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Thursday, 27 August 2020

45 वीं पुण्यतिथि पर मुकेश जी का स्मरण ------ लता मंगेशकर / कुलदीप कुमार













 


आजा रे अब मेरा दिल पुकारा...!
'छोड़ गये बालम, मुझे हाय अकेला छोड़ गये' और 'किसी की मुस्कुराहटों पर हो निसार' जैसे गीतों से श्वेत-श्याम पटल पर दर्द को रंग और संवेदना को सहारा देने वालें गायक मुकेश ने हर तरह के गीत गाएं हैं। लेकिन उन्हें उनके दर्द भरे गीतों के लिए विशेषरूप से याद किया जाता है। उनकी कशिश भरी आवाज़ और दर्द भरा अंदाज़ उनको उस दौर के गायकों में एक अलग पंक्ति में खड़ा करता है।
मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता एक अभियंता थें। उनकी 10 संतान थीं और मुकेश उनकी छटवीं संतान। जब मुकेश छोटें थें तब उनकी बहन को संगीत की शिक्षा देने एक शिक्षक आतें थें। मुकेश उनको छिपकर सुनते थें। धीरे-धीरे वह संगीत की बारीकियों से परिचित हुयें और गायिकी की तरफ उनका रुझान होने लगा। हाईस्कूल पास करने के बाद वह पीडब्लूडी में काम करने लगे। 
उसी समय उनके दूर के रिश्तेदार मोतीलाल उनसे मिलें और उनसे प्रभावित होकर उन्हें मुम्बई ले आएं। यहीं से मुकेश के फ़िल्मी कैरियर की शुरुवात हुई। बतौर अभिनेता और गायक उनकी पहली फ़िल्म 1941 में आयी 'निर्दोष' थी। उनके कैरियर का पहला गीत था 'दिल ही बुझ गया होता' इसके अलावा बतौर अभिनेता उन्होंने 'माशुका, आह, अनुराग और दुल्हन' फ़िल्म में काम किया। यह सभी फिल्में असफल रही।
मुकेश के आदर्श गायक कुंदन लाल सहगल थें। जब मुकेश फिल्मी दुनिया में नहीं आएं थे तब वह अपने दोस्तों को सहगल के गाये गाने उनकी आवाज़ में कॉपी करके सुनाते थें। इसका प्रभाव उनके गायिकी पर भी पड़ा। एक वह भी दौर आया जब लोग आपस में शर्त लगाने लगे कि 'यह गीत सहगल ने गाया है या मुकेश ने।'  एक बार सहगल भी मुकेश को सुनकर अचंभे में पड़ गये थें। 
अपने 40 साल लम्बे फ़िल्मी कैरियर में मुकेश जी ने लगभग 200 फिल्मों के लिए गीत गाएं। 40 के दशक के उन्होंने अधिकतर गीत दिलीप कुमार, 50 के दशक में वह राजकपूर और 60 के दशक में राजेन्द्र कुमार और मनोज कुमार के लिए कई यादगार गीत गायें हैं। 50 का दशक उनके कैरियर और हिंदी सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण दशक है। 
50 के दशक के दौरान वो राजकपूर की आवाज़ बने और बॉलीवुड की सबसे सफल तिकड़ी शैलेन्द्र-मुकेश-शंकर जयकिशन एक साथ काम करने शुरू किये। इस तिकड़ी ने आम भारतीय जनमानस में फ़िल्मी गीतों को काफी लोकप्रियता दिलाई। 
हसरत जयपुरी के लिखे कई बेहतरीन गीतों को भी मुकेश ने आवाज़ दी। राजकपूर के साथ उन्होंने 'अंदाज़, आवारा, श्री 420, छलिया, अनाड़ी, संगम, जिस देश में गंगा बहती है, मेरा नाम जोकर, तीसरी कसम' जैसी म्यूजिकल हिट्स फिल्मों में काम किया। 1951 में आयी फ़िल्म 'मल्हार' और 1956 में आयी फ़िल्म 'अनुराग' के निर्माता मुकेश थें। यह दोनों फ़िल्में भी असफल रही थीं। 
मुकेश सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्म फेयर अवार्ड पाने वालें पहले गायक हैं। उन्होंने अपने कैरियर में 4 बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त किया। उनका अंतिम फ़िल्म फेयर उनकी मृत्यु के बाद मिला। उन्हें फ़िल्म फेयर पुरस्कार 'सब कुछ सीखा हमने (अनाड़ी 1959), सबसे बड़ा नादान वहीँ (पहचान 1970), जय बोलो बेईमान की (बेईमान 1972) और कभी कभी मेरे दिल में (कभी कभी 1976)' के लिए मिला। उन्हें साल 1974 में आयी फ़िल्म 'रजनीगंधा' के गीत 'कई बार यूँ ही देखा है' के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ। 
मुकेश 27 अगस्त 1976 को अमेरिका में एक कार्यक्रम में ' एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल' गीत गा रहें थे तभी उनको दिल का दौरा पड़ा और उनकी उसी समय मौत हो गयी। उनके मृत्यु का समाचार सुनकर राजकपूर ने कहा था 'आज मेरी आवाज़ और आत्मा दोनों चली गयी।'
महान पार्श्वगायक को पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि !
https://www.facebook.com/kuldeepbhu/posts/1540260902822514?__cft__[0]=AZXMRNPfChL1S5tewiVZ_P9z-xAtOOpu4YHMAfWTnfr0_iGoRI9fpwNCiEqcijWNezk3ZJWMA3E2V1uCz-CPAz1WLCQF9VbitjRAv8t0B-rVwFmY306PZX0TiKdg4ATt2CKs3tnY3rV1ZswrixWg0I7Wp8RhNYUPoyd7-G4gDNjVog&__tn__=%2CO%2CP-R

Saturday, 22 July 2017

"दर्द भरी सुरीली आवाज के सरताज", "आवाज के जादूगर" और "दर्द भरे गीतों के बेताज बादशाह" #मुकेश चन्द्र माथुर ------ रजनीश कुमार श्रीवास्तव



Rajanish Kumar Srivastava
22-07-2017  ·

"दर्द भरी सुरीली आवाज के सरताज", "आवाज के जादूगर" और "दर्द भरे गीतों के बेताज बादशाह" #मुकेश चन्द्र माथुर जो फिल्म फेयर पुरस्कार पाने वाले पहले पुरूष पार्श्व गायक बने थे, के 94 वें जन्मदिन पर उनका शत शत नमन।
हिन्दी सिनेमा की पार्श्व गायकी के सुपर स्टार मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 ई० को एक सम्पन्न कायस्थ परिवार में पिता जोरावर चन्द्र माथुर और माता चाँद रानी के घर दिल्ली में हुआ था।आवाज के इस जादूगर ने 1940 ई० से 27 अगस्त 1976 ई० तक अपने देहावसान के समय तक हिन्दी सिनेमा के 200 से ज्यादा फिल्मों में 1300 से ज्यादा बेमिसाल गीत गाए और अपने सदाबहार गीतों की वजह से लगातार तीन दशक तक श्रोताओं के दिल पर राज किया।भारत के अलावा रूस और अमेरिका में भी इनके करोड़ों चाहने वाले थे।रूस में जहाँ उनका गीत,"मेरा जूता है जापानी" लोगों के जुबान पर लम्बे समय तक चढ़ा रहा तो अमेरिका के डेट्रॉयट(मिशिगन) के एक समारोह में अपना प्रसिद्ध गीत "इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल,जग में रह जाएँगे प्यारे तेरे बोल " गाते हुए हृदयघात हो जाने से 27 अगस्त 1976 ई० को वे सदा के लिए अमर हो गए और रह गये तो सिर्फ उनके सुरीले बोल।
हिन्दी सिनेमा गायकी में उनका प्रवेश उनके दूर के रिश्तेदार प्रसिद्ध अभिनेता मोती लाल जी ने कराया था।इनके अविस्मर्णीय सहयोग से दिल्ली में पी डब्लू डी में असिस्टेन्ट सर्वेयर की नौकरी करने वाले मुकेश ने 1941 ई० में फिल्म "निर्दोष" से अपना कैरियर शुरू कर 1945 ई० में फिल्म "पहली नज़र" के प्रसिद्ध गीत "दिल जलता है तो जलने दे,आँसू ना बहा फरियाद ना कर" के द्वारा अपना जलवा पूरे फिल्मी जगत में फैला दिया और फिर इस उभरते सितारे का यादगार सफर तीन दशकों तक तीन सर्वकालिक महान अभिनेताओं #दिलीप कुमार,#राजकपूर और #मनोज कुमार की आवाज बनकर प्रसिद्धि के नित नए प्रतिमान गढ़ने लगा।तात्कालिक समय के पार्श्व गायकी के दिग्गज और अपने आदर्श कुन्दन लाल सहगल तथा पंकज मलिक की छत्रछाया से बाहर निकल कर हिन्दी सिनेमा की पार्श्व गायकी के स्वर्ण युग में मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के अद्भुत गायकी के विशिष्ट दौर में अपनी अनमोल छाँप छोड़कर ट्रेजड़ी किंग दिलीप कुमार, हिन्दी सिनेमा के शो मैन राजकपूर और बेमिसाल सुपर स्टार मनोज कुमार की लगातार तीन दशकों तक आवाज बने रहना एक बेमिसाल कारनामें से कम नहीं था।तभी तो मुकेश के देहावसान पर शोक में डूबे शो मैन राजकपूर ने सार्वजनिक उदघोष करते हुए कहा था कि,"मैने अपनी आवाज सदा के लिए खो दी है।" राजकपूर अक्सर कहा करते थे कि," मैं तो बस शरीर हूँ मेरी आत्मा तो मुकेश है।" 
संगीतकार नौसाद,अनिल विश्वास और शंकर जयकिशन के साथ मुकेश की अदभुत गायकी ने एक से बढ़कर एक अनमोल गीत भारतीय सिनेमा को दिए।मुकेश को अपनी लाजवाब गायकी के कारण 1959, 1970, 1972 और 1976 ई० में चार बार फिल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ तो 1974 ई० में फिल्म रजनीगंधा के गीत "कई बार यूँ भी देखा है" के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
रोशन, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीप्यारे के साथ भी इनका काम उल्लेखनीय...3 फिल्मफेयर बेस्ट सिंगर में संगीत एस जे डुओ का व 1 में खय्याम का रहा है...
"किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार" से लेकर "सावन का महीना पवन करे शोर" और फिर "दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई" से लेकर "सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है" के सदाबहार गीतों को अपनी बेमिसाल गायकी से अमर कर देने वाले मुकेश केवल पल दो पल के शायर ही नहीं बल्कि हर पल के नायाब फनकार थे।इस सर्वकालिक महान पार्श्व गायक का उनके जन्मदिन पर शत शत नमन।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1891866267804645&set=a.1488982591426350.1073741827.100009438718314&type=3&permPage=1


Saturday, 27 August 2016

पुण्यतिथि/ महान पार्श्वगायक मुकेश ----- कुलदीप कुमार 'निष्पक्ष'



*** ***
कुलदीप कुमार 'निष्पक्ष'
फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है...!
पुण्यतिथि/ महान पार्श्वगायक मुकेश
'छोड़ गए बालम, मुझे हाय अकेला छोड़ गए' और 'किसी की मुस्कुराहटों पर हो निसार' जैसे गीतों से श्वेत-श्याम पटल पर दर्द को रंग और संवेदना को सहारा देने वालें गायक मुकेश जी ने हर तरह के गीत गाएं हैं। लेकिन उन्हें उनके दर्द भरे गीतों के लिए विशेषरूप से याद किया जाता है। उनकी कशिश भरी आवाज़ और दर्द भरे अंदाज़ मन को एक अलग शांति देतें हैं। मुकेश जी का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता एक अभियंता थें। उनकी 10 संतान थीं और मुकेश उनकी छटवीं संतान। जब मुकेश जी छोटें थें तब उनकी बहन को संगीत की शिक्षा देने एक शिक्षक आतें थें। मुकेश जी उनको छिपकर सुनते थे।  धीरे-धीरे वह संगीत की बारीकियों से परिचित हुयें और गायिकी की तरफ उनका रुझान होने लगा। हाईस्कूल पास करने के बाद वह पीडब्लूडी में काम करने लगे। उसी समय उनके दूर के रिश्तेदार मोतीलाल उनसे मिले और उनसे प्रभावित होकर उन्हें मुम्बई ले आए। यहीं से मुकेश जी के फ़िल्मी कैरियर की शुरुवात हुई। बतौर अभिनेता और गायक उनकी पहली फ़िल्म 1941 में आयी 'निर्दोष' थी। उनके कैरियर का पहला गीत था 'दिल ही बुझ गया होता' इसके अलावा बतौर अभिनेता उन्होंने 'माशुका, आह, अनुराग और दुल्हन' फ़िल्म में काम किया। यह सभी फिल्में असफल रही।
मुकेश जी के आदर्श गायक सहगल जी थें। जब मुकेश जी फिल्मी दुनिया में नहीं आए थे तब वह अपने दोस्तों को सहगल जी के गाये गाने उनकी आवाज़ में कॉपी करके सुनाते थे। इसका प्रभाव उनके गायिकी पर भी पड़ा। एक वह भी दौर आया जब लोग आपस में शर्त लगाने लगे कि 'यह गीत सहगल ने गाया है या मुकेश ने।' एक बार सहगल जी भी मुकेश जी को सुनकर अचंभे में पड़ गए थे। अपने 40 साल लम्बे फ़िल्मी कैरियर में मुकेश जी ने लगभग 200 फिल्मों के लिए गीत गाए। 40 के दशक के उन्होंने अधिकतर गीत दिलीप कुमार, 50 के दशक में वह राजकपूर और 60 के दशक में राजेन्द्र कुमार मनोज कुमार के लिए कई यादगार गीत गाए हैं। 50 का दशक उनके कैरियर और हिंदी सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण दशक है। इस दौरान वो राजकपूर जी की आवाज़ बने और बॉलीवुड की सबसे सफल तिकड़ी शैलेन्द्र-मुकेश-शंकर जयकिशन एक साथ काम करने शुरू किये। इस तिकड़ी ने आम भारतीय जनमानस में फ़िल्मी गीतों को काफी लोकप्रियता दिलाई। हसरत जयपुरी साहब के लिखे कई बेहतरीन गीतों को भी मुकेश जी ने आवाज़ दी। राजकपूर जी के साथ उन्होंने 'अंदाज़, आवारा, श्री 420, छलिया, अनाड़ी, संगम, जिस देश में गंगा बहती है, मेरा नाम जोकर, तीसरी कसम' जैसी म्यूजिकल हिट्स फिल्मों में काम किया। 1951 में आयी फ़िल्म 'मल्हार' और 1956 में आयी फ़िल्म 'अनुराग' के निर्माता मुकेश जी थे। यह दोनों फ़िल्में भी असफल रही थीं। मुकेश जी सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्म फेयर अवार्ड पाने वाले पहले गायक हैं। उन्होंने अपने कैरियर में 4 बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त किया। उनका अंतिम फ़िल्म फेयर उनकी मृत्यु के बाद मिला। उन्हें फ़िल्म फेयर पुरस्कार 'सब कुछ सीखा हमने (अनाड़ी 1959), सबसे बड़ा नादान वहीँ (पहचान 1970), जय बोलो बेईमान की (बेईमान 1972) और कभी कभी मेरे दिल में (कभी कभी 1976)' के लिए मिला। उन्हें साल 1974 में आयी फ़िल्म 'रजनीगंधा' के गीत 'कई बार यूँ ही देखा है' के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ। मुकेश जी 27 अगस्त 1976 को अमेरिका में एक कार्यक्रम में ' एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल' गीत गा रहे थे तभी उनको दिल का दौरा पड़ा और उनकी उसी समय मौत हो गयी। उनके मृत्यु का समाचार सुनकर राजकपूर ने कहा था 'आज मेरी आवाज़ और आत्मा दोनों चली गयी'
महान पार्श्वगायक को उनके एक गीत के साथ श्रद्धांजलि !
'दीवानों से ये मत पूछो, दीवानों पे क्या गुज़री है 
हाँ उनके दिलों से ये पूछो, अरमानों पे क्या गुज़री है
औरों को पिलाते रहते हैं और खुद प्यासे रह जाते हैं 
ये पीनेवाले क्या जाने, पैमानों पे क्या गुज़री है
मालिक ने बनाया इंसां को, इंसान मोहब्बत कर बैठा 
वो उपर बैठा क्या जाने, इंसानों पे क्या गुज़री है'
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=598222747026339&set=a.102967489885203.3918.100005158561797&type=3

Monday, 30 November 2015

सुधा मल्होत्रा (1936) --- Shashank Mukut Shekhar




 



#आओयादकरें :

सुधा मल्होत्रा (1936 - present ) :

सुधा मल्होत्रा फ़िल्म संगीत के मैदान की वो खिलाड़ी हैं जिन्होने बहुत ज़्यादा लम्बी पारी तो नहीं खेली, पर अपनी छोटी सी पारी में ही कुछ ऐसे सदाबहार गानें हमें दे दिये हैं ,जिन्हे हम आज भी याद करते हैं, गुनगुनाते हैं, हमारे सुख दुख के साथी बने हुए हैं। यह हमारी बदकिस्मती ही है कि अत्यंत प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी सुधा जी चर्चा में कम ही रही ,प्रसिद्धी इन्हे कम ही मिली, और आज की पीढ़ी के लिए तो इनकी यादें दिन ब दिन धुंधली होती जा रही हैं। पर अपने कुछ चुनिंदा गीतों से अपनी अमिट छाप छोड़ जाने वाली सुधा मल्होत्रा सुधी श्रोताओं के दिलों पर हमेशा राज करती रहेंगी। । सुधा मल्होत्रा ने 'नरसी भगत' में "दर्शन दो घनश्याम", 'दीदी' में "तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको", 'काला पानी' में "ना मैं धन चाहूँ", 'बरसात की रात' में "ना तो कारवाँ की तलाश है" और 'प्रेम रोग' में "ये प्यार था कि कुछ और था" जैसे हिट गीत गाए हैं। लेकिन ज़्यादातर उन्हे कम बजट वाली फ़िल्मों में ही गाने के अवसर मिलते रहे। 'अब दिल्ली दूर नहीं' फ़िल्म में बच्चे के किरदार का प्लेबैक करने के बाद तो जैसे वो टाइप कास्ट से हो गईं और बच्चों वाले कई गीत उनसे गवाए गए।
सुधा मल्होत्रा का जन्म नई दिल्ली में 30 नवंबर 1936 में दिल्ली में हुआ था। उनका बचपन कुल तीन शहरों में बीता - लाहौर, भोपाल और फ़िरोज़पुर। आगरा विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और भारतीय शास्त्रीय संगीत में पारदर्शी बनीं उस्ताद अब्दुल रहमान ख़ान और पंडित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले जैसे गुरुओं से तालीम हासिल कर। उनकी यह लगन और संगीत के प्रति उनका प्यार उनके गीतों और उनकी गायकी में साफ़ झलकता है। जहाँ तक करियर का सवाल है, सुधा जी ने 6 साल की उम्र से गाना शुरु किया। उनकी प्रतिभा को पूरी दुनिया के सामने लाने का पहला श्रेय जाता है उस ज़माने के मशहूर संगीतकार मास्टर ग़ुलाम हैदर को, जिन्होने सुधा जी को फ़िरोज़पुर में रेड क्रॊस के एक जलसे में गाते हुए सुना था। सुधा जी की शारीरिक सुंदरता और मधुर आवाज़ की वजह से वो ऒल इंडिया रेडियो लाहौर में एक सफ़ल बाल कलाकार बन गईं। और सही मायने में यहीं से शुरु हुआ उनका संगीत सफ़र। उसके बाद उनका आगमन हुआ फ़िल्म संगीत में। इस क्षेत्र में उन्हे पहला ब्रेक दिया अनिल बिस्वास ने। साल था १९५० और फ़िल्म थी 'आरज़ू'। जी हाँ, इसी फ़िल्म में अनिल दा ने तलत महमूद को भी पहला ब्रेक दिया था। इस फ़िल्म में सुधा जी से एक गीत गवाया गया जिसे ख़ूब पसंद किया गया। गाना था "मिला गए नैन"। और दोस्तों, यहीं से शुरुआत हुई सुधा जी के फ़िल्मी गायन की।
सुधा जी उन दुर्लभ पार्श्वगायिकाओं में से हैं ,जिन्होंने अपने खुद का संगीतबद्ध किया हुआ गीत गाया है। सन 1956 की फिल्म "दीदी ' का गीत " तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको" को सुधा जी ने न केवल संगीतबद्ध किया ,बल्कि मुकेश के साथ मिलकर गाया भी। कहा जाता है कि जिस दिन यह गीत रिकॉर्ड होना था ,संगीतकार एन दत्ता बीमार पड़ गए। यह सुनकर सुधा जी ने कहा कि वो खुद ये गाना संगीतबद्ध करेंगी और किया भी।

सुधा जी का नाम प्रसिद्ध गीतकार साहिर लुधयानवी के साथ जोड़ा गया और कहा जाता है की साहिर जी उनसे प्रेम करते थे। परन्तु यह प्रेम अधूरा रह गया।
79 वर्षीय सुधाजी इन दिनों मुंबई में अपने परिवार के साथ रह रही है। 4 वर्ष पूर्व उनके पति गिरधर मोटवानी का निधन हो चुका है। 2013 में भारत सरकार ने उन्हें हिंदी फिल्म संगीत में महत्वपूर्ण योगदान के लिए पदमश्री से सम्मानित किया।
"धन्यवाद "
 —साभार :
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=623165211120298&set=a.619615448141941.1073741827.100002804754852&type=1

Wednesday, 22 July 2015

मुकेश - आत्मा की आवाज़ --- वीर विनोद छाबड़ा / मुकुटधारी अग्रवाल

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मुकेश - आत्मा की आवाज़।
-वीर विनोद छाबड़ा
आज आत्मा की आवाज़ दिवंगत मुकेश माथुर का जन्मदिन है।
बेमिसाल एक्टर मोतीलाल ने मुकेश को एक महफ़िल में सुना। मोतीलाल उनके दूर के रिश्तेदार थे। वो उन्हें बंबई ले आये। गीत-संगीत में प्रवीण कराया। यह चालीस के दशक की शुरुआत थी। मुकेश का फ़िल्मी सफ़र 'निर्दोष'(१९४१) से बतौर हीरो शुरू हुआ।
उन दिनों कुंदन लाल सहगल की सेहत गिर रही थी। गीत-संगीत के क्षेत्र में लाख टके का सवाल था -सहगल के बाद कौन?
ऐसे फ़िक्रमंद माहौल में संगीतकार अनिल विश्वास मुकेश को ले आये- बोले यह है हीरा। सहगल का विकल्प।
मुकेश ने पूरे विश्वास से और दिल की गहराईयों से गाया - दिल जलता है तो जलने दो...(पहली नज़र-१९४५). इत्तिफ़ाक़ से मुकेश को दिल्ली से लाये मोतीलाल पर फिल्माया गया ये गाना।
जिसने भी मुकेश को सुना उसने कहा - सहगल जैसा दर्द और दिल की गहराइयों से गाया है। लेकिन असली परीक्षा बाकी थी। यह गाना सहगल ने सुना तो हैरान होकर बोले -मैंने कब गाया यह गाना?
लेकिन मुकेश की नज़र में सहगल तो सहगल ही थे। वो नहीं चाहते थे कि दुनिया उनको सहगल की नक़ल या क्लोन के रूप में याद करे।
उन्होंने रियाज पे रियाज किये। दिन रात एक कर दिया। ताकि सहगल से अलग एक मुक़ाम बना सकें।
इस बीच सहगल साब दिवंगत हो गए। मगर मुकेश ने दावा नहीं किया कि सहगल के जाने से खाली 'बड़े शून्य' को वो भर देंगे।
उन्होंने सहगल से अलग अपनी पहचान बनाई। इसमें उनको तराशा नौशाद ने। 'मेला' और 'अंदाज़' में मौका दिया। लेकिन फिर भी बरसों तक खास-ओ-आम मुकेश पर सहगल की शैडो देखता रहा। दरअसल सहगल जैसा दर्द सिर्फ़ मुकेश के स्वर में ही झलकता था।
मेला और अंदाज़ में में दिलीप कुमार की आवाज़ बने मुकेश। दिलीप को मुकेश इतना भाये कि वो चाहने लगे कि वो उनकी स्थाई आवाज़ बन जायें। लेकिन इस बीच राजकपूर ने मुकेश को अपनी आवाज़ बना लिया।
मुकेश ने एक बार पैर जमाये तो पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उनके लिए सबसे बड़ा दिन वो था जब रजनीगंधा के लिए उन्हें बेस्ट सिंगर का नेशनल अवार्ड मिला - कई बार यूं ही देखा है.
उन्हें चार बार बेस्ट सिंगर का फिल्मफेयर अवार्ड मिला - सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी(अनाड़ी)…सबसे बड़ा नादान वही है जो समझे नादान मुझे(पहचान)…न इज़्ज़त की चिंता न फ़िक्र कोई ईमान की, जय बोलो बेईमान की(बेईमान)…कभी-कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है(कभी-कभी).
होटों पे सच्चाई रहती है.…दोस्त दोस्त न रहा.…सावन का महीना पवन करे सोर....बस यही अपराध हर बार करता हूं आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं.…इक प्यार का नगमा है.…मैं न भूलूंगा इन कसमों इन वादों को....इक दिन बिक जायेगा तू माटी के मोल.…मैं पल दो पल का शायर हूं.…चंचल शीतल निर्मल कोमल…यह वो गाने हैं जिनके लिये फिल्मफेयर ने मुकेश को बेस्ट सिंगर की लिए नॉमिनेट किया।
मुकेश जी ने सैकड़ों यादगार गीत गाये हैं। मुझे तो हर गाना अवार्ड योग्य लगता है।
२७ अगस्त १९७६ को मुकेश जी ह्रदय गति रुकने से देहांत हो गया। वो सिर्फ़ ५३ साल के थे। उस दिन वो एक कार्यक्रम के सिलसिले में अमेरिका में थे। उनकी मृत्यु पर राजकपूर ने कहा था - मेरी तो आवाज़ ही चली गयी।
मुकेशजी ने आख़िरी गाना राजकपूर की सत्यम शिवम सुंदरम के लिए रिकॉर्ड कराया था - चंचल शीतल निर्मल कोमल…
मुकेश चंद माथुर का जन्म २२ जुलाई १९२३ को दिल्ली में हुआ था।
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२२-०७-२०१५


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https://www.facebook.com/virvinod.chhabra/posts/1658283284405294 

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1965 मे मैं अपनी पत्नी सुशीला जी और तीन वर्षीया पुत्री अरुणा के साथ अपने भाई साहिब चक्रधारी अग्रवालजी के नई दिल्ली के एच-4 ,हौज़ खास मे रहता था ।उन दिनो मैं कानपुर से प्रकाशित होनेवाले दैनिक जागरण का दिल्ली प्रतिनिधि भी था ।भाई साहब जिस किराये के मकान मे रहते थे ।उसके ऊपरी तल्ले मे माथुर साहिब कर प्ररिवार रहता था ।वे सफदरजंग हवाई अड्डे मे किसी अच्छे पोस्ट पर थे ।उनकी पत्नी और बच्चो के साथ हम लोगो के बहुत मधुर और पारिवारिक संबंध हो गए थे ,मुझे याद है -रविवार का दिन था ।बच्चे घूमने गए थे ,हम घर मे थे ।तभी उपर वाले माथुर साहिब के बच्चे आए और बोले अंकल ,तुरंत उपर चलिये ,मम्मी ने बुलाया है ।मुझे एकाएक उपर तल्ले पर बुलाने की बात समझ मे नहीं आई ।फिर भी अनमना हो कर चला गया। जब ड्राइंग रूम मे पहुंचा तो देखता क्या हूँ ।फिल्म जगत के प्रसिद्ध पार्श्वगायक मुकेशजी बैठे चाय पी रहे हैं ।मुझे देखते ही माथुर साहिब की पत्नी ने कहा आइये भैया ,आपकी भेंट मामाँ जी से कराती हूँ ।मुकेशजी उनके मामा थे ।मुकेशजी बड़े स्नेह से मिले ,अपने पास बैठा लिया ।बच्चो ने उन्हे कोई गीत सुनने को कहा वे बोले -बाजा होता तो ठीक होता ,फिर भी उन्होने गुनगुना कर कुछ बोल सुनाये ।माथुरजी की पत्नी की माताजी के वे चचेरे भाई थे ,जब भी वे दिल्ली आते समय निकाल हौज़ खास माथुरजी से मिलने आते ।मुझे बहुत ही सरल और ऊंचे दर्जे के इंसान लगे ।कोई अहंकार नहीं ।उनका मिलना एक यादगार पल बन कर रह गया है । .
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https://www.facebook.com/mukutdhari.agrawal/posts/859728094109661