Saturday, 22 October 2022

स्मिता पाटिल को याद करते हुए ------ रोशन सुचान




भारतीय सिनेमा की अदाकारा स्मिता पाटिल : जिसके कम्युनिस्ट पिता आजादी आंदोलन में 12 साल जेलों में रहे ❤ 

छोटी उम्र में अलविदा कहने वाली अभिनेत्री स्मिता पाटिल की कहानी  ❤ 

महज 14 साल की उम्र में AISF और सीपीआई से जुड़ गए थे स्मिता के पिता शिवाजीराव पाटिल ❤ 

न्यूज एंकर रही स्मिता राज बब्बर की पत्नी थी छोटी उम्र हो गया था देहांत . सांमतवादी व्यवस्था के बीच पिसती औरत की संघर्ष की कहानी बयां करती थी उनकी फिल्में 

5 दिन पहले स्मिता पाटिल का 17 अक्तूबर को जन्मदिन था . 1955 को पैदा हुई थी एक कम्युनिस्ट और स्वतंत्रता सेनानी परिवार में । छोटी सी उम्र 30 साल भरी जवानी में उनका देहांत हो गया था । स्मिता पाटिल एक सक्रिय नारीवादी होने के अतिरिक्त मुंबई के महिला केंद्र की सदस्य भी थीं। वे महिलाओं के मुद्दों पर पूरी तरह से वचनबद्ध थीं और इसके साथ ही उन्होने उन फिल्मो मे काम करने को प्राथमिकता दी जो परंपरागत भारतीय समाज मे शहरी मध्यवर्ग की महिलाओं की प्रगति उनकी कामुकता तथा सामाजिक परिवर्तन का सामना कर रही महिलाओं के सपनों की अभिवयक्ति कर सकें.

स्मिता पाटिल का जन्म 17 अक्तूबर 1955 को पुणे (महाराष्ट्र) के राजनीतिज्ञ स्वतंत्रता सेनानी शिवाजीराव गिरधर पाटिल और सामाजिक कार्यकर्ता विद्याताई पाटिल के यहाँ कुनबी मराठा परिवार में हुआ था।

पहली बार 1970 के दशक में टीवी न्यूज़रीडर के रूप में कैमरा का सामना किया। उस वक्त वो सरकारी खबर प्रसारक मुंबई दूरदर्शन पर बतौर न्यूज़रीडर के रूप में काम करती थी।

सन 1975 में श्याम बेनेगल की “निशांत” से फ़िल्मी करियर की शुरुवात करने वाली स्मिता 1976 में मंथन और 1977 में भूमिका से सशक्त अभिनेत्री के रूप में सामने आयी | “भूमिका” के रोल के लिए उन्हें पहला राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला | मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार जयवंत दलवी की कृति पर आधारित “चक्र” में अम्मा की भूमिका के लिए उन्हें दुबारा राष्ट्रीय पुरुस्कार से सम्मानित किया गया | “बाजार” में स्मिता (Smita Patil) ने एक मुस्लिम लडकी का किरदार निभाया , जो अपनी आँखों के सामने ही औरत के सौदा होने की गवाह बनी | वही जब्बार पटेल की सुबह में उन्होंने एक ऐसे अधिकारी की पत्नी का रोल अदा किया था जो पत्नी की गैर-मौजूदगी में एक दुसरी औरत से रिश्ता कायम कर लेता है |

“स्मिता की मृत्यु से फ़िल्मी दुनिया में जो खालीपन आया था वह कभी नही भरा जा सका । उनकी गैर-मौजूदगी हिन्दी सिनेमा के साथ साथ विश्व सिनेमा को भी खलती रही है ।

विद्रोही रही स्मिता की बडी़ आंखों और सांवले सौंदर्य ने पहली नज़र मे ही सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था । कालांतर मे स्मिता पाटिल के प्रेम संबंध राज बब्बर से हो गये जिनकी परिणिति अंतंतः विवाह मे हुई। राज बब्बर जो पहले से ही विवाहित थे और उन्होने स्मिता से शादी करने के लिये अपनी पहली पत्नी को छोडा़ था।

स्मिता पाटिल ने 1980 में प्रदर्शित फ़िल्म 'चक्र' में झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाली महिला के किरदार को रूपहले पर्दे पर जीवंत कर दिया। इसके साथ ही फ़िल्म 'चक्र' के लिए वह दूसरी बार 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' से सम्मानित की गईं। अस्सी के दशक में स्मिता पाटिल ने व्यावसायिक सिनेमा की ओर भी अपना रुख़ कर लिया। इस दौरान उन्हें सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के साथ 'नमक हलाल' और 'शक्ति (1982 ) जैसी फ़िल्मों में काम करने का अवसर मिला, जिसकी सफलता ने स्मिता पाटिल को व्यावसायिक सिनेमा में भी स्थापित कर दिया। अस्सी के दशक में स्मिता पाटिल ने व्यावसायिक सिनेमा के साथ-साथ समानांतर सिनेमा में भी अपना सामंजस्य बनाये रखा ।

1985 में स्मिता पाटिल की फ़िल्म 'मिर्च-मसाला' प्रदर्शित हुई। सौराष्ट्र की आज़ादी के पूर्व की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म ने निर्देशक केतन मेंहता को अंतराष्ट्रीय ख्याति दिलाई। यह फ़िल्म सांमतवादी व्यवस्था के बीच पिसती औरत की संघर्ष की कहानी बयां करती है। यह फ़िल्म आज भी स्मिता पाटिल के सशक्त अभिनय के लिए याद की जाती है ।

उनके पिता शिवाजीराव गिरधर पाटिल स्वतंत्रता सेनानी थे । सामाजिक कार्यकर्ता और महाराष्ट्र के नेता थे . देश के पहले छात्र संगठन AISF से जुड़कर आजादी आंदोलन में भाग लिया । स्वतंत्रता के बाद, वह विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े थे और एक कार्यकाल के लिए महाराष्ट्र विधान परिषद , महाराष्ट्र विधान सभा और यहां तक ​​कि राज्य सभा के सदस्य भी रहे थे। 2013 में, उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण से सम्मानित किया गया ।

पाटिल कम उम्र से ही एक सक्रिय राजनेता थे, और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी CPI से लंबे समय तक जुड़े रहे । फिर कांग्रेस पार्टी , समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सहित कई राजनीतिक दलों से जुड़े रहे ।

पाटिल ने एक क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपना करियर शुरू किया, और एक किशोर के रूप में कम्युनिस्ट आंदोलन की ओर आकर्षित हुए। 1939 में, केवल 14 वर्ष की आयु में, वह अखिल भारतीय छात्र संघ (एआईएसएफ) के अध्यक्ष बने, जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की छात्र शाखा है। अगस्त 1936 में स्थापित, एआईएसएफ छात्रों का पहला राष्ट्रीय भारतीय संघ था। एआईएसएफ के माध्यम से, पाटिल ने भारत में ब्रिटिश शासन को खत्म करने के उद्देश्य से विभिन्न गतिविधियों में भाग लिया। इनमें से कुछ गतिविधियाँ हिंसक थीं, और पाटिल को गिरफ्तार किया गया, उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें बारह वर्षों तक जेल में रखा गया।  हालांकि, उन्होंने अपनी सजा पूरी नहीं की और पकड़े जाने से पहले कुछ समय के लिए लखनऊ में अंडरकवर होकर जेल से बाहर निकल आए।

पाटिल 1960 से 1967 तक महाराष्ट्र विधान परिषद (उच्च सदन) और 1967 से 1978 तक महाराष्ट्र विधान सभा (निचले सदन) के सदस्य रहे, उन्होंने शिरपुर से 1967 और 1972 का चुनाव लड़ा और जीता । उन्होंने महाराष्ट्र सरकार में दो कार्यकालों के लिए मंत्री के रूप में कार्य किया: 1968-72 वसंतराव नाइक के अधीन और 1976-78 शंकरराव चव्हाण और वसंतदादा पाटिल के अधीन । ये सभी मंत्री कांग्रेस पार्टी के थे । मंत्री के रूप में, पाटिल ने सिंचाई, बिजली, प्रोटोकॉल, सहकारिता और विधायी मामलों के विभागों को संभाला। बाद में, वह 1992 से 1998 तक एक कार्यकाल के लिए राज्य सभा के सदस्य भी रहे। 

पाटिल महाराष्ट्र में चीनी क्षेत्र में सहकारी आंदोलन में भी सक्रिय थे, जो राज्य में अत्यधिक राजनीतिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। 1981 में, उन्होंने धुले जिले के शिरपुर में सहकारी चीनी कारखाना "शिरपुर सहकारी साखर कारखाना" शुरू करने में मदद की । वह 2009 तक लगातार 27 वर्षों तक इसके अध्यक्ष रहे, जब वसंतराव पाटिल चुने गए। 2012 तक पाटिल नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज के निदेशकों में से एक हैं।

1996 में, उनकी अध्यक्षता में, स्मिता पाटिल चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना उनकी बेटी, अभिनेत्री स्मिता पाटिल की याद में की गई थी, जिनकी 1986 में प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई थी। ट्रस्ट शिरपुर तालुका के दहीवाड़ गाँव में एक स्मिता पाटिल पब्लिक स्कूल चलाता है। ग्रामीण क्षेत्र में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के मिशन के साथ धुले जिला । 

2013 में, भारत सरकार ने उन्हें सार्वजनिक मामलों में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया। यह पुरस्कार भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है। 

पाटिल की शादी विद्याताई पाटिल से हुई थी। विद्याताई शिवाजीराव द्वारा एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में आयोजित कुछ जलसों में शामिल थीं और उनके जोश और कार्य से प्रेरित होकर अपनी मंगनी तोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में शामिल हो गई । वे नास्तिक और गैर-अनुष्ठानवादी दोनों थे और उनकी शादी साने गुरुजी द्वारा की गई थी । 1938 में हुई यह शादी 77 साल तक चली । विद्याताई पाटिल की मार्च 2015 में मृत्यु हो गई।  विद्याताई पाटिल ने अपने पति का 12 साल का कारावास, मंत्री पद की पावर और फिल्म-स्टार बेटी स्मिता की उथल-पुथल और मृत्यु भरी जिंदगी को देखा ।पाटिल तीन बेटियों अनीता, स्मिता और मान्या के माता-पिता थे। अनीता का विवाह शंकर देशमुख से हुआ था, इस दंपति के दो बेटे हैं, (वरुण और आदित्य देशमुख)। अनीता वर्तमान में मुंबई में रहती है और पुकार की कार्यकारी निदेशक है । अनीता की पोती का नाम उनकी बहन स्मिता के नाम पर ज़ो स्मिता देशमुख रखा गया है। तीसरी और सबसे छोटी बेटी, मान्या सेठ, एक पूर्व पोशाक डिजाइनर हैं, और स्मिता पाटिल फाउंडेशन के अध्यक्ष के रूप में कार्य करती हैं। 

स्मिता पाटिल ने एक न्यूज़रीडर के रूप में अपना करियर शुरू किया था, लेकिन जल्दी ही फिल्मों में चली गईं। वह समीक्षकों द्वारा प्रशंसित हिंदी फिल्म अभिनेत्री बन गईं और अपने शानदार प्रदर्शन के लिए कई पुरस्कार जीते।  अभिनेता से नेता बने राज बब्बर से शादी की, जो पहले से ही नादिरा बब्बर से शादी कर चुके थे, जिनसे उनके पहले से ही दो बच्चे थे। इस रिश्ते से स्मिता गर्भवती हो गई और दिसंबर 1986 में उसने एक बेटे को जन्म दिया। बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद उसकी मौत हो गई। इस समय पाटिल और उनकी पत्नी दोनों ने अपना 60वां जन्मदिन पार कर लिया था। फिर भी, उन्होंने नवजात बच्चे को पालने की जिम्मेदारी संभाली, जो बड़ा होकर अभिनेता प्रतीक बब्बर के रूप में फेमस हुआ ।

स्मिता पाटिल को याद करते हुए - रोशन सुचान

Thursday, 17 September 2020

बिहारी अस्मिता को छुपाने वाला बना बिहार का नायक



 सपा सांसद जया बच्चन ने आज राज्यसभा कहा कि बॉलीवुड को बदनाम करने की साजिश चल रही है। मनोरंजन उद्योग में लोगों को सोशल मीडिया के माध्यम से ट्रोल किया जा रहा है। इंडस्ट्री में अपना नाम बनाने वाले लोगों ने इसे नाली कहा है। मैं पूरी तरह से असहमत हूं। मुझे उम्मीद है कि सरकार ऐसे लोगों को इस तरह की भाषा का उपयोग नहीं करने के लिए कहेगी। सिर्फ कुछ लोगों के कारण आप पूरी इंडस्ट्री की छवि को धूमिल नहीं कर सकते। मुझे शर्म आती है कि कल लोकसभा में हमारे एक सदस्य, जो फिल्म उद्योग से हैं, ने इसके खिलाफ बात की। यह शर्म की बात है।

Saturday, 29 August 2020

Leena Chandavarkar : 29-Agust 1950


aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 अगस्त 2019,
  • (अपडेटेड 29 अगस्त 2019, 7:39 AM IST)
बीते जमाने की एक्ट्रेस लीना चंदावरकर का जन्म मुंबई में एक आर्मी परिवार में हुआ. उन्होंने अपनी अदाकारी से दर्शकों के दिल में दशकों तक राज किया. लीना ने अपना करियर मन का मीत फिल्म से शुरू किया था. इस फिल्म को सुनील दत्त ने प्रोड्यूस किया था. बताया जाता है इस फिल्म के लिए सुनील दत्त की पत्नी नरगिस ने उन्हें एक एक्ट्रेस के रुप में तैयार किया था. इसके अलावा उन्होंने मेहबूब की मेहंदी, हमजोली, प्रीतम, रखवाला जैसी बेहतरीन फिल्मों में काम किया. लीना महज 25 साल की उम्र में विधवा हो गई थीं. इसके बाद उन्होंने अपने से 20 साल बड़े किशोर कुमार से शादी कर ली. 29 अगस्त को लीना का जन्मदिन है. आइए लीना की निजी जिंदगी के बारे में जानें...

1975 में लीना की शादी राजनैतिक फैमिली से ताल्लुक रखने वाले सिद्धार्थ बंडोडकर से हुई थी. लेकिन किसे पता था कि एक घटना की वजह से उनकी बसी बसाई जिंदगी बंजर हो जाएगी. उनके पति को गलती से गोली लग गई थी. इसका कुछ समय तक इलाज चला लेकिन वह मौत से जीत नहीं पाए और उनका निधन हो गया.

पति के इस तरह से चले जाने के बाद लीना डिप्रेशन में चली गई थीं. उन्होंने अपने करीबियों से मिलना जुलना बंद कर दिया था. लीना की ऐसी हालत देख उनके पिता उन्हें घर ले गए. कुछ समय बाद उन्होंने फैसला लिया कि वह फिर से इंडस्ट्री में वापसी करेंगी. उन्होंने दोबारा फिल्मों में काम करना शुरू किया. इसी बीच उनकी मुलाकात किशोर कुमार से हुई. दोनों ने मिलना जुलना शुरू किया. दोनों की प्रेम कहानी दोस्ती से शुरू होकर शादी पर खत्म हुई.

इस बीच लीना को परिवार की आपत्ति का भी सामना करना पड़ा. जब लीना ने अपने पिता को किशोर के बारे में बताया तो वह नाराज हो गए. उन्होंने दोनों के रिश्ते का विरोध किया. लीना के पिता नहीं चाहते थे कि वह एक ऐसे इंसान से शादी करें जो तीन बार शादी कर चुका हो. लेकिन लीना ने परिवारवालों के खिलाफ जाकर किशोर कुमार से शादी. इन दिनों वह सौतेले बेटे सिंगर अमित कुमार, बेटे सुमित कुमार के साथ मुंबई में रहती हैं.


रिया ने कुछ भी झूठ नही बोला : आवेश तिवारी ------ पवन करन / संतोष भारती





28-08-2020 
आज एक लड़के से बेहद प्यार करने वाली एक लड़की ने बिकी हुई मीडिया, बेशर्म राजनीति  और पुरुषवादी, सवर्णवादी समाज के  ताने बाने की बघिया उधेड़ कर रख दी। आज भारत देखेगा कि अर्नब के चेहरे पर कालिख पोत कर घूमता है कि नही? आज भारत देखेगा कि बिहार को नरक बना देने वाले  नेता अपना चेहरा पीटते हैं कि नही? आज भारत देखेगा कि देश के पुरुष, अपनी मां, अपनी बहन, अपनी पत्नी, अपनी प्रेमिका से आंख मिला पाते हैं या नही?
राजदीप ने आज जो करके दिखाया है वो उन्हें सबसे अलग कतार में खड़ा कर देता है। भुखमरी बेचारगी और एक अंतहीन होते जा रहे रोग से जूझते देश मे एक प्रेमी जोड़े की निजता को तार तार कर एक सरकार पर निशाना बना रही मीडिया को इस जैसे तमाचे की ही जरूरत थी। निस्संदेह आज का थप्पड़ अर्नब और अंजना को हमेशा याद रहेगा। इस इंटरव्यू को देखनेके बाद जो कोई रिया के खिलाफ बोले तो सोचो उसके भीतर कौन छुपकर बैठा है।
मुमकिन है कि कुछ लोगों को रिया के आंसू झूठे लग रहे होंगे। कुछ लोग कहेंगे झूठ बोल रही थी रिया। दरअसल ऐसा कहने वाले वो स्त्री पुरूष हैं जिन्होंने कुछ भी किया हो कम से कम प्रेम तो नही किया होगा। बतौर जर्नलिस्ट मैं दावे के साथ कह सकता हूँ रिया ने कुछ भी झूठ नही बोला। पाले हुए धूर्त जमात के पत्रकारों, बॉलीवुड के कलाकारों  ने रिया के नाम का इस्तेमाल करके बिहार चुनाव में मुद्दों को भटकाने की तो  कोशिश की ही और कोरोना के प्रबंधन में अपनी असफलता पर भी पर्दा डालने की कोशिश की है। 
अब बारी सुशांत के परिवार के साथ साथ अर्नब गोस्वामी और कंगना रनौत जैसों की है। सुशांत की बहनों को जवाब देना होगा सुशांत ने सुसाइड क्यों किया? अर्नब को बताना होगा कि ईडी से उसे रिया के पर्सनल चैट कैसे मिले? सुशांत के पापा बातायें 5 साल तकः बेटे से क्यों नही मिले? कंगना बताए इस मामले में प्रोपोगंडा फैलाने के लिए उसे क्या तोहफा मिला?
आवेश तिवारी

https://www.facebook.com/pawan.karan.5/posts/3630682753609780?__cft__[0]=AZWc0btix2W8WTpgzEFOJaQVb1b4djvLwvqmvghRViD9zGB98mlH_6EitcdR6Y6Y6VITP5zAXDhu2ZRyGcu5vER-dDFC5vcM1EKiPNh9Djjj0qLapnNxqa8m2cKvflhf43DZjdip4JW7aWxm1-Q3KX62OtGDcOMWH-1SnBub6oQpRw&__tn__=%2CO%2CP-R





लाउत्सु पर बोलते ओशो बताते हैं कि कैसे एक बार उन्हें न्यायाधीश बनाया गया। एक चोरी का मामला आया, चोर रंगे हाथों पकड़ा गया था, लेकिन लाउत्सु ने जितनी सजा चोर को दी उतनी ही उस धनिक को भी जिस के यहां चोरी हुई। बड़ा अजीब लगा, लाउत्सु बोला कि किसी को चोरी करनी पड़ती है क्योंकि किसी ने जरूरत से अधिक जमा कर लिया है। ऐसे जुर्म में दोनों बराबर भागीदार हैं।
भारत का संविधान कहता है कि 99 दोषी बच जाये कोई बात नहीं, कोई निर्दोष नहीं फसना चाहिए। जब तक आरोप सिद्ध नहीं होता, व्यक्ति को निर्दोषी ही माना जाये, अपराधी नहीं। न्याय व्यवस्था, पुलिस, जांच एंजेसियों का अपना काम है, लेकिन खबरिया चैनल ने अपनी ग्राहकी बढ़ाने के लिए जितना अमानवीय काम लगातार किया है, उतना कोई दूसरा अपराध नहीं दिखाई देता है। आरूषी कांड में रात-दिन जो कुछ दिखाया गया, उस छोटी-सी बच्ची का जैसे चीरणहरण हुआ, उसके जिंदा माता-पिता को जिंदा लाश बना दिया गया...सिर्फ टी आर पी के लिए? 
हमारे देश में सेक्स बिकता है, जहां भी सेक्स के आसपास की कोई खबर है बस...याद है शीना बोरा, इंद्राणी मामला, सेक्स, स्त्री, मर्डर, चर्चित लोग...ये मसाले हैं टी आर पी में उछाल के गरमा-गरम मामले। लेकिन इस में इंसानियत पूरी तरह से नदारद, किसी को नहीं पड़ी कि एक इंसान की जिंदगी को यूं रोज-रोज तार-तार करना कितना बड़ा गुनाह है।
अब इन दिनों सुशांत का मामला चल रहा है। क्या कोई यह कह सकता है कि इन टी वी चैनल्स को सच में उसकी मृत्यु को लेकर कोई हमदर्दी हैं? राजनीति है, राजनीति फायदे का गणित है, सरकार को गिराने की जोड़-तोड़ है, किसी को बदनाम करने की कुटील चाले हैं, कोई भी कुछ भी बोल रहा है, किसी भी तरह का निम्न से निम्न आरोप लगाने में देर नहीं कर रहा...किसी को नहीं पड़ी कि जिस पर आरोप लगा रहे हो, उसकी जिंदगी का क्या होगा? 
मेरे देखे बात इतनी-सी है कि सुशांत को मानसिक परेशानी थी, यह आम बात है, भावुक, हृदय तल से जीने वाले, संवेदनशील, भोले, निर्दोष, सृजनकार अकसर मानसिक परेशानियों से गुजरते हैं...ये दुनिया या बहुसंख्यक या समाज की व्यवस्था ऐसे लोगों को असहनीय हो जाती है। वे अनफिट हो जाते हैं। एक विदेशी युवती के प्रश्न पर ओशो ने बताया कि संवेदनशील लोगों को आत्महत्या करनी पड़ती है क्योंकि उनका दम घुटता है...।
सुशांत अपनी मां से बहुत जुड़े हुए थे। भारत में यह आम बात है, मां के जाने के बाद अचेतन मन की कई पर्तें ऊपर आ जाती हैं। मैं स्वयं इस तरह के दौर से गुजरा हूं। कह सकता हूं कि मरते-मरते बचा। मैं भी ऐलोपैथी के चक्कर में पड़ा, लेकिन बहुत जल्दी ही मुझे लगा कि बीमारी को दबाने से काम नहीं चलेगा, उसे बाहर निकालना होगा तब सक्रिय ध्यान, मिस्टिक रोज, जिबरीश और अन्य इंटेस प्रयोग किये और मैं सामान्य हो गया...ऐलोपैथी की दवाइयां मामले को जटिल कर देती हैं।
रिया चक्रवर्ती एक सामान्य युवती है जिसे संयोग से किसी टी वी कार्यक्रम में सफलता मिली, फिर वह आगे बढ़ने लगी, लेकिन पक्का वह एक भोली युवती है, मासूम। सुशांत से उसका रिश्ता बन गया...किसी न किसी तल पर दोनों एक जैसे थे, बात बन गई, लेकिन सुशंात की मानसिक परेशानियां थीं...अब अंकिता लोखंड़े सालों पहले के वीडियो या जानकरियां लेकर आ रही है...हो सकता है कि उन दिनों में सुशांत की बीमारी ऊपर नहीं आई हो। नयी-नयी सफलता मिली थी, प्रसिद्धी मिली थी, स्टारडम मिली थी, प्रेम हुआ था...इसमें मानसिक परेशानियां दब जाती है...लेकिन समय के साथ सारी चकाचौंध फीकी पड़ने लगी, जीवन की कड़वी सच्चाइयां सामने आने लगी, फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश तो मिल गया लेकिन वहां जमे रहने में दिक्कतें आने लगी...महत्वाकांक्षाएं बढ़ने लगी...अनेक बातें हैं...ऐसे में मन हताश होने लगा, उदास होने लगा, गुस्सा आने लगा, अवसाद फिर सिर उठाने लगा...और वही ऐलोपैथी की दवाइयां...
रिया ने अपनी तरफ से जो कुछ भी कर सकती थी, किया, प्रेम था, वह भावुक युवती है, उसके अपने सपने थे, उसकी अपनी उड़ान थी, प्रेमी था, उसकी सफलता का मजा था, लेकिन उसकी कठिनाइयों के अवरोध भी...हर रिश्ता शुरू बड़े इंद्रधनुषी रंग लेकर आता है, लेकिन समय के साथ रंग उड़ने लगते हैं...सफलताएं-असफलताएं, मानसिक रोग, गुस्से, शिकायतें, नकारात्मकता, खीज, दुख...ये किसी भी रिश्ते में जहर घोल देते हैं...दोनों को लगता है कि दूसरा मेरे दुखों के लिए जिम्मेदार है...तब तानाकशी, दोष मढ़ना, नीचा दिखाना, लड़ाई-झगड़े...बीच-बीच में कुछ अच्छे पल भी विशेषकर शारीरिक रिश्ते...उसमें प्रकृति अपना काम करती है...लेकिन सच बहुत अलग हो जाता है।
मुझे सुशांत-रिया का रिश्ता बेहद आम रिश्तों की तरह ही लगा, अधिकांश रिश्ते ऐसी ही पगडंडियों से गुजरते हैं औैर समय के साथ नई राहें निकल आती है...सुशांत का मां से जैसा लगाव था, उसे हर प्रेमिका में मां दिखती होगी, वह चाहता होगा कि उसकी प्रेमिका उसे मां की तरह संभाले...सामान्यतया लड़कियां ऐसा कर भी लेती हैं, लेकिन हर समय मां बने रहना तो संभव नहीं होता, वे प्रेमिका भी होती हैं...जब उनका वह पक्ष संतुष्ट नहीं होता तो दम घुटने लगता है...उन्हें एक मजबूत मर्द साथी की जरूरत होती है न कि कमजोर बच्चा जिसे रोज लोरी सुनानी पड़े...प्यार के होते लोरी सुना देती है, लेकिन कौन युवती होगी जो एक बच्चे को गोदी में लेकर बैठी रहे, लोरी ही सुनाती रहे? दिक्कतें रिश्तों में आती हैं...हर रिश्ता मधुर शुरू होता है, कडवाहट के साथ समाप्त होता है...!
बात बस इतनी-सी है...आत्महत्या, राजनीति, टी आर पी...रिया चक्रवर्ती माफ करना बेटी, न चाहकर भी तुम इस जहर कुंड में गिर चुकी हो या तुम्हें धकेला गया है...तुम्हारा इंटरव्यू सुना, तुम्हारे लिए मन उदास हो गया, रात नींद आना मुश्किल हो गई...तुम्हारी वेदना का कुछ अंश मेरे जैहन में घुलता चला गया...माफ करना बेटी।
हां, जब तुम्हें पूछा गया कि सुशांत से प्रेम करने का कोई पछतावा होता है--तुम तपाक से बोली, नहीं, कतई नहीं। सच कहूं उस समय लगा तुम्हारे पैर छू लूं। जो होगा, होगा, तुम्हारे प्रेम को नमन करता हूं।
निवेदन अगर अच्छा लगा हो तो शेयर करें... रिया की जिंदगी का सवाल है
इंसानियत के नाते जो कुछ किया जा सके
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Thursday, 27 August 2020

45 वीं पुण्यतिथि पर मुकेश जी का स्मरण ------ लता मंगेशकर / कुलदीप कुमार













 


आजा रे अब मेरा दिल पुकारा...!
'छोड़ गये बालम, मुझे हाय अकेला छोड़ गये' और 'किसी की मुस्कुराहटों पर हो निसार' जैसे गीतों से श्वेत-श्याम पटल पर दर्द को रंग और संवेदना को सहारा देने वालें गायक मुकेश ने हर तरह के गीत गाएं हैं। लेकिन उन्हें उनके दर्द भरे गीतों के लिए विशेषरूप से याद किया जाता है। उनकी कशिश भरी आवाज़ और दर्द भरा अंदाज़ उनको उस दौर के गायकों में एक अलग पंक्ति में खड़ा करता है।
मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता एक अभियंता थें। उनकी 10 संतान थीं और मुकेश उनकी छटवीं संतान। जब मुकेश छोटें थें तब उनकी बहन को संगीत की शिक्षा देने एक शिक्षक आतें थें। मुकेश उनको छिपकर सुनते थें। धीरे-धीरे वह संगीत की बारीकियों से परिचित हुयें और गायिकी की तरफ उनका रुझान होने लगा। हाईस्कूल पास करने के बाद वह पीडब्लूडी में काम करने लगे। 
उसी समय उनके दूर के रिश्तेदार मोतीलाल उनसे मिलें और उनसे प्रभावित होकर उन्हें मुम्बई ले आएं। यहीं से मुकेश के फ़िल्मी कैरियर की शुरुवात हुई। बतौर अभिनेता और गायक उनकी पहली फ़िल्म 1941 में आयी 'निर्दोष' थी। उनके कैरियर का पहला गीत था 'दिल ही बुझ गया होता' इसके अलावा बतौर अभिनेता उन्होंने 'माशुका, आह, अनुराग और दुल्हन' फ़िल्म में काम किया। यह सभी फिल्में असफल रही।
मुकेश के आदर्श गायक कुंदन लाल सहगल थें। जब मुकेश फिल्मी दुनिया में नहीं आएं थे तब वह अपने दोस्तों को सहगल के गाये गाने उनकी आवाज़ में कॉपी करके सुनाते थें। इसका प्रभाव उनके गायिकी पर भी पड़ा। एक वह भी दौर आया जब लोग आपस में शर्त लगाने लगे कि 'यह गीत सहगल ने गाया है या मुकेश ने।'  एक बार सहगल भी मुकेश को सुनकर अचंभे में पड़ गये थें। 
अपने 40 साल लम्बे फ़िल्मी कैरियर में मुकेश जी ने लगभग 200 फिल्मों के लिए गीत गाएं। 40 के दशक के उन्होंने अधिकतर गीत दिलीप कुमार, 50 के दशक में वह राजकपूर और 60 के दशक में राजेन्द्र कुमार और मनोज कुमार के लिए कई यादगार गीत गायें हैं। 50 का दशक उनके कैरियर और हिंदी सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण दशक है। 
50 के दशक के दौरान वो राजकपूर की आवाज़ बने और बॉलीवुड की सबसे सफल तिकड़ी शैलेन्द्र-मुकेश-शंकर जयकिशन एक साथ काम करने शुरू किये। इस तिकड़ी ने आम भारतीय जनमानस में फ़िल्मी गीतों को काफी लोकप्रियता दिलाई। 
हसरत जयपुरी के लिखे कई बेहतरीन गीतों को भी मुकेश ने आवाज़ दी। राजकपूर के साथ उन्होंने 'अंदाज़, आवारा, श्री 420, छलिया, अनाड़ी, संगम, जिस देश में गंगा बहती है, मेरा नाम जोकर, तीसरी कसम' जैसी म्यूजिकल हिट्स फिल्मों में काम किया। 1951 में आयी फ़िल्म 'मल्हार' और 1956 में आयी फ़िल्म 'अनुराग' के निर्माता मुकेश थें। यह दोनों फ़िल्में भी असफल रही थीं। 
मुकेश सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्म फेयर अवार्ड पाने वालें पहले गायक हैं। उन्होंने अपने कैरियर में 4 बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त किया। उनका अंतिम फ़िल्म फेयर उनकी मृत्यु के बाद मिला। उन्हें फ़िल्म फेयर पुरस्कार 'सब कुछ सीखा हमने (अनाड़ी 1959), सबसे बड़ा नादान वहीँ (पहचान 1970), जय बोलो बेईमान की (बेईमान 1972) और कभी कभी मेरे दिल में (कभी कभी 1976)' के लिए मिला। उन्हें साल 1974 में आयी फ़िल्म 'रजनीगंधा' के गीत 'कई बार यूँ ही देखा है' के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ। 
मुकेश 27 अगस्त 1976 को अमेरिका में एक कार्यक्रम में ' एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल' गीत गा रहें थे तभी उनको दिल का दौरा पड़ा और उनकी उसी समय मौत हो गयी। उनके मृत्यु का समाचार सुनकर राजकपूर ने कहा था 'आज मेरी आवाज़ और आत्मा दोनों चली गयी।'
महान पार्श्वगायक को पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि !
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