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Saturday, 14 January 2017

कैफ़ी आज़मी अपने आप में एक व्यक्ति न होकर एक संस्था, एक युग थे ------ ध्रुव गुप्त




या दिल की सुनो दुनिया वालों या मुझको अभी चुप रहने दो !
बीसवी सदी के महानतम शायरों में एक मरहूम कैफ़ी आज़मी अपने आप में एक व्यक्ति न होकर एक संस्था, एक युग थे जिनकी रचनाओं में हमारा समय और समाज अपनी तमाम खूबसूरती और कुरूपताओं के साथ बोलता नज़र आता है। एक तरफ उन्होंने आम आदमी के दुख-दर्द को शब्दों में जीवंत कर अपने हक के लिए लड़ने का हौसला दिया तो दूसरी तरफ सौंदर्य और प्रेम की नाज़ुक संवेदनाओं को इस बारीकी से बुना कि पढ़ने-सुनने वालों के मुंह से बरबस आह निकल जाय। कैफ़ी साहब साहिर लुधियानवी और शकील बदायूनी की तरह उन गिने-चुने शायरों में थे जिन्हें अदब के साथ सिनेमा में भी अपार सफलता और शोहरत मिली। 1951 में फिल्म 'बुज़दिल' के लिए उन्होंने पहला गीत लिखा- 'रोते-रोते गुज़र गई रात'। उसके बाद जो हुआ वह इतिहास है। उनके लिखे सैकड़ों फ़िल्मी गीत आज हमारी अनमोल संगीत धरोहर का हिस्सा हैं। गीतकार के रूप में उनकी प्रमुख फ़िल्में हैं - शमा, गरम हवा, शोला और शबनम, कागज़ के फूल, आख़िरी ख़त, हकीकत, रज़िया सुल्तान, नौनिहाल, सात हिंदुस्तानी, अनुपमा, कोहरा, हिंदुस्तान की क़सम, पाक़ीज़ा, हीर रांझा, उसकी कहानी, सत्यकाम, हंसते ज़ख्म, अनोखी रात, बावर्ची, अर्थ, फिर तेरी कहानी याद आई। इतनी सफलता के बावज़ूद हिंदी फ़िल्मी गीतों के बारे में उनका अनुभव यह था - 'फ़िल्मों में गाने लिखना एक अजीब ही चीज थी। आम तौर पर पहले ट्यून बनती थी, फिर उसमें शब्द पिरोए जाते थे। ठीक ऐसे कि पहले आपने क़ब्र खोदी, फिर उसमें मुर्दे को फिट करने की कोशिश की। कभी मुर्दे का पैर बाहर रह जाता था, कभी हाथ।मेरे बारे में सिनेमा वालों को जब यकीन हो गया कि मैं मुर्दे ठीक-ठाक गाड़ लेता हूं, तो मुझे काम मिलने लगा।' उन्होंने फिल्म हीर रांझा, गरम हवा और मंथन के लिए संवाद भी लिखे थे। देश के इस विलक्षण शायर और गीतकार के यौमे पैदाईश (14 जनवरी) पर खिराज़-ए-अक़ीदत, उनकी एक ग़ज़ल के साथ !
मैं ढूंढता हूं जिसे वह ज़हां नहीं मिलता
नई ज़मीन, नया आसमां नहीं मिलता
वो तेग़ मिल गई जिससे हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशां नहीं मिलता
वो मेरा गांव है, वो मेरे गांव के चूल्हे
कि जिनमें शोले तो शोले धुआं नहीं मिलता
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूं
यहां तो कोई मेरा हमज़बां नहीं मिलता
खड़ा हूं कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे-सा कुछ भी यहां नहीं मिलता