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Thursday, 31 March 2016

मीना कुमारी की पुण्यतिथि (31 मार्च) पर खिराज़े अकीदत ------ ध्रुव गुप्त




जो कही गई न मुझसे वो ज़माना कह रहा है !
'ट्रेजेडी क्वीन' के नाम से मशहूर हिंदी और उर्दू सिनेमा की भावप्रवण अभिनेत्री और उर्दू की संवेदनशील शायरा मीना कुमारी उर्फ़ माहज़बीं बानो रूपहले परदे पर अपने लाज़वाब अभिनय के अलावा अपनी बिखरी और बेतरतीब निज़ी ज़िन्दगी के लिए भी जानी जाती है। भारतीय स्त्री के जीवन के दर्द को रूपहले परदे पर साकार करते-करते कब वह ख़ुद दर्द की मुकम्मल तस्वीर बन गई, इसका पता शायद उन्हें भी न चला होगा। भूमिकाओं में विविधता के अभाव के बावज़ूद उनकी खास अभिनय-शैली और मोहक आवाज़ का जादू भारतीय दर्शकों पर हमेशा छाया रहा।1939 में बाल कलाकार के रूप में उन्होंने बेबी मीना के नाम से अपना फिल्मी सफ़र शुरू किया। नायिका के रूप में 1949 की 'वीर घटोत्कच' उनकी पहली फिल्म थी, लेकिन उन्हें मक़बूलियत हासिल हुई विमल राय की फिल्म 'परिणीता से। 33 साल लम्बे फिल्म कैरियर में उनकी कुछ कालजयी फ़िल्में हैं - परिणीता, दो बीघा ज़मीन, फुटपाथ, एक ही रास्ता, शारदा, बैजू बावरा, दिल अपना और प्रीत पराई, कोहिनूर, आज़ाद, चार दिल चार राहें, प्यार का सागर, बहू बेगम, मैं चुप रहूंगी, दिल एक मंदिर, आरती, चित्रलेखा, साहब बीवी गुलाम, सांझ और सवेरा, मंझली दीदी, भींगी रात, नूरज़हां, काजल, फूल और पत्थर, पाकीज़ा, मेरे अपने और गोमती के किनारे। मीना कुमारी मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही के साथ अपने असफल दाम्पत्य और तब के संघर्षशील अभिनेता धर्मेन्द्र के साथ अपने अधूरे प्रेम संबंध की वज़ह से भी हमेशा चर्चा में रहीं। उनकी बेपनाह भावुकता ने उन्हें नशे की दुनिया में भटकाया, लेकिन उनकी शायरी ने उन्हें मुक्ति भी दी। उन्होंने अपनी पचीस निजी डायरियों में अपनी संवेदनाओं को शब्द दिए थे जिन्हें उनकी वसीयत के मुताबिक़ फिल्मकार और शायर गुलज़ार ने संकलित और प्रकाशित कराया। मीना कुमारी की पुण्यतिथि (31 मार्च) पर खिराज़े अकीदत उन्ही की एक ग़ज़ल के साथ !
आबला-पा कोई इस दश्त में आया होगा 
वरना आंधी में दिया किसने जलाया होगा
ज़र्रे ज़र्रे पे जड़े होंगे कुंवारे सजदे 
एक-एक बुत को खुदा उसने बनाया होगा
प्यास जलते हुए कांटों की बुझाई होगी 
रिसते पानी को हथेली पे सजाया होगा
मिल गया होगा अगर कोई सुनहरी पत्थर 
अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा
खून के छींटे कहीं पोछ न लें राहों से 
किसने वीराने को गुलज़ार बनाया होगा
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Saturday, 1 August 2015

"ट्रेजेडी क्वीन":मीना कुमारी ---संजोग वाल्टर

1अगस्त जन्मदिन पर :



फिल्म साहिब बीबी और गुलाम में छोटी बहु (मीना कुमारी ) अकेलेपन से तंग आकर शराब का सहारा लेती है ऐसा ही हुआ असलियत में उनकी ज़िन्दगी जब उन्हें सहारे की ज़रूरत थी तब उनको सहारा नहीं मिला,मीना कुमारी (1अगस्त,1932-31 मार्च,1972) बेमिसाल अदाकारा,जिन्हें "ट्रेजेडी क्वीन" का खिताब मिला,मीना कुमारी का असली नाम महज़बी बानो था और ये बंबई में पैदा हुई थीं । उनके वालिद अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के मझे हुये कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीतकार का भी काम किया था। उनकी वालिदा प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो),भी मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी जिनका ताल्लुक टैगोर परिवार से था। महज़बी ने पहली बार किसी फिल्म के लिये छह साल की उम्र में काम किया था। उनका नाम मीना कुमारी विजय भट्ट की खासी लोकप्रिय फिल्म बैजू बावरा से पड़ा। मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थे। मीना कुमारी के आने के साथ भारतीय सिनेमा में नयी अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरु हुआ था जिसमें नरगिस , निम्मी, सुचित्रा सेन और नूतन शामिल थीं। 1953 तक मीना कुमारी की तीन सफल फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : दायरा, दो बीघा ज़मीन और परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिये नया युग शुरु हुआ। परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूकि इस फिल्म में भारतीय नारियों के आम जिदगी की तकलीफ़ों का चित्रण करने की कोशिश की गयी थी। लेकिन इसी फिल्म की वजह से उनकी छवि सिर्फ़ दुखांत भूमिकाएँ करने वाले की होकर सीमित हो गयी। लेकिन ऐसा होने के बावज़ूद उनके अभिनय की खास शैली और मोहक आवाज़ का जादू भारतीय दर्शकों पर हमेशा छाया रहा। मीना कुमारी की शादी मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही के साथ हुई जिन्होंने मीना कुमारी की कुछ मशहूर फिल्मों का निर्देशन किया था। लेकिन स्वछंद प्रवृति की मीना अमरोही से 1964 में अलग हो गयीं। उनकी फ़िल्म पाक़ीज़ा को और उसमें उनके रोल को आज भी सराहा जाता है । शर्मीली मीना के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कवियित्री भी थीं लेकिन कभी भी उन्होंने अपनी कवितायें छपवाने की कोशिश नहीं की। उनकी लिखी कुछ उर्दू की कवितायें नाज़ के नाम से बाद में छपी। मीना कुमारी उम्र भर एक पहेली बनी रही महज चालीस साल की उम्र में वो मौत के मुह में चली गयी इसके लिए मीना के इर्दगिर्द कुछ रिश्तेदार,कुछ चाहने वाले और कुछ उनकी दौलत पर नजर गढ़ाए वे लोग हैं, जिन्हें ट्रेजेडी क्वीन की अकाल मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। मीना कुमारी को एक अभिनेत्री के रूप में, एक पत्नी के रूप में,एक प्यासी प्रेमिका के रूप में और एक भटकती-गुमराह होती हर कदम पर धोखा खाती स्त्री के रूप में देखना उनकी जिंदगी का सही पैमाना होगा। मीना कुमारी की नानी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के छोटे भाई की बेटी थी, जो जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही प्यारेलाल नामक युवक के साथ भाग गई थीं। विधवा हो जाने पर उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया। दो बेटे और एक बेटी को लेकर बम्बई आ गईं। नाचने-गाने की कला में माहिर थीं इसलिए बेटी प्रभावती के साथ पारसी थिएटर में भरती हो गईं। प्रभावती की मुलाकात थियेटर के हारमोनियम वादक मास्टर अली बख्श से हुई। उन्होंने प्रभावती से निकाह कर उसे इकबाल बानो बना दिया। अली बख्श से इकबाल को तीन संतान हुईं। खुर्शीद, महज़बी (मीना कुमारी) और तीसरी महलका (माधुरी)। अली बख्श रंगीन मिजाज के व्यक्ति थे। घर की नौकरानी से नजरें चार हुईं और खुले आम रोमांस चलने लगा। परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। महजबीं को मात्र चार साल की उम्र में फिल्मकार विजय भट्ट के सामने खड़ा कर दिया गया। इस तरह बीस फिल्में महजबीं (मीना) ने बाल कलाकार के रूप में न चाहते हुए भी की। महज़बीं को अपने पिता से नफरत सी हो गई और पुरुष का स्वार्थी चेहरा उसके जेहन में दर्ज हो गया। फिल्म बैजू बावरा (1952) से मीना कुमारी के नाम से मशहूर महजबीं ने अपने वालिद की इमेज को दरकिनार करते हुए उनसे हमदर्दी जताने वाले कमाल अमरोही की शख्सियत में अपना बेहतर आने वाला कल दिखाई दिया,वे उनके नजदीक होती चली गईं। नतीजा यह रहा कि दोनों ने निकाह कर लिया। लेकिन यहाँ उसे कमाल साहब की दूसरी बीवी का दर्जा मिला। उनके निकाह के इकलौते गवाह थे जीनत अमान के अब्बा अमान साहब। कमाल अमरोही और मीना कुमारी की शादीशुदा जिंदगी करीब दस साल तक एक सपने की तरह चली। मगर औलाद न होने की वजह से उनके ताल्लुतक में दरार आने लगी। लिहाज़ा दोनों अलग हो गये कहते है उस रात मीना कुमारी ने जब कमाल अमरोही का घर छोड़ा था, किसी ने भी उनकी मदद नहीं की भारत भूषण,प्रदीप कुमार,राज कुमार किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया,पैदा होते ही वालिद अली बख्श ने रुपये के तंगी और पहले से दो बेटियों के बोझ से घबरा कर इन्हे एक मुस्लिम अनाथ आश्रम में छोड़ दिया था, मीना कुमारी की माँ के काफी रोने -धोने पर वे इन्हे वापस ले आए। परिवार हो या शादीशुदा जिंदगी मीना कुमारी के हिस्से में सिर्फ तन्हाईयाँ हीं आई,फिल्म फूल और पत्थर (1966) के हीरो ही-मैन धर्मेन्द्र से मीना की नजदीकियाँ, बढ़ने लगीं। इस दौर तक मीना कामयाब,मशहूर व बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट हीरोइन के रूप में जानी जाने लगी थी,धर्मेन्द्र का करियर डाँवाडोल चल रहा था। उन्हें मीना का मजबूत पल्लू थामने में अपनी सफलता महसूस होने लगी। गरम धरम ने मीना को सूनी-सपाट अंधेरी जिंदगी को एक ही-मैन की रोशन से भर दिया। कई तरह के गॉसिप और गरमा-गरम खबरों से फिल्मी पत्रिकाओं के पन्ने रंगे जाने लगे। इसका असर मीना-कमाल के रिश्ते पर भी हुआ। मीना कुमारी का नाम कई लोगों से जोड़ा गया। बॉलीवुड के जानकारों के अनुसार मीना-धर्मेन्द्र के रोमांस की खबरें हवा में बम्बई से दिल्ली तक के आकाश में उड़ने लगी थीं। जब दिल्ली में वे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन से एक कार्यक्रम में मिलीं तो राष्ट्रपति ने पहला सवाल पूछ लिया कि तुम्हारा बॉयफ्रेंड धर्मेन्द्र कैसा है? फिल्म बैजू बावरा के दौरान भारत भूषण भी अपने प्यार का इजहार मीना कुमारी से कर चुके थे। जॉनी (राजकुमार) को मीना कुमार से इतना इश्क हो गया कि वे मीना के साथ सेट पर काम करते अपने डायलोग भूल जाते थे। इसी तरह फिल्मकार मेहबूब खान ने महाराष्ट्र के गर्वनर से कमाल अमरोही का परिचय यह कहकर दिया कि ये प्रसिद्ध स्टार मीना कुमारी के पति हैं। कमाल अमरोही यह सुन नीचे से ऊपर तक आग बबूला हो गए थे। धर्मेन्द्र और मीना के चर्चे भी उन तक पहुँच गए थे। उन्होंने पहला बदला धर्मेन्द्र से यह लिया कि उन्हें पाकीजा से आउट कर दिया। उनकी जगह राजकुमार की एंट्री हो गई। कहा तो यहाँ तक जाता है कि अपनी फिल्म रजिया सुल्तान में उन्होंने धर्मेन्द्र को रजिया के हब्शी गुलाम प्रेमी का रोल देकर मुँह काला कर दिया था। पाकीजा फिल्म निर्माण में सत्रह साल का समय लगा। इस देरी की वजह मीना-कमाल का अलगाव रहा। लेकिन मीना जानती थी कि फिल्म पाकीजा कमाल साहब का कीमती सपना है। उन्होंने फिल्म बीमारी की हालत में की। मगर तब तक उनकी लाइफ स्टाइल बदल चुकी थी। गुरुदत्त की फिल्म साहिब, बीवी और गुलाम की छोटी बहू परदे से उतरकर मीना की असली जिंदगी में समा गई थी। मीना कुमारी पहली हेरोइन थी,जिन्होंने बॉलीवुड में पराए मर्दों के बीच बैठकर शराब के प्याले पर प्याले खाली किए। धर्मेन्द्र की बेवफाई ने मीना को अकेले में भी पीने पर मजबूर किया। वे छोटी-छोटी बोतलों में शराब भरकर पर्स में रखने लगीं। जब मौका मिला एक शीशी गटक ली। कहते है की धर्मेन्द्र ने भी मीना कुमारी का इस्तेमाल किया उन दिनों मीना कुमारी की तूती बोलती थी और धर्मेन्द्र नए कलाकार मीना कुमारी ने धर्मेन्द्र की हर तरह से मदद की फूल और पत्थर की कामयाबी के धर्मेन्द्र उनसे धीरे धीरे अलग होने लगे थे,1964 में धर्मेन्द्र की वज़ह से ही कमाल अमरोही ने मीना को तलाक दे दिया एक बार फिर से धोका मिला मीना कुमारी को,पति का भी साथ छुड गया और प्रेमी भी साथ छोड़ गया है धर्मेन्द्र ने  कभी उनसे सच्चा प्यार नहीं किया धर्मेन्द्र के लिए मीना तो बस एक जरिया भर थी यह बेबफाई मीना सह ना सकी सह्राब की आदि हो चुकी मीना की मौत लीवर सिरोसिस की वज़ह से हो गयी दादा मुनि अशोक कुमार, मीना कुमारी के साथ अनेक फिल्में कर चुके थे। एक कलाकार का इस तरह से सरे आम मौत को गले लगाना उन्हें रास नहीं आया। वे होमियोपैथी की छोटी गोलियाँ लेकर इलाज के लिए आगे आए। लेकिन जब मीना का यह जवाब सुना 'दवा खाकर भी मैं जीऊँगी नहीं, यह जानती हूँ मैं। इसलिए कुछ तम्बाकू खा लेने दो। शराब के कुछ घूँट गले के नीचे उतर जाने दो' तो वे भीतर तक काँप गए। आखिर 1956 में मुहूर्त से शुरू हुई पाकीजा 4 फरवरी 1972 को रिलीज हुई और 31 मार्च,1972 को मीना चल बसी। शुरूआत में पाकीज़ा को ख़ास कामयाबी नहीं मिली मिली थी पर मीना कुमारी की मौत ने फिल्म को हिट कर दिया तमाम बंधनों को पीछे छोड़ तनहा चल दी बादलों के पार अपने सच्चे प्रेमी की तलाश में। पाकीजा सुपरहिट रही। अमर हो गईं ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी। मगर अस्पताल का अंतिम बिल चुकाने लायक भी पैसे नहीं थे उस तनहा मीना कुमारी के पास। अस्पताल का बिल अदा किया वहाँ के एक डॉक्टर ने,जो मीना का जबरदस्त प्रशंसक था। "बैजू बावरा","परिणीता","एक ही रास्ता", शारदा"."मिस मेरी","चार दिल चार राहें","दिल अपना और प्रीत पराई","आरती","भाभी की चूडियाँ","मैं चुप रहूंगी","साहब बीबी और गुलाम","दिल एक मंदिर","चित्रलेखा","काजल","फूल और पत्थर","मँझली दीदी",'मेरे अपने",पाकीजा के किरदारों में उन्होंने जान डाल दी  थी,मीना कुमारी ने 'हिन्दी सिनेमा' में जिस मुकाम को हासिल किया वो आज भी मिसाल बना हुआ है । वो लाज़वाब अदाकारा के साथ शायरा भी थी,अपने दिली जज्बात को उन्होंने जिस तरह कलमबंद किया उन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है कि मानो कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों सुईयाँ चुभो रहा हो. गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम कलमकारों के बूते की बात होती है. गम का ये दामन शायद 'अल्लाह ताला' की वदीयत थी जैसे। तभी तो कहा उन्होंने -कहाँ अब मैं इस गम से घबरा के जाऊँ
कि यह ग़म तुम्हारी वदीयत है मुझको
चाँद तन्हा है,आस्मां तन्हा
दिल मिला है कहाँ -कहाँ तन्हां

बुझ गई आस, छुप गया तारा
थात्थारता रहा धुआं तन्हां

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हां है और जां तन्हां

हमसफ़र कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहाँ तन्हां

जलती -बुझती -सी रौशनी के परे
सिमटा -सिमटा -सा एक मकां तन्हां

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जायेंगे ये मकां तन्हा

टुकडे -टुकडे दिन बिता, धज्जी -धज्जी रात मिली
जितना -जितना आँचल था, उतनी हीं सौगात मिली

जब चाह दिल को समझे, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसा कोई कहता हो, ले फ़िर तुझको मात मिली

होंठों तक आते -आते, जाने कितने रूप भरे
जलती -बुझती आंखों में, सदा-सी जो बात मिली
गुलज़ार साहब ने उनको एक नज़्म दिया था. लिखा था :

शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लम्हा -लम्हा खोल रही है
पत्ता -पत्ता बीन रही है
एक एक सांस बजाकर सुनती है सौदायन
एक -एक सांस को खोल कर आपने तन पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की कैदी
रेशम की यह शायरा एक दिन
अपने ही तागों में घुट कर मर जायेगी
जिस वक्त मीना कुमारी की हमउम्र हेरोइन पेड़ के चक्कर लगाकर प्रेम गीत गा रही थी तब मीना कुमारी ने "मेरे अपने""गोमती के किनारे"में अपने बालों में सफ़ेदी लगाकर बुज़ुर्ग किरदार किये थे,"दुश्मन" में वो भाभी के किरदार में थी,जवाब में जीतेन्द्र की बड़ी बहन का किरदार बखूबी निभाया उस दौर की सभी हीरोइनों ने यह रोल करने से मना कर दिया अपनी इमेज खराब होने का वास्ता देकर
1971 पाकीज़ा,दुश्मन,मेरे अपने
1970 जवाब,विद्या
1967 मझली दीदी,नूरजहाँ,चन्दन का पालना,बहू बेगम
1966 फूल और पत्थर
1965 काजल,भीगी रात
1964 गज़ल,बेनज़ीर,चित्रलेखा
1963 दिल एक मन्दिर,अकेली मत जाइयो,किनारे किनारे
1962 साहिब बीबी और ग़ुलाम,मैं चुप रहूँगी,आरती
1961 प्यार का सागर,भाभी की चूड़ियाँ
1960 कोहिनूर,दिल अपना और प्रीत पराई
1959 अर्द्धांगिनी ,चार दिल चार राहें
1958 सहारा,फ़रिश्ता,यहूदी,सवेरा
1957 मिस मैरी,शारदा
1956 मेम साहिब,एक ही रास्ता,शतरंज
1955 आज़ाद,बंदिश
1954 बादबाँ
1953 परिनीता
1952 बैजू बावरा,तमाशा,
1951 सनम
1946 दुनिया एक सराय
फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
1966 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार - काजल
1963 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार - साहिब बीबी और ग़ुलाम
1955 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार - परिनीता
1954 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार - बैजू बावरा

Thursday, 9 July 2015

समाज में विषमता व कृषक उत्पीड़न को उजागर करती है 'दुश्मन' ---विजय राजबली माथुर

)सोमवार, 4 अगस्त 2014


समाज में विषमता व कृषक उत्पीड़न को उजागर करती है 'दुश्मन' 

फ़िल्मकार का दृष्टिकोण 'दंडात्मक' के बजाए 'सुधारात्मक' न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों को जागरूक करना था । परंतु लोग बाग तो महज मनोरंजन के दृष्टिकोण से ही  फिल्में देखते हैं किसी ओर से भी ऐसी पहल की मांग नहीं उठाई गई आज 43 वर्षों बाद भी लोग 'फांसी-फांसी' के नारों के साथ प्रदर्शन करते हैं और 'मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की ' की तर्ज़ पर नित नए-नए अपराधों की बाढ़ आती जाती है।  

http://vidrohiswar.blogspot.in/2014/08/blog-post_45.html

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कल 03 अगस्त को जब विश्व मैत्री दिवस था हमने दुलाल गुहा साहब निर्देशित व 1971 में प्रदर्शित 'दुश्मन' का अवलोकन किया था। फिल्म की शुरुआत में दिखाया गया है कि मस्त-मौला ट्रक ड्राईवर सुरजीत सिंह (राजेश खन्ना) द्वारा मार्ग में टायर पंचर होने पर सहायक से उसे बदलने को कह कर सारी रात चमेली (बिन्दु ) के कोठे पर बिताने के कारण विलंब हो गया था अतः घने कुहासे में तीव्र गति से ट्रक चलाने के कारण एक गरीब किसान रामदीन अपने एक बैल सहित उसके नीचे आकर जीवन से हाथ धो बैठता है। अदालत में केस चलता है और रामदीन की विधवा मालती (मीना कुमारी जिनकी शायद यह अंतिम फिल्म थी ) जज साहब के घर पर अपने विकलांग  श्वसुर गंगा दीन के साथ जाकर यह कहती है कि अपराधी को सजा देने से उसके परिवार के कष्ट न दूर होंगे न ही रामदीन वापिस मिलेगा अतः उनके खुद के परिवार के सदस्यों को मौत की सजा दे दें।

सुधारात्मक न्याय व्यवस्था : 

जज साहब गहन मंथन करते हैं और स्वप्न में उच्च अदालत से अपना मन्तव्य बताते हैं जिस पर अमल करने की उनको स्वप्न में ही अनुमति मिल जाती है। एक अनोखे और गैर-पारंपरिक निर्णय में जज साहब ने सुरजीत को दो वर्ष की कैद की सजा सुनाई परंतु उसे जेल में न रख कर रामदीन के घर पर रह कर उसके परिवार के भरण -पोषण की ज़िम्मेदारी सौंपी।जिसे सुरजीत द्वारा प्राण पण से निभाया गया अतः ग्रामीणों का लगाव व प्रेम भी उसे प्राप्त हुआ जिसका इजहार उसने प्रस्तुत गीत में इन शब्दों द्वारा किया है-'जंजीरों से भी मजबूत हैं ये प्रेम के कच्चे धागे'।

इस निर्णय द्वारा फ़िल्मकार का दृष्टिकोण 'दंडात्मक' के बजाए 'सुधारात्मक' न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों को जागरूक करना था । परंतु लोग बाग तो महज मनोरंजन के दृष्टिकोण से ही  फिल्में देखते हैं किसी ओर से भी ऐसी पहल की मांग नहीं उठाई गई आज 43 वर्षों बाद भी लोग 'फांसी-फांसी' के नारों के साथ प्रदर्शन करते हैं और 'मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की ' की तर्ज़ पर नित नए-नए अपराधों की बाढ़ आती जाती है।

कुलक व्यवस्था :

हालांकि न तो सुरजीत को न ही गंगा दीन के परिवारीजनों को यह निर्णय पसंद आया था परंतु अदालत का आदेश था तो परिपालन तो करना ही पड़ा। विपरीत और विषम परिस्थितियों में सुरजीत ने कष्टों को सह कर भी गंगा दीन व उसके दिवंगत पुत्र राम दीन के परिवारीजनों की सतत सहायता करने के प्रयास जारी रखे ।

सुरजीत को यह भी एहसास हुआ कि जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बावजूद किस प्रकार व्यापारी/पूंजीपति वर्ग भोले-भाले किसानों की अज्ञानता का लाभ उठा कर उनके खेतों को गिरवी रखवा लेता था और फिर धोखे से अपने नाम रजिस्ट्री करवा कर फार्म हाउस बना कर गुलछर्रे उड़ाता था। यह कुलक वर्ग न केवल ज़मीनों बल्कि किसानों की बहुओं व बेटियों पर भी गलत निगाहें रखता था । रामदीन की बहन कमला (नाज़ ) को कुलक सूरज की तिकड़मों को धता बताते हुये सुरजीत ने उसके बचपन के प्रेमी शेखर से विवाह कराने में मदद दी । इसमें सुरजीत को सहयोग मिला फूलमती (मुमताज़ ) का जो अपने नाना के पास रह कर बच्चों का मनोरंजन करके आजीविका चलाती थी।

पाखंड व ढोंग का पर्दाफाश :

रामदीन की  अकाल मृत्यु के संबंध में सुरजीत को गाँव वालों से उसके द्वारा खरीदे नए खेतों में  एक वृक्ष  पर 'ज़िंदा चुड़ैल ' के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने उनका वहम  सदा के लिए समाप्त करने हेतु उसे काट डालने का निर्णय कर डाला। जब वह वहाँ पहुंचा तो पोंगा पंडित द्वारा प्रेरित कलाकार फूलमती को वहाँ पाया जिसने खुद सुरजीत को भूत कह कर संबोधित  किया था जिसके जवाब में उसने पूछा कि तो तुम्ही ज़िंदा चुड़ैल हो?

वह पोंगा पंडित भूत-चुड़ैल की शांति के नाम पर ग्रामीणों को ठगता था। सुरजीत द्वारा वह वृक्ष उखाड़ फेंकने से उसका धंधा ध्वस्त हो गया तथा उसे ग्रामीणों के तीव्र आक्रोश का सामना करना पड़ा था। ऐसे वक्त में सुरजीत ने ही उसकी जान बचाई थी जिसके बदले में वह कमला-शेखर की शादी कराने हेतु उस वक्त उसे पकड़ लाया था। 

शेखर और फूलमती को एक ठग ज्योतिषी से संपर्क करते दिखा कर फ़िल्मकार ने समाज में व्याप्त अज्ञान व अदूरदर्शिता को भी इंगित करके उससे बचने का संकेत किया है। लेकिन आज तो विभिन्न टी वी चेनलों के माध्यम से अंध विश्वास व पाखंड को और अधिक बढ़ावा दिया जा रहा है। 'दुश्मन' के शिक्षाप्रद संदेश को मनोरंजन की आड़ में उपेक्षित कर दिया गया है। परिणामतः जनता का शोषण और उत्पीड़न और भी भयावह रूप में आज उपस्थित है। 

व्यापार जगत के बढ़ते राजनीतिक आधार का खेत और किसानी पर प्रभाव :

'दुश्मन' का निर्माण काल लगभग 1970 का होगा जबकि 1969 में 'सिंडीकेट' और 'इंडिकेट' के रूप में केंद्र के सत्तारूढ़ दल में विभाजन हो चुका था। 1967 के आम चुनावों में उत्तर भारत के प्रदेशों से कांग्रेस राज का सफाया हो चुका था। व्यापारी और पूंजीपति वर्ग 'समाजवादी नमूने के समाज' सिद्धान्त को धुंधला देना चाहता था। वह अपनी अवैध कमाई को गांवों में खेत खरीद कर और फार्म हाउसों में परिवर्तित करके वैध रूप से आय कर बचाने के उपाय कर रहा था। कुलक-सूरज और उसके साथियों का चाल-चरित्र इसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जिसने सुरजीत के प्रयासों से गाँव के लहलहाते खेतों में फसल काटने से पहले ही आग लगवा दी। क्योंकि सुरजीत  के प्रयासों से गाँव वालों को अपनी-अपनी  ज़मीन का मालिकाना हक वापिस शासन द्वारा मिल चुका था। गाँव का किसान अपने पैरों पर न खड़ा हो सके इसलिए उसकी फसल को फूँक कर कमर तोड़ डाली गई थी। 

ठीक ऐसा ही एक प्रसंग इससे पूर्व की 'सुधारात्मक दंड' वाली फिल्म 'दो आँखें बारह हाथ' में भी आया था । व्ही शांताराम द्वारा निर्देशित इस फिल्म में  जेलर के सद्प्रयासों  से कैदियों द्वारा बंजर ज़मीन को उपजाऊ बना कर तैयार फसलों को भी मंडी के शोषक व्यापारियों द्वारा जलवा दिया गया था।

आज़ादी के तुरंत बाद भी और 22-23 वर्षों बाद भी किसानों की समस्याएँ ज्यों की त्यों थीं और आज से 22-23 वर्ष पूर्व शुरू हुई उदरवाद/नव उदारवाद अर्थ व्यवस्था ने तो किसानों को आत्म-हत्या तक को मजबूर किया है। 'दुश्मन' में लापरवाही/नादानी में बने अपराधी सुरजीत को सुधारात्मक दंड ने एक समाज सुधारक के रूप में परिवर्तित कर दिया है । वह मालती द्वारा फूलमती की ज़िंदगी बचाने के प्रयास में सूरज द्वारा घिर जाने पर गोदाम का फाटक ट्रक से तोड़ कर वहाँ पहुंचता है और अपनी माँ समान भाभी -मालती की इज्ज़त पर हाथ डालने की कोशिश के लिए उसे समाप्त कर देना चाहता है तब मालती द्वारा उसे देवर जी संबोधित करके माफ कर दिया जाता है। इसी कारण अदालत द्वारा  बाकी सजा माफ करके उसे छोड़ देने पर वह अदालत से वहीं रहने की स्वतन्त्रता प्राप्त कर लेता है जहां के ग्रामीण उसके लिए पलक-पांवड़े बिछा कर उसका स्वागत करते हैं। अनाथ हो चुकी फूलमती को अपना कर वह पुनः गाँव को खुश हाल बनाने के काम में जुट जाता है। 

जो 'दुश्मन' के रूप में आया था वही गाँव वालों का भरोसेमंद 'दोस्त' बन गया यही वजह 'दोस्ती दिवस ' पर 'दुश्मन ' देखने की थी।