्वत बेवफ़ा बेगानाए दिल आप हैं (सुशीला), नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वाले (जुआरी), निगाहों से दिल में चले आइएगा (हमीर हठ), कुछ अज़नबी से आप हैं कुछ अजनबी से हम (शगुन), मेरे आंसूओं पे न मुस्कुरा कई ख़्वाब थे जो मचल गए (मेरे मन मितवा), मुझको अपने गले लगा लो ऐ मेरे हमराही (हमराही), जब इश्क़ कहीं हो जाता है तब ऐसी हालत होती है (आरज़ू) और वादा हमसे किया दिल किसी को दिया (सरस्वतीचन्द्र)।
मरहूमा मुबारक़ बेग़म को खिराज़-ए-अक़ीदत !
Monday, 4 July 2016
हिन्दी सिनेमा की पहली ब्यूटी क्वीन नसीम बानू ------ संजोग वॉल्टर
भारतीय सिने जगत में अपनी दिलकश अदाओं से दर्शकों को दीवाना बनाने वाली अभिनेत्रियों की संख्या यू तो बेशुमार है लेकिन चालीस के दशक में एक अभिनेत्री ऐसी हुयी। जिसे ब्यूटी क्वीन कहा जाता था और आज के सिने प्रेमी शायद ही उसे जानते हों, वह अभिनेत्री थीं नसीम बानू 4 जुलाई 1916 को को जन्मी नसीम बानू की परवरिश शाही ढग़ से हुयी थी। वह स्कूल पढऩे के लिए पालकी से जाती थीं। नसीम बानू की सुंदरता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें किसी की नजर न लग जाए इसलिये उन्हें पर्दे में रखा जाता था। फिल्म जगत में नसीम बानू का प्रवेश संयोगवश हुआ। एक बार नसीम बानो अपनी स्कूल की छुटियों के दौरान अपनी मां के साथ फिल्म सिल्वर किंग की शूटिंग देखने गयीं। फिल्म की शूटिंग देखकर नसीम बानू मंत्रमुग्ध हो गयीं और उन्होंने निश्चय किया कि वह अभिनेत्री के रुप में अपना सिने करियर बनायेंगी। इधर स्टूडियों में नसीम बानू की सुंदरता को देख कई फिल्मकारों ने नसीम बानू के सामने फिल्म अभिनेत्री बनने का प्रस्ताव रखा लेकिन उनकी मां ने यह कहकर सभी प्रस्ताव ठुकरा दिये कि नसीम अभी बच्ची है। नसीम की मां उन्हें अभिनेत्री नहीं बल्कि डॉक्टर बनाना चाहती थीं। इसी दौरान फिल्म निर्माता सोहराब मोदी ने अपनी फिल्म ‘हेमलेट’ के लिये बतौर अभिनेत्री नसीम बानू को काम करने के लिए प्रस्ताव दिया और इस बार भी नसीम बानू की मां ने इंकार कर दिया लेकिन इस बार नसीम अपनी जिद पर अड़ गयी कि उन्हें अभिनेत्री बनना ही है। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी बात मनवाने के लिये भूख हडताल भी कर दी । 70 के दशक में उनकी पहचान सायरा बानू की माँ के रूप में बनी,गोपी के बाद वो दिलीप कुमार की सास के रूप में जानी गयी, कभी दिलीप कुमार के साथ फिल्मों में हेरोइन बन कर आने वाली नसीम बानू 1970 में दिलीप कुमार की सास बनी,नसीम बानू ने अभिनय के बाद 1960 में रिलीज़ सायरा बानू की पहली फिल्म जंगली से ड्रेस डिजायनिंग का काम किया सिर्फ अपनी बेटी की ही फिल्मों में 18 जून 2002 को मुबई में 83 साल की उम्र में स्वर्गवास हो गया था.नसीम बानू ने सोहराब मोदी की कई फिल्मों में काम किया था खून का खून 1935,तलाक 1938,पुकार 1939 उजाला 1942,चल चल रे नौज़वान 1944 ,बेगम 1945 ,दूर चलें 1946 ,जीवन आशा 1946 ,अनोखी अदा 1948 ,चांदनी रात 1949 , शीश महल 1950 ,शबिस्तान 1951 ,अजीब लड़की 1952 ,बागी 1953 , नौशेर्वाने आदिल 1957 काला बाज़ार 1960 ,हौली डे इन बॉम्बे 1963 नबाव सिराज़ुद्दौल्ला 1967 ,पाकीज़ा 1972 कभी कभी 1976
Sunday, 3 July 2016
खुद से भी ज़ुदा लगता था :राज कुमार ------ ध्रुव गुप्त
Dhruv Gupt
आप मुझे भूल गए क्या, जानी ?राज कुमार उर्फ़ कुलभूषण पंडित का मुंबई के माहिम थाने के थानेदार से फिल्मों में स्टारडम तक का सफ़र एक सपने जैसा रहा था। अपने व्यक्तिगत जीवन में बेहद आत्मकेंद्रित, अक्खड़ और रहस्यमय राज कुमार के अभिनय की एक अलग और विलक्षण शैली रही जो उनके किसी पूर्ववर्ती या समकालीन अभिनेता से मेल नहीं खाती थी। उनके अभिनय में विविधता चाहे न रही हो, लेकिन यह सच है कि अपनी ज्यादातर फिल्मों में उन्होंने जिस अक्खड़, बेफिक्र और दंभ की सीमाएं छूते आत्मविश्वासी व्यक्ति का चरित्र जिया है, उसे जीना सिर्फ उन्हीं के बूते की बात थी। उनका अपना एक अलग दर्शक वर्ग रहा है जिसे आज भी उनकी कमी खलती है। उनके बाद नाना पाटेकर ने उनकी अभिनय शैली को सफलतापूर्वक अपनाया। 1952 में ' रंगीली ' फिल्म से अपना कैरियर शुरू करने वाले राज कुमार ने पचास से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें कुछ प्रमुख फ़िल्में थीं - मदर इंडिया, दुल्हन, जेलर, दिल अपना और प्रीत पराई, पैगाम, अर्धांगिनी, उजाला, घराना, दिल एक मंदिर, गोदान, फूल बने अंगारे, दूज का चांद, प्यार का बंधन, ज़िन्दगी, वक़्त, पाकीजा, काजल, लाल पत्थर, ऊंचे लोग, हमराज़, नई रौशनी, मेरे हुज़ूर, नीलकमल, वासना, हीर रांझा, कुदरत, मर्यादा, सौदागर, हिंदुस्तान की कसम। अपने जीवन के आखिरी वर्षों में उन्हें कर्मयोगी, चंबल की कसम, तिरंगा, धर्मकांटा, जवाब जैसी कुछ फिल्मों में बेहद स्टीरियोटाइप भूमिकाएं निभाने को मिलीं। अपनी स्थापित छवि के विपरीत उनकी कुछ फिल्मों - मदर इंडिया, गोदान और दिल एक मंदिर ने यह साबित किया कि उनके अभिनय में विविधता की गुंजाईश है, लेकिन उनकी इस विविधता का इस्तेमाल बहुत कम हो सका ! इस विलक्षण अभिनेता की पुण्य तिथि (3 जुलाई) पर उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि, एक शेर के साथ !
वो आग था किसी बारिश का बुझा लगता था
अजीब शख्स था, खुद से भी ज़ुदा लगता था !
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