पति है, पत्नी है, कोई अन्तरंग दृश्य नहीं। खाली एक मनुहार है अपने प्रीतम से कि प्रियतमा को छोड़ कर न जाया जाए...न जाओ सैयां, छुड़ा के बैयाँ, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी...रो पड़ूँगी! पौने चार मिनट का एक पूरा गाना महज एक कमरे में फ़िल्माया जाए। तिस पर उसका तक़रीबन 90 फ़ीसदी हिस्सा कमरे में बिछे बस एक पलंग पर गाया जाए।
आज की फिल्मों में एक गाना ही अक्सर देखने वालों को दुनिया की सैर करा देता है। ऐसे में अगर आज भी एक कमरे के एक पलंग पर एक ही कपड़ों में फिल्माए 1962 की किसी फ़िल्म के गाने को लोग बार-बार देखना चाहते हैं, तो ज़रूर उस चेहरे में कुछ बात रही होगी, जो इतनी देर तक स्क्रीन पर दिखता है। वो चेहरा था मीना कुमारी का।
फ़िल्म थी साहिब, बीबी और गुलाम। मीना कुमारी के चेहरे के चढ़ते-उतरते भाव, उनकी आँखों की अदाकारी और माथे पर टँकी बड़ी-सी बिन्दी...सब मिल कर इस तरह बाँध लेते हैं कि गाना ख़त्म होने पर सम्मोहन-सा टूटता है। ऐसा जादू था महज़बीन बानो से पहले बेबी मीना, फिर मीना कुमारी बनी 60 से 70 के दशक की कभी न भूली जा सकने वाली इस अदाकारा में।
भारतीय सिनेमा की 'ट्रैजिडी क्वीन' कही जाने वाली मीना कुमारी के बारे में एक बात अक्सर कही जाती है। वो यह कि उनके दर्द ने उन्हें मीना कुमारी बनाया। न चाहते हुए हुए भी बचपन में ही स्कूल की बजाय फ़िल्मों के सेट का रास्ता दिखा दिया जाना, ताकि परिवार की ज़िन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए वो भी एक पहिया बन सकें। परदे पर सफलता मिलने के शुरुआती दौर में ही एक एक्सीडेंट की वजह से अपने-परायों का असल चेहरा सामने आना और एक साथ कई फ़िल्में हाथ से छिन जाना। उस हाथ से, जिसकी दो उँगलियाँ भी उन्होंने एक्सीडेंट में खो दी थीं।
आगे चल कर एक शादीशुदा फ़िल्म निर्देशक के प्यार में पड़ना, उससे शादी करना, फिर उस शादी का न चलना। जहाँ-जहाँ मोहब्बत की तलाश की, वहाँ धोखे खाना। शायद ये ही कड़वे तजुर्बात उन्हें ज़िन्दगी भर सालते रहे। नाम, शोहरत, प्रशंसकों की चाहत, दौलत सब कुछ मिल कर भी उनके मन के खालीपन को नहीं भर पाता था। इस खालीपन को उन्होंने शराब के जामों से भरने की कोशिश की, पर मिली सिर्फ़ बीमारी। यही वजह थी कि 1 अगस्त 1933 में जन्मी मीना कुमारी चालीस बरस पूरे करने से पहले ही चल बसी थीं।
'गोमती के किनारे' उनकी आख़िरी फ़िल्म थी। उससे पहले 'पाकीज़ा' आई थी, जिसे उन्होंने पति कमाल अमरोही के साथ शुरू किया था। रिश्ता टूटने पर फ़िल्म पूरी होने की आस भी छूट गई थी। फिर भी किसी तरह इसकी दोबारा शूटिंग शुरू हुई। ज़िन्दगी और करियर के अपने आख़िरी दौर में मीना अब पुरानी मीना नहीं रही थीं। 10 साल पहले अपने भावमयी चेहरे की बिनाह पर जो अदाकारा लोगों को पलकें झपकाने का मौका नहीं देती थी, उसी की आख़िरी फ़िल्म में बहुत सारे दृश्य दूर से फ़िल्माने पड़े, कैमरे को उनसे ज़्यादा आसपास के नज़ारे दिखाने पड़े, क्योंकि बीमारी ने उन्हें बदल दिया था।
बताते हैं कि मीना कुमारी के नसीब ने उनके साथ खिलवाड़ उनके पैदा होते ही शुरू कर दिया था। घर की तंग हालत के चलते उनके पिता उन्हें एक अनाथालय में छोड़ आए थे। पर फिर उनका मन न माना और ज़ोर-ज़ोर से रोती अपनी बच्ची को वापस उठा लाए थे। इस बीच उस नन्हीं-सी बच्ची को चींटों ने बेहिसाब काट लिया था, जिस वजह से उसके नाजुक शरीर पर लाल-लाल निशान हो गए थे। बाद में वे निशान तो चले गए, पर दर्द के निशान शायद हमेशा के लिए उनकी रूह पर पड़ गए थे। उनकी रूह ज़िन्दगी भर एक अजीब क़िस्म की बेचैनी से जूझती रही। शायद यही बेचैनी उन्हें वक़्त से बहुत पहले निगल भी गई।
कभी अशोक कुमार ने मीना से उनके बचपन में मज़ाक किया था कि तुम जल्दी-से बड़ी हो जाओ, फिर मेरे साथ फ़िल्मों में हीरोइन बनना। यह सुन कर वहाँ मौजूद सभी लोग हँस पड़े थे। अशोक और मीना की उम्र में इतना ज्यादा फ़र्क़ जो था। तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि आगे चल कर वो सच में अशोक कुमार के साथ तमाशा, बहू-बेगम और जवाब जैसी फ़िल्में करेंगी।
'बहू-बेगम' में एक दृश्य के लिए उनके साथी कलाकार उन्हें हमेशा याद करते आए हैं। इसमें पिता अपनी बेटी को घर से बाहर निकाल रहा होता है और बेटी उन्हें ऐसा न करने की दुहाई दे रही होती है। बताते हैं कि उस करुण दृश्य के ख़त्म होने के बाद भी मीना कुमारी देर तक फूट-फूट कर रोती रही थीं। इस क़दर वह अपने किरदार में उतर जाती थीं या यह कहा जाए कि ज़िन्दगी से मिले दर्द उनके किरदार में उतर आते थे। शायद इस दृश्य को वह असल ज़िन्दगी में पहले ही जी चुकी थीं, जब कमाल अमरोही से शादी करने का फ़ैसला करने पर उनके पिता ने उनसे सारे रिश्ते तोड़ने चाहे थे।
दर्द मीना की ज़िन्दगी में उनकी उन दो कटी उँगलियों की तरह था, जिन्हें वह अपने दुपट्टे या साड़ी के आँचल में छुपाए रहती थीं। फ़र्क़ इतना था कि लोग लाख कोशिश करने पर भी परदे पर उनकी उन उँगलियों को देख नहीं पाते थे, मगर दर्द कभी आँखों, कभी चेहरे, कभी किरदारों की अदायगी में बयाँ हो ही जाता था। लोग सच ही कहते हैं। मीना कुमारी के दर्द ने ही उन्हें मीना कुमारी बनाया होगा।