Monday, 9 January 2017

जयंती/ पार्श्वगायक महेंद्र कपूर ------ कुलदीप कुमार 'निष्पक्ष'



कुलदीप कुमार 'निष्पक्ष'
09-01-2017 
है रीत जहाँ की प्रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूँ...
जयंती/ पार्श्वगायक महेंद्र कपूर
देशभक्ति गीतों के लिए प्रसिद्ध महेंद्र कपूर जी का कैरियर नौशाद अली की फ़िल्म 'सोहनी महिवाल' से शुरू हुआ था। इसके बाद फ़िल्म नवरंग के गीत 'आधा है चंद्रमा रात आधी' से काफी लोकप्रियता प्राप्त हुई। जिस तरह राज कपूर के लिए मुकेश और शम्मी कपूर के लिए रफ़ी ने बहुत गीत गए ठीक उसी तरह महेंद्र जी ने मनोज कुमार के लिए बहुत से फिल्मों में गीत गए जिनमें उपकार, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान और क्रांति जैसी फ़िल्में शामिल है। इन्होंने निर्माता और निर्देशक बी•आर• चोपड़ा के फिल्मों के लिए भी बहुत गीत गए जिनमें धूल का फूल, गुमराह, वक़्त, हमराज़ और धुंध जैसी फ़िल्में शामिल हैं। कैरियर के शुरुवाती दौर से ही मोहम्मद रफ़ी साहब और महेंद्र कपूर जी के बीच काफी बढ़िया दोस्ती थीं। महेंद्र जी रफ़ी साहब को अपना गुरु भी मानते थे। और कैरियर के शुरुवाती गानों में उन्होंने रफ़ी साहब को कॉपी भी करने की कोशिस की जो उनके गीतों में साफ़ झलकता है। महेंद्र कपूर जी ने हिंदी के अलावा मराठी, पंजाबी और भोजपुरी आदि क्षेत्रीय भाषाओ में लगभग 25000 हज़ार गीतों को अपने स्वर से संवारा है। इन्होंने काफी भजन भी गाएं हैं। यह पहलें भारतीय गायक थे जिन्होंने कोई अंग्रेजी गीत रिकॉर्ड करवाया था।
महेंद्र कपूर जी को 1968 में उपकार फ़िल्म के गीत 'मेरे देश की धरती सोना उगले' के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, 1964 में गुमराह फ़िल्म के गीत 'चलों एक बार फिर से', 1968 में हमराज़ फ़िल्म के गीत 'नीले गगन के तले, और 1975 में आयी फ़िल्म रोटी कपड़ा और मकान के गीत 'और नहीं बस और नहीं' के लिए कुल मिलाकर तीन बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला है।
जयंती पर महेंद्र जी की गायी दो पंक्तियों के साथ श्रद्धांजलि..!
'फूलों की तरह दिल में बसाये हुये रखना 
यादों के चरागों को जलाये हुये रखना 
लंबा है सफ़र इस में कही रात तो होगी
ये साथ गुज़ारे हुये लमहात की दौलत 
जज़बात की दौलत ये ख़यालात की दौलत 
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी
बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी...'
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=668345813347365&set=a.102967489885203.3918.100005158561797&type=3


Sunday, 25 December 2016

फिल्म अभिनेत्रा साधना एक स्मरण ------ संजोग वाल्टर / ध्रुव गुप्त







मुंबई (25 दिसंबर):वयोवृद्ध फिल्म अभिनेत्रा साधना का निधन हो गया है। वे 74 साल की थीं। उन्होंने मुंबई में अंतिम सांसें लीं। साधना के निधन की खबर के पूरे बॉलीवुड में शोक की लहर दौड़ गई है। एक्टर्स ने उनकी मृत्यु पर गहरा दुख व्यक्कत किया है।


साधना का जन्म 2 सितम्बर, 1941 को कराची के सिन्ध में हुआ था। साधना अपने माता-पिता की एकमात्र संतान थीं और 1947 मे देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार कराची छोड़कर मुंबई आ गया था।
साधना का नाम उनके पिता मे अपनी पसंदीदा अभिनेत्री साधना बोस के नाम पर रखा था। उनकी मां ने उन्हें आठ वर्ष की उम्र तक घर पर ही पढा़या था। बता दें कि हरि शिवदासानी जो अभिनेत्री बबीता के पिता हैं, साधना के पिता के भाई हैं।
साधना ने 1981 में महफ़िल से बॉलीवुड में करियर की शुरूआत की और पहली बार 1974 में गीता मेरा नाम का निर्देशन भी किया। अपने दौर में साधना का हेयर स्टाइल भी खासा फेमस था।



http://hindi.news24online.com/veteran-actor-sadhana-passes-away-29/
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मशहूर अभिनेत्री साधना का मुंबई के हिंदुजा हॉस्पिटल में शुक्रवार को निधन हो गया. 74 साल की साधना कुछ दिनों से बीमार चल रही थीं.
उन्होंने 'आरज़ू', 'मेरे मेहबूब', 'लव इन शिमला', 'मेरा साया', 'वक़्त', 'आप आए बहार आई', 'वो कौन थी', 'राजकुमार', 'असली नकली', 'हम दोनों' जैसी कई मशहूर हिंदी फ़िल्मों में काम किया था.
साधना का पूरा नाम साधना शिवदासानी था. उनके नाम पर 'साधना कट' हेयरस्टाइल बेहद मशहूर हुआ था.
ट्विटर पर कई लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं.
 
 
पिछले साल साधना, अभिनेता रणबीर कपूर के साथ रैंप पर भी दिखी थीं
निर्माता-निर्देशक करण जौहर ने ट्वीट किया, "आरआईपी साधना आंटी...सौंदर्य, आत्मविश्वास और आकर्षण की आपकी विरासत अमर रहेगी."
पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट किया, "साधना पहली ऐसी अभिनेत्री हैं, जिनके नाम पर एक हेयरस्टाइल शुरू हुआ. उनका 'साया' हमेशा ज़िंदा रहेगा."
गायिका लता मंगेशकर ने ट्विटर के ज़रिए कहा, ''मुझे अभी पता चला कि मेरी पसंदीदा अभिनेत्री साधना जी का आज स्वर्गवास हुआ है. वो एक बहुत बड़ी कलाकार थी. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे.''
साधना के साथ फ़िल्म 'एक फूल दो माली' और 'इंतकाम' में काम कर चुके अभिनेता संजय ख़ान कहते हैं, ''मैंने उनके साथ अपनी दो सबसे कामयाब फ़िल्में की थीं. वो बेहद ख़ूबसूरत थीं. बहुत सुंदर तरीके से चलती थीं. उन्हें हेयर स्टाइलिंग की इतनी समझ थी की एक बार उन्होनें मुझे एक नया हेयर स्टाइल दिया था.''
उन्होंने कहा, ''साधना के पति आरके नैय्यर मेरे करीबी मित्र थे. मुझे याद है कि साधना जितनी ख़ूबसूरत थी उतनी ही साफ़ दिल की थीं.''
संजय ख़ान ने कहा, ''मैं उनसे मिलने नहीं गया क्योंकि मुझे मालूम था कि वो ठीक नहीं हैं. उन्हें दावत देने की मेरी ख़्वाहिश अधूरी रह गई. मैं उन्हें बीमार नहीं देखना चाहता था. बहुत दुख है.''
अभिनेत्री आशा पारेख के मुताबिक़, ''पिछले हफ़्ते ही हम मिले थे और हमारी पार्टियां होती थीं, जिनमें हम बीते ज़माने की एक्ट्रेसेज़– हेलेन, वहीदा रहमान, शम्मी आंटी और कई लोग मिलते थे. उनकी तबियत पहले से ख़राब थी और पांच-छह कोर्ट केस भी चल रहे थे, जिनके चलते वह परेशान थीं. उन्होंने कभी अपना दुख हमसे साझा नहीं किया.''
आशा पारेख कहती हैं, ''वह बहुत पॉपुलर थीं और उसका 'साधना कट' मुझे आज भी याद है. हम उनके घर ही जा रहे हैं.''
पिछले साल मुँह के कैंसर की वजह से साधना की सर्जरी हुई थी. पिछले साल वह अभिनेता रणबीर कपूर के साथ रैंप पर भी दिखी थीं.





Monday, 5 December 2016

Florence Ezekiel Nadira :5 December 1932: --- Sanjog Waltar

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OLD is GOLD
19 hrs
Florence Ezekiel Nadira (5 December 1932 – 9 February 2006), commonly known as Nadira was an actress in Indian cinema. She is best remembered for her performance in films in the 1950s and 1960s such as Shree 420 (1955), Pakeezah (1972) and Julie (1975), which won her Filmfare Best Supporting Actress Award.
Nadira was born to a Baghdadi Jewish family. She is survived by two brothers, one of whom lives in the USA and another in Israel.
Nadira rose to cinematic prominence with the 1952 film Aan with her role as a savage princess. She did a bold scene in the movie. In 1955, she played a rich socialite named Maya in Shree 420. She played lead roles in a number of films such as Dil Apna Prit Parayee, Hanste Zakhm, Amar Akbar Anthony and Pakeezah. She was often cast as a temptress or vamp, and played opposite the chaste heroines then favored by the Bollywood film industry.
Nadira won a Filmfare Award for Best Supporting Actress, her role as Julie's mother Margaret, 'Maggie', in the 1975 film Julie. During the 1980s and 1990s, she entered a new phase of her career, playing elderly women as a supporting actress. Her last role was in the film Josh (2000). In her longtime career, because of her western attire, her character in most of her memorable movies was Christian or Anglo-Indian. One notable exception can be found in the movie Aan, opposite Dilip Kumar, where she played a Rajput princess. Also, in Shree 420 there was no religious affiliation shown explicitly: her character was named Maya, which is not necessarily a Christian name. In fact, Maya is a quite common name in India, coming from the Sanskrit word for illusion.
She was well paid for her efforts and was one of the first Indian actresses to own a Rolls-Royce.
Nadira was married twice: she first married an Urdu-language poet and filmmaker named Naqshab, then she married a man whom she publicly called a gold-digger. This marriage lasted only a week.
For the last part of her life, she lived alone in Mumbai, as many of her relatives had moved to Israel, staying for the last three years in her condominium with only a housekeeper.
On 9 February 2006, Nadira died at the age of 73 at the Bhatia Hospital in Tardeo, Mumbai, India, following a prolonged illness.


Monday, 10 October 2016

चिर युवा और चिर एकाकी रेखा को जन्मदिन (10 अक्टूबर) की अशेष शुभकामनाएं ------ ध्रुव गुप्त





Dhruv Gupt


मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेक़रार है ?
अतृप्तियों के अनन्त रेगिस्तान में प्रेम की मृगतृष्णा के पीछे भागती हिन्दी सिनेमा की सबसे ग्लैमरस, सबसे विवादास्पद, सबसे संवेदनशील अभिनेत्रियों में एक रेखा की अभिनय-यात्रा और उसका रहस्यमय आभामंडल समकालीन हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित मिथक रहे हैं। तमिल फिल्मों के सुपर स्टार जेमिनी गणेशन और तमिल फिल्म अभिनेत्री पुष्पवल्ली के अविवाहित संबंधों की उपज रेखा को मां-बाप का प्यार कभी मिला ही नहीं। बाप ने उसे अपनी संतान मानने से इनकार किया और मां ने अपना भारी क़र्ज़ उतारने के लिए बचपन में ही फिल्मों की ओर धकेल दिया। तमिल फिल्मों में बाल कलाकार के तौर पर अभिनय करने वाली रेखा ने कुछ तमिल और तेलगू फिल्मों में नायिका की भूमिकाएं भी निभाईं। मां का क़र्ज़ उतारने के लिए उसे कुछ सी ग्रेड अश्लील फिल्मों में भी अभिनय करना पड़ा था।1970 की फिल्म 'सावन भादों' से उसका हिंदी फिल्मों में पदार्पण हुआ। यह फिल्म तो चली, लेकिन बेहद मामूली और अनगढ़-सी दिखने वाली सांवली और मोटी रेखा का लोगों ने मज़ाक भी कम नहीं उड़ाया। कैरियर के आरंभिक वर्षों में उसके कई सह-अभिनेताओं द्वारा उसके भावनात्मक शोषण के किस्से आम हैं। अपने कैरियर की शुरूआत में वह अपने अभिनय या गलैमर के लिए नहीं, उस दौर के अभिनेताओं विश्वजीत, साजिद खान, किरण कुमार के साथ अपने छोटे-छोटे अफेयर और विनोद मेहरा के साथ अपनी संक्षिप्त और असफल विवाह के लिए ज्यादा जानी जाती थी। ग्लैमर की काली दुनिया में अकेली भटकती रेखा को आख़िरकार सहारा मिला 1976 की फिल्म 'दो अनजाने' के अपने नायक अमिताभ बच्चन से। अमिताभ से जुड़ने के बाद उनके मार्गदर्शन में व्यक्ति और अभिनेत्री के तौर पर उनका रूपांतरण आरम्भ हुआ। देखते-देखते सावन भादो, रामपुर का लक्ष्मण, धर्मा, धरम करम, गोरा और काला, एक बेचारा जैसी सामान्य फिल्मों की अनगढ़,भदेस, फूहड़ रेखा अपने कैरियर के उत्तरार्ध में उमराव जान, सिलसिला, आस्था, इजाज़त, आलाप, घर, जुदाई, उत्सव, खूबसूरत, कलयुग की खूबसूरत, शालीन, संवेदनशील अभिनेत्री में बदल गई। रेखा में आने वाला यह आमूल बदलाव उस दौर में किसी चमत्कार जैसा ही माना गया। अपनी परवर्ती फिल्मों के विविध और चुनौतीपूर्ण किरदारों में उन्होंने अभिनय के कई प्रतिमान गढ़े भी और तोड़े भी। 'उमराव जान' उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म मानी जाती है। रेखा को अभिनेत्रियों का अमिताभ बच्चन भी कहा गया। लंबे अरसे से फिल्मों में वे कम ही दिख रही हैं, लेकिन चरित्र भूमिकाओं में ही सही, आज भी रूपहले परदे पर उनकी उपस्थिति मात्र एक जादूई अहसास और सम्मोहन छोड़ जाती है। पिछले तीन दशकों से अमिताभ बच्चन के साथ रेखा का थोड़े ज़ाहिर और बहुत-से दबे-छुपे प्रेम का शुमार राज कपूर-नर्गिस, दिलीप कुमार-मधुबाला, देवानंद-सुरैया के बाद हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित, लेकिन सबसे रहस्यमय प्रेम-कथाओं में होता है।
चिर युवा और चिर एकाकी रेखा को जन्मदिन (10 अक्टूबर) की अशेष शुभकामनाएं, एक शेर के साथ !
जिस एक बात पे दुनिया बदल गई मेरी 
क्या पता आपने मुझसे कभी कहा भी न हो !
(ध्रुव गुप्त) #Rekha
साभार :
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1153367974739799&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3

Sunday, 18 September 2016

कोई ये कैसे बताए कि वो तनहा क्यूं है ? ------ ध्रुव गुप्त

Dhruv Gupt

कोई ये कैसे बताए कि वो तनहा क्यूं है ?
आधुनिक भारतीय सिनेमा की महानतम अभिनेत्रियों में एक शबाना आज़मी ने सिनेमा में संवेदनशील और यथार्थवादी अभिनय के जो आयाम जोड़े, उसकी मिसाल भारतीय सिनेमा में तो क्या, विश्व सिनेमा में भी कम ही मिलती है। अभिनय की गहराई ऐसी कि उनकी एक-एक ख़ामोशी सौ-सौ लफ़्ज़ों पर भारी। परदे पर उनकी ज़ुबान कम, आंखें ज्यादा संवाद करती हैं। महान शायर कैफ़ी आज़मी की इस बेटी को फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट, पुणे से ग्रेजुएशन के बाद जो पहली फिल्म मिली, वह थी ख्वाजा अहमद अब्बास की 'फ़ासला', लेकिन परदे पर पहले आई श्याम बेनेगल की 'अंकुर'। इस फिल्म की सफलता और ख्याति ने उन्हें उस दौर की दूसरी महान अभिनेत्री स्मिता पाटिल के साथ तत्कालीन समांतर और कला सिनेमा का अनिवार्य हिस्सा बना दिया। शबाना ने चार दशक लंबे फिल्म कैरियर में पचास से ज्यादा हिंदी, बंगला और अंग्रेजी फिल्मों में अपने अभिनय के झंडे गाड़े, जिनमें कुछ यादगार फिल्में हैं - अंकुर, परिणय, निशांत, मंडी, शतरंजके खिलाड़ी, स्पर्श, तहजीब, अर्थ, खंडहर, जुनून, मासूम, मृत्युदंड,गॉडमदर, मकड़ी, आर्तनाद, धारावी, दिशा,नमकीन, थोड़ी सी बेवफ़ाई, दस कहानियां, फायर, लिबास, कल्पवृक्ष, भावना, पार,अवतार, उमराव जान, एक ही भूल, साज़, हनीमून ट्रेवल्स, मटरू की बिजली का मंडोला, पतंग, द मोर्निंग रागा, 15 पार्क अवेन्यू, द मिडनाइट चिल्ड्रेन, द बंगाली नाईट, साइड स्ट्रीट्स आदि। उन्होंने आर्थिक दबाव में कुछ फिल्मों में बेमतलब की ग्लैमरस भूमिकाएं भी की थी, जिन्हें वे खुद भी भूल जाना चाहेंगी। शबाना आज़मी पहली अभिनेत्री हैं जिन्हें अपनी फिल्मों में अभिनय के लिए पांच राष्ट्रीय और आठ फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। अभिनय के अलावा स्त्री और बच्चों के अधिकारों और मानवीय समस्याओं के लिए लड़ने वाली एक योद्धा के रूप में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है।
जन्मदिन (18 सितंबर) पर आपके लंबे और सृजनशील जीवन के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं, शबाना ! #ShabanaAzmi

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Thursday, 8 September 2016

जन्मदिवस : आशा भोसलें ------ कुलदीप कुमार 'निष्पक्ष'


कुलदीप कुमार 'निष्पक्ष'


ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना रे 
दे दूँगी जान जुदा मत होना रे......!
जन्मदिवस/ आशा भोसलें
ओ•पी नैय्यर के मधुर संगीत से लगाय पंचम के तेज़ संगीत तक हर तरह के गीत गाने वालीं आशा का जन्म 8 सितम्बर 1933 को महाराष्ट्र के 'सांगली' में हुआ। इनके पिता पं• दीनानाथ मंगेशकर एक शास्त्रीय गायक थें। जब आशा 9 साल की तभी उनका निधन हो गया था। इनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर ने बहुत कम उम्र में ही बॉलीवुड में अपना नाम स्थापित कर लिया था। यानी घर का पूरा माहौल ही संगीत से भरा था। फिर भी आशा को बॉलीवुड में जगह बनाने में बहुत संघर्ष करना पड़ा। शुरू में उन्हें केवल छोटी बजट की फिल्मों के लिए गाने का मौक़ा मिलता था। लेकिन इनकी प्रतिभा को सबसे पहले महान संगीतकार ओ•पी• नैय्यर ने पहचाना और इन्हें 'मांगू' फ़िल्म में काम दिया। इसके बाद 'सी•आई•डी' और फिर 'नया दौर' फ़िल्म में मुख्य पार्श्वगायिका के रूप में काम दिया। यह दोनों फ़िल्म आशा के कैरियर की सबसे बड़ी फ़िल्म साबित हुयें और उन्हें बॉलीवुड में एक अलग पहचान मिली। ओ•पी• नैय्यर के साथ उन्होंने हाबड़ा ब्रिज, मेरे सनम और कश्मीर की कली जैसी म्यूजिकल हिट्स फ़िल्में दी। 60 के दशक के अंतिम समय में आशा की जोड़ी महान संगीतकार पंचम (राहुल देव बर्मन) के साथ बनी। और इस जोड़ी ने तेज़ संगीत पर पॉप, कैबरे और डिस्को गीत की शुरुवात बॉलीवुड में की। जिसे तब के श्रोताओं ने 'हॉट सांग' की संज्ञा दी थी। एक तरफ पंचम का वेस्टर्न स्टाइल म्यूजिक और दूसरी तरफ आशा की चंचल, अल्हड़ और मादक आवाज़ इसने बॉलीवुड में म्यूजिक ट्रेंड को ही बदलकर रख दिया। इस जोड़ी ने 'पिया तू अब तो आजा (कारवाँ), दम मारो दम (हरे कृष्णा हरे राम), ओ मेरे सोना रे सोना रे सोना रे (तीसरी मंज़िल), जाने जा ढूंढता फिर रहा ( जवानी दीवानी) जैसे सुपरहिट्स गीत दिए। इस जोड़ी ने 'मेरा कुछ सामान और खाली हाथ शाम आयी' जैसे शांत कर्णप्रिय गीत भी बॉलीवुड को दिए हैं। आशा जी के कैरियर की दो और महत्वपूर्ण फ़िल्में हैं पहला 'उमराव जान' जिसने उनको एक ग़ज़ल गायिका के रूप में भी लोगों के सामने रखा। और दुसरा 'रंगीला' जिसने उनकी दूसरी पारी बॉलीवुड में शुरू की। आशा का संगीतकार जयदेव के संगीत निर्देशन में एक ग़ज़ल एल्बम 'एन अन्फोर्गेटेबल ट्रीट' भी आया था। जिसकी काफी प्रसंशा हुई थी । 
आशा ने हिंदी, मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, भोजपुरी, तमिल, मलयालम, अंग्रेजी और रुसी भाषा में कुल 16000 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड करवाएं हैं। उन्होंने शास्त्रीय संगीत, उप-शास्त्रीय संगीत, भजन, ग़ज़ल, पॉप और कैबरे गीत गाएं हैं। उन्होंने घर के विरुद्ध जाकर 16 साल की उम्र में ही गणपत राव भोसलें से शादी कर ली थी। लेकिन उनका वैवाहिक जीवन काफी दुष्कर रहा जिसके कारण 1960 में उन्होंने तलाक ले लिया। इसके बाद उन्होंने 1980 में पंचम से शादी किया।
आशा को कुल 7 बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिल है। यह पुरस्कार उन्हें 'गरीबी की सुनो (दस लाख, 1968), परदे में रहने दो (शिकार, 1969), पिया तू अब तो आजा (कारवां 1972), दम मारो दम (हरे कृष्णा हरे राम, 1973), होने लगी है रात जवां (नैना, 1974), चैन से हमको कभी (प्राण जाए पर वचन न जाए, 1975), ये मेरा दिल (डॉन, 1979)' गीत के लिए मिला। उन्हें उमराव जान के गीत 'दिल क्या चीज़ मेरी' और इज़ाजत फ़िल्म के गीत 'मेरा कुछ सामान' के लिए सर्वश्रेष्ठ गायिका का राष्ट्रिय फ़िल्म पुरस्कार भी मिला।
महान पार्श्वगायिका को उनके एक गीत की कुछ पंक्तियों के साथ जन्मदिवस की शुभकामनाएँ !
'जाईये आप कहाँ जायेंगे 
ये नज़र लौट के फिर आएगी 
दूर तक आप के पीछे पीछे 
मेरी आवाज़ चली जाएगी
आप को प्यार मेरा याद जहाँ आयेगा 
कोई काँटा वही दामन से लिपट जायेगा'