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Saturday, 22 October 2022

स्मिता पाटिल को याद करते हुए ------ रोशन सुचान




भारतीय सिनेमा की अदाकारा स्मिता पाटिल : जिसके कम्युनिस्ट पिता आजादी आंदोलन में 12 साल जेलों में रहे ❤ 

छोटी उम्र में अलविदा कहने वाली अभिनेत्री स्मिता पाटिल की कहानी  ❤ 

महज 14 साल की उम्र में AISF और सीपीआई से जुड़ गए थे स्मिता के पिता शिवाजीराव पाटिल ❤ 

न्यूज एंकर रही स्मिता राज बब्बर की पत्नी थी छोटी उम्र हो गया था देहांत . सांमतवादी व्यवस्था के बीच पिसती औरत की संघर्ष की कहानी बयां करती थी उनकी फिल्में 

5 दिन पहले स्मिता पाटिल का 17 अक्तूबर को जन्मदिन था . 1955 को पैदा हुई थी एक कम्युनिस्ट और स्वतंत्रता सेनानी परिवार में । छोटी सी उम्र 30 साल भरी जवानी में उनका देहांत हो गया था । स्मिता पाटिल एक सक्रिय नारीवादी होने के अतिरिक्त मुंबई के महिला केंद्र की सदस्य भी थीं। वे महिलाओं के मुद्दों पर पूरी तरह से वचनबद्ध थीं और इसके साथ ही उन्होने उन फिल्मो मे काम करने को प्राथमिकता दी जो परंपरागत भारतीय समाज मे शहरी मध्यवर्ग की महिलाओं की प्रगति उनकी कामुकता तथा सामाजिक परिवर्तन का सामना कर रही महिलाओं के सपनों की अभिवयक्ति कर सकें.

स्मिता पाटिल का जन्म 17 अक्तूबर 1955 को पुणे (महाराष्ट्र) के राजनीतिज्ञ स्वतंत्रता सेनानी शिवाजीराव गिरधर पाटिल और सामाजिक कार्यकर्ता विद्याताई पाटिल के यहाँ कुनबी मराठा परिवार में हुआ था।

पहली बार 1970 के दशक में टीवी न्यूज़रीडर के रूप में कैमरा का सामना किया। उस वक्त वो सरकारी खबर प्रसारक मुंबई दूरदर्शन पर बतौर न्यूज़रीडर के रूप में काम करती थी।

सन 1975 में श्याम बेनेगल की “निशांत” से फ़िल्मी करियर की शुरुवात करने वाली स्मिता 1976 में मंथन और 1977 में भूमिका से सशक्त अभिनेत्री के रूप में सामने आयी | “भूमिका” के रोल के लिए उन्हें पहला राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला | मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार जयवंत दलवी की कृति पर आधारित “चक्र” में अम्मा की भूमिका के लिए उन्हें दुबारा राष्ट्रीय पुरुस्कार से सम्मानित किया गया | “बाजार” में स्मिता (Smita Patil) ने एक मुस्लिम लडकी का किरदार निभाया , जो अपनी आँखों के सामने ही औरत के सौदा होने की गवाह बनी | वही जब्बार पटेल की सुबह में उन्होंने एक ऐसे अधिकारी की पत्नी का रोल अदा किया था जो पत्नी की गैर-मौजूदगी में एक दुसरी औरत से रिश्ता कायम कर लेता है |

“स्मिता की मृत्यु से फ़िल्मी दुनिया में जो खालीपन आया था वह कभी नही भरा जा सका । उनकी गैर-मौजूदगी हिन्दी सिनेमा के साथ साथ विश्व सिनेमा को भी खलती रही है ।

विद्रोही रही स्मिता की बडी़ आंखों और सांवले सौंदर्य ने पहली नज़र मे ही सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था । कालांतर मे स्मिता पाटिल के प्रेम संबंध राज बब्बर से हो गये जिनकी परिणिति अंतंतः विवाह मे हुई। राज बब्बर जो पहले से ही विवाहित थे और उन्होने स्मिता से शादी करने के लिये अपनी पहली पत्नी को छोडा़ था।

स्मिता पाटिल ने 1980 में प्रदर्शित फ़िल्म 'चक्र' में झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाली महिला के किरदार को रूपहले पर्दे पर जीवंत कर दिया। इसके साथ ही फ़िल्म 'चक्र' के लिए वह दूसरी बार 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' से सम्मानित की गईं। अस्सी के दशक में स्मिता पाटिल ने व्यावसायिक सिनेमा की ओर भी अपना रुख़ कर लिया। इस दौरान उन्हें सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के साथ 'नमक हलाल' और 'शक्ति (1982 ) जैसी फ़िल्मों में काम करने का अवसर मिला, जिसकी सफलता ने स्मिता पाटिल को व्यावसायिक सिनेमा में भी स्थापित कर दिया। अस्सी के दशक में स्मिता पाटिल ने व्यावसायिक सिनेमा के साथ-साथ समानांतर सिनेमा में भी अपना सामंजस्य बनाये रखा ।

1985 में स्मिता पाटिल की फ़िल्म 'मिर्च-मसाला' प्रदर्शित हुई। सौराष्ट्र की आज़ादी के पूर्व की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म ने निर्देशक केतन मेंहता को अंतराष्ट्रीय ख्याति दिलाई। यह फ़िल्म सांमतवादी व्यवस्था के बीच पिसती औरत की संघर्ष की कहानी बयां करती है। यह फ़िल्म आज भी स्मिता पाटिल के सशक्त अभिनय के लिए याद की जाती है ।

उनके पिता शिवाजीराव गिरधर पाटिल स्वतंत्रता सेनानी थे । सामाजिक कार्यकर्ता और महाराष्ट्र के नेता थे . देश के पहले छात्र संगठन AISF से जुड़कर आजादी आंदोलन में भाग लिया । स्वतंत्रता के बाद, वह विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े थे और एक कार्यकाल के लिए महाराष्ट्र विधान परिषद , महाराष्ट्र विधान सभा और यहां तक ​​कि राज्य सभा के सदस्य भी रहे थे। 2013 में, उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण से सम्मानित किया गया ।

पाटिल कम उम्र से ही एक सक्रिय राजनेता थे, और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी CPI से लंबे समय तक जुड़े रहे । फिर कांग्रेस पार्टी , समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सहित कई राजनीतिक दलों से जुड़े रहे ।

पाटिल ने एक क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपना करियर शुरू किया, और एक किशोर के रूप में कम्युनिस्ट आंदोलन की ओर आकर्षित हुए। 1939 में, केवल 14 वर्ष की आयु में, वह अखिल भारतीय छात्र संघ (एआईएसएफ) के अध्यक्ष बने, जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की छात्र शाखा है। अगस्त 1936 में स्थापित, एआईएसएफ छात्रों का पहला राष्ट्रीय भारतीय संघ था। एआईएसएफ के माध्यम से, पाटिल ने भारत में ब्रिटिश शासन को खत्म करने के उद्देश्य से विभिन्न गतिविधियों में भाग लिया। इनमें से कुछ गतिविधियाँ हिंसक थीं, और पाटिल को गिरफ्तार किया गया, उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें बारह वर्षों तक जेल में रखा गया।  हालांकि, उन्होंने अपनी सजा पूरी नहीं की और पकड़े जाने से पहले कुछ समय के लिए लखनऊ में अंडरकवर होकर जेल से बाहर निकल आए।

पाटिल 1960 से 1967 तक महाराष्ट्र विधान परिषद (उच्च सदन) और 1967 से 1978 तक महाराष्ट्र विधान सभा (निचले सदन) के सदस्य रहे, उन्होंने शिरपुर से 1967 और 1972 का चुनाव लड़ा और जीता । उन्होंने महाराष्ट्र सरकार में दो कार्यकालों के लिए मंत्री के रूप में कार्य किया: 1968-72 वसंतराव नाइक के अधीन और 1976-78 शंकरराव चव्हाण और वसंतदादा पाटिल के अधीन । ये सभी मंत्री कांग्रेस पार्टी के थे । मंत्री के रूप में, पाटिल ने सिंचाई, बिजली, प्रोटोकॉल, सहकारिता और विधायी मामलों के विभागों को संभाला। बाद में, वह 1992 से 1998 तक एक कार्यकाल के लिए राज्य सभा के सदस्य भी रहे। 

पाटिल महाराष्ट्र में चीनी क्षेत्र में सहकारी आंदोलन में भी सक्रिय थे, जो राज्य में अत्यधिक राजनीतिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। 1981 में, उन्होंने धुले जिले के शिरपुर में सहकारी चीनी कारखाना "शिरपुर सहकारी साखर कारखाना" शुरू करने में मदद की । वह 2009 तक लगातार 27 वर्षों तक इसके अध्यक्ष रहे, जब वसंतराव पाटिल चुने गए। 2012 तक पाटिल नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज के निदेशकों में से एक हैं।

1996 में, उनकी अध्यक्षता में, स्मिता पाटिल चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना उनकी बेटी, अभिनेत्री स्मिता पाटिल की याद में की गई थी, जिनकी 1986 में प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई थी। ट्रस्ट शिरपुर तालुका के दहीवाड़ गाँव में एक स्मिता पाटिल पब्लिक स्कूल चलाता है। ग्रामीण क्षेत्र में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के मिशन के साथ धुले जिला । 

2013 में, भारत सरकार ने उन्हें सार्वजनिक मामलों में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया। यह पुरस्कार भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है। 

पाटिल की शादी विद्याताई पाटिल से हुई थी। विद्याताई शिवाजीराव द्वारा एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में आयोजित कुछ जलसों में शामिल थीं और उनके जोश और कार्य से प्रेरित होकर अपनी मंगनी तोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में शामिल हो गई । वे नास्तिक और गैर-अनुष्ठानवादी दोनों थे और उनकी शादी साने गुरुजी द्वारा की गई थी । 1938 में हुई यह शादी 77 साल तक चली । विद्याताई पाटिल की मार्च 2015 में मृत्यु हो गई।  विद्याताई पाटिल ने अपने पति का 12 साल का कारावास, मंत्री पद की पावर और फिल्म-स्टार बेटी स्मिता की उथल-पुथल और मृत्यु भरी जिंदगी को देखा ।पाटिल तीन बेटियों अनीता, स्मिता और मान्या के माता-पिता थे। अनीता का विवाह शंकर देशमुख से हुआ था, इस दंपति के दो बेटे हैं, (वरुण और आदित्य देशमुख)। अनीता वर्तमान में मुंबई में रहती है और पुकार की कार्यकारी निदेशक है । अनीता की पोती का नाम उनकी बहन स्मिता के नाम पर ज़ो स्मिता देशमुख रखा गया है। तीसरी और सबसे छोटी बेटी, मान्या सेठ, एक पूर्व पोशाक डिजाइनर हैं, और स्मिता पाटिल फाउंडेशन के अध्यक्ष के रूप में कार्य करती हैं। 

स्मिता पाटिल ने एक न्यूज़रीडर के रूप में अपना करियर शुरू किया था, लेकिन जल्दी ही फिल्मों में चली गईं। वह समीक्षकों द्वारा प्रशंसित हिंदी फिल्म अभिनेत्री बन गईं और अपने शानदार प्रदर्शन के लिए कई पुरस्कार जीते।  अभिनेता से नेता बने राज बब्बर से शादी की, जो पहले से ही नादिरा बब्बर से शादी कर चुके थे, जिनसे उनके पहले से ही दो बच्चे थे। इस रिश्ते से स्मिता गर्भवती हो गई और दिसंबर 1986 में उसने एक बेटे को जन्म दिया। बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद उसकी मौत हो गई। इस समय पाटिल और उनकी पत्नी दोनों ने अपना 60वां जन्मदिन पार कर लिया था। फिर भी, उन्होंने नवजात बच्चे को पालने की जिम्मेदारी संभाली, जो बड़ा होकर अभिनेता प्रतीक बब्बर के रूप में फेमस हुआ ।

स्मिता पाटिल को याद करते हुए - रोशन सुचान

Saturday, 17 October 2015

स्मिता पाटिल : संवेदनशील और भावप्रवण अदाकारा --- ध्रुव गुप्त



Dhruv Gupt

सुनाई देती है जिसकी धड़कन, तुम्हारा दिल या हमारा दिल है !
आधुनिक भारतीय सिनेमा की महानतम अभिनेत्रियों में एक स्व. स्मिता पाटिल ने हिंदी और मराठी सिनेमा में संवेदनशील और यथार्थवादी अभिनय के जो आयाम जोड़े, उसकी मिसाल विश्व सिनेमा में भी कम ही मिलती है। वह उन अभिनेत्रियों में थीं जिन्हें देह-संचालन से नहीं, अपने चेहरे की भंगिमाओं और आंखों से अभिनय की कला आती थी। रंगमंच से सिनेमा में आई स्मिता ने 1975 में श्याम बेनेगल की फिल्मों - 'चरणदास चोर' और 'निशान्त' से अपनी अभिनय-यात्रा आरम्भ की थी ! उनके संवेदनशील और भावप्रवण अदायगी ने उन्हें उस दौर की दूसरी महान अभिनेत्री शबाना आज़मी के साथ तत्कालीन समांतर और कला सिनेमा का अनिवार्य हिस्सा बना दिया। यथार्थवादी सिनेमा के बाद व्यावसायिक फिल्मों में भी दर्शकों ने उन्हें हाथोहाथ लिया ! अपने मात्र एक दशक लंबे फिल्म कैरियर में स्मिता ने अस्सी से ज्यादा हिंदी और मराठी फिल्मों में अपने अभिनय के झंडे गाड़े, जिनमें कुछ चर्चित हिंदी फ़िल्में थीं - निशान्त, मंथन, भूमिका, गमन, आक्रोश, अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है, चक्र, सदगति, बाज़ार, अर्थ, मंडी, मिर्च मसाला, अर्धसत्य, भवनी भवाई, शक्ति, नमक हलाल, गुलामी, भींगी पलकें, सितम, दर्द का रिश्ता, चटपटी, आज की आवाज़, अनोखा रिश्ता और ठिकाना। फिल्म 'भूमिका' और 'चक्र' में श्रेष्ठ अभिनय के लिए दो राष्ट्रीय पुरस्कारों के अलावा उन्हें दूसरी फिल्मों के लिए चार फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले थे। अभिनेता राज बब्बर से प्रेम और शादी उनके जीवन की त्रासदी साबित हुई ! शादी के कुछ ही वर्षों बाद 1986 में उनकी मृत्यु हो गई।
स्मिता पाटिल के जन्मदिन (17 अक्टूबर) पर भावभीनी श्रधांजलि !

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Smita Patil (17 October 1955 -- 13 December 1986) was an Indian actress of film, television and theatre.
was an Indian actress of film, television and theatre. Regarded among the finest stage and film actresses of her times, Patil appeared in over 80 Hindi and Marathi films in a career that spanned just over a decade. During her career, she received two National Film Awards and a Filmfare Award. She was the recipient of the Padma Shri, India's fourth-highest civilian honour in 1985. Patil graduated from the Film and Television Institute of India in Pune and made her film debut with Shyam Benegal's Charandas Chor (1975). She became one of the leading actresses of parallel cinema, a New Wave movement in India cinema, though she also appeared in several mainstream movies throughout her career. Her performances were often acclaimed, and her most notable roles include Manthan (1977), Bhumika (1977), Aakrosh (1980), Chakra (1981), Chidambaram (1985) and Mirch Masala (1985). Patil was married to actor Raj Babbar. She died on 13 December 1986 at the age of 31 due to childbirth complications. Over ten of her films were released after her death. Her son Prateik Babbar is a film actor who made his debut in 2008.

Thursday, 16 July 2015

स्मिता पाटिल और ज्योतिष विज्ञान ---विजय राजबली माथुर

स्मिता पाटिल जी द्वारा अमिताभ बच्चन जी को जो ज्योतिषीय परामर्श दिया था उस पर भी मैंने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है :

ज्योतिष का मखौल उड़ाना जितना आसान है उसकी अवहेलना करने पर हानि से बचना नहीं। काश स्मिता जी पूर्ण आयु प्राप्त करतीं तो समाज उनके ज्योतिषीय ज्ञान से लाभ उठा सकता था। परंतु दुनिया का यह दुखद दस्तूर है कि किसी के जीवित रहते उसको उसका वाजिब हक व सम्मान नहीं दिया जाता है। जिन साहब ने मृतयोपरांत स्मिता  पाटिल जी के ज्योतिषीय ज्ञान को रेखांकित किया वह साधूवाद के पात्र हैं।

http://vidrohiswar.blogspot.in/2014/08/blog-post_25.html

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उपरोक्त दोनों कटिंग्स स्वतः स्पष्ट हैं। दुनिया में दो तरह के अंध-विश्वासी हैं-एक वे जो ज्योतिष का नाम लेकर कही गई किसी भी अनर्गल बात को भी सिर माथे पर रख लेते हैं;दूसरे वे जो 'नास्तिकता' या 'एथीस्टवाद' के नाम पर ज्योतिष का  नाम लेने पर ही बिदक जाते हैं और उसे अवैज्ञानिक व अविश्वसनीय बताते नहीं थकते हैं। हालांकि ऐसे दो एथीस्टो ने खुद अपने,अपनी पत्नी एवं पुत्री की जन्मपत्रियों का विश्लेषण मुझसे करवाया भी है और ज्योतिष की आलोचना करना अपना परम धर्म भी समझते हैं। 

वस्तुतः 'विज्ञान' केवल प्रयोगशाला के बीकर में किए गए प्रयोगों का ही नाम नहीं है। "किसी भी विषय के नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्यन को विज्ञान कहा जाता है । " यह समस्त संसार स्वम्य में ही एक प्रयोगशाला है और यहाँ नित्य नए-नए प्रयोग हो रहे हैं। मनुष्य के भविष्य से संबन्धित वैज्ञानिक अध्यन को ज्योतिष   विज्ञान कहा जाता है। 

ज्योतिष में गणित के सिद्धांतों के आधार पर गणना होती है । अंक गणित पर 'अंक ज्योतिष',बीज गणित पर 'जन्म कुंडली विश्लेषण' और रेखा गणित पर 'हस्त रेखा' का अध्यन आधारित है। ज्योतिष का मुख्य कारक ग्रह 'शुक्र' है साथ ही 'सूर्य'व 'बुध' भी ज्योतिष की प्रेरणा देते हैं। हथेली में यदि चंद्र रेखा का अस्तित्व हो तो इसे रखने वाला बिना किसी गणना के अन्तः प्रेरणा के आधार पर पूर्वानुमान करने में सक्षम होता है।

'स्मिता 'जी के संबंध में समाचार कहता है कि वह 'हस्त रेखा ' का ज्ञान तो रखती ही थीं ,उनको पूर्वानुमान करने की भी क्षमता प्राप्त थी। अमिताभ जी के बारे में उनकी गणना व पूर्वानुमान दोनों सही निकले थे और शबाना जी द्वारा उनके इस ज्ञान के संबंध में पुष्टि करने की भी चर्चा है। 

Saturday, April 7, 2012

शबाना आज़मी को सम्मान क्यों? http://krantiswar.blogspot.in/2012/04/blog-post_07.html
Thursday, April 19, 2012

रेखा -राजनीति मे आने की सम्भावना--http://krantiswar.blogspot.in/2012/04/blog-post_19.html
रेखा जी के सांसद मनोनीत होने पर ब्लाग जगत में पूना प्रवासी भ्रष्ट-धृष्ट-निकृष्ट ब्लागर की पहल पर( जो खुद चार जन्म कुंडलियों का निशुल्क विश्लेषण मुझसे प्राप्त कर चुका था )मेरे ज्योतिषीय ज्ञान की खिल्ली उड़ाई गई थी। IBN7 से संबन्धित  उसके समर्थक एक ब्लागर द्वारा  अनेकों पोस्ट्स के माध्यम से  ज्योतिष विज्ञान की निंदा व आलोचना की गई थी। 
'स्मिता'जी के ज्योतिषीय ज्ञान के संबंध में संबन्धित लोगों से बढ़ कर दूसरा कौन जान सकता है? उनकी कोई जन्म कुंडली तो  किसी अखबार छ्पी नहीं देखी है। परंतु जो विवरण छ्पा है उसके अनुसार उनका 'शुक्र' ग्रह निश्चय ही प्रभावशाली था जिसका एक प्रमाण उनके प्रसिद्ध कलाकार होने से ही सिद्ध हो जाता है। निश्चित ही उनकी हथेली में प्रबल 'चंद्र' रेखा का अस्तित्व रहा ही होगा जो वह स्वप्न के आधार पर अमिताभ बच्चन जी को आगाह कर सकीं। उनकी चेतावनी पर ध्यान न देने के कारण ही  अमिताभ बच्चन जी त्रस्त हुये थे। 
ज्योतिष का मखौल उड़ाना जितना आसान है उसकी अवहेलना करने पर हानि से बचना नहीं। काश स्मिता जी पूर्ण आयु प्राप्त करतीं तो समाज उनके ज्योतिषीय ज्ञान से लाभ उठा सकता था। परंतु दुनिया का यह दुखद दस्तूर है कि किसी के जीवित रहते उसको उसका वाजिब हक व सम्मान नहीं दिया जाता है। जिन साहब ने मृतयोपरांत स्मिता  पाटिल जी के ज्योतिषीय ज्ञान को रेखांकित किया वह साधूवाद के पात्र हैं।