एस्थर विक्टोरिया अब्राहम: भारत की पहली मिस इंडिया और अभिनेत्री जिन्हें स्टेज नाम #प्रमिला से जाना जाता है, जन्म 30 दिसंबर 1916 को #कलकत्ता के बगदादी यहूदी परिवार में हुआ था। 17 वर्ष की आयु में घर छोड़कर उन्होंने मनोरंजन की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत पारसी थिएटर में नृत्यांगना के रूप में की, फिर स्टंट अभिनेत्री के तौर पर लगभग 30 फिल्मों में काम किया। बसंत, उल्टी गंगा और जंगल किंग फिल्म में उनकी भूमिकाएं याद की जाती हैं।
1947 में स्वतंत्र भारत की पहली मिस इंडिया का ताज उन्होंने जीता—उस समय उनकी उम्र 31 वर्ष थी और वे अपने पांचवें बच्चे के साथ गर्भवती थीं।अपने पति अभिनेता कुमार (मुगल ए आज़म मे संतराश) (सैयद हसन अली जैदी) के साथ उन्होंने ‘सिल्वर प्रोडक्शंस’ की स्थापना की और 16 फिल्में बनाकर इतिहास रचा। उनकी बेटी नाकी जहां भी 1967 में मिस इंडिया बनीं, जिससे वे मां-बेटी जोड़ी के रूप में यह उपलब्धि हासिल करने वाली एकमात्र जोड़ी बन गईं।प्रमिला ने दो विवाह किए और पांच बच्चों का पालन-पोषण किया। 6 अगस्त 2006 को लगभग 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था.
एस्थर विक्टोरिया अब्राहम (प्रमिला) के 4 बेटे थे।पहली शादी (मणिकलाल डांगी से) से एक बेटा: मॉरिस अब्राहम ।
दूसरी शादी (सैयद हसन अली जैदी उर्फ कुमार से) से तीन बेटे: अकबर
असगर हैदर अली सबसे छोटे बेटे, जो अभिनेता और पटकथा लेखक हैं (टीवी )।
Sanjog Walter् आशा भोंसले का जन्म 8,सितम्बर 1933 को हुआ था आशा ताई ने अपने कैरियर की शुरुआत 1943 में की थी छह दशकों से ज्यादा लम्बा है उनका कैरियर, 11,000 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों के लिए अपनी आवाज़ दी है-इसके अलावा,कई निजी एल्बम के लिए भी उन्होंने अपनी आवाज दी है, भारत और विदेश में कई संगीत कार्यक्रम में हिस्सा लिया,आशा भोंसले लता मंगेशकर की बहन है, आशा भोंसले अपनी आवाज़ की रेंज के लिए मशहूर हैं फिल्म संगीत, पॉप,गजल,भजन,पारंपरिक भारतीय शास्त्रीय संगीत,लोक गीत,कव्वाली और रवींद्र संगीत और हिन्दी के अलावा, वह 20 से अधिक भारतीय और विदेशी भाषाओँ में अपनी आवाज़ को दर्ज़ करा चुकी है भारत सरकार ने 2000 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और 2008 में पदम विभूषण से सम्मानित किया आशा भोसले सांगली, बम्बई अब महाराष्ट्र में गोर के छोटे से गांव में हुआ था,उनके पिता मास्टर दीनानाथ मंगेशकर, संगीतकार रंगमंच अभिनेता और शास्त्रीय गायक थे, जब वह नौ साल की थी उनके पिता की मृत्यु हो गई परिवार पुणे से कोल्हापुर और फिर मुंबई आ गया और उसकी बड़ी बहन लता मंगेशकर ने परिवार के लिए फिल्मों में अभिनय करने और गायन का काम शुरू कर दिया था 1943 में अपना पहला गीत मराठी फिल्म माझा बाल के लिए गाया था,इस फिल्म के लिए संगीत दत्ता वात्रेतय़ द्वारा तैयार किया था 1948 में पहली बार हिंदी फिल्म चुनरिया से उन्होंने आगाज़ किया था इस फिल्म के संगीतकार थे हंसराज बहल,रात की रानी 1949 में उन्होंने पहली बार सोलो का मौका मिला था आशा भोंसले ने 16 की उम्र में, 31 साल के गणपतराव भोंसले के साथ शादी कर ली यह शादी परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ थी उन दिनों में गणपतराव लता के निजी सचिव थे यह शादी नाकामयाब रही शादी के कुछ साल बाद, आशा ताई को बाहर कर दिया गया था 1960 के आसपास, गणपतराव ने आशा ताई अपने दो बच्चों और और तीसरा उनके दिनों उनके गर्भ में था के साथ मायके आ गयी अपने बच्चों को पालने के लिए पैसे कमाने के लिए फिल्मों में गाना जारी रखा,उस दौर में गीता दत्त,शमशाद बेगम और लता मंगेशकर का दबदबा था जो गाने कोई नहीं गाता था वो आशा ताई को मिलने लगे 1950 के दशक में, वह बॉलीवुड ’गिनती नहीं लता’ में सबसे पार्श्व गायकों की तुलना में अधिक गीत गाये इनमें से अधिकांश कम बजट बी या सी ग्रेड फिल्मों में थे इन फिल्मों के संगीतकार एआर कुरैशी, सज्ज़ाद हुसैन और गुलाम मोहम्मद हुआ करते थे फिल्म निर्देशक बिमल रॉय ने परिणीता 1953 में गाने का मौका दिया राज कपूर ने मोहम्मद रफी के साथ बूट पॉलिश 1954 में, नन्हे मुन्ने बच्चे के लिए मौका दिया.ओपी नैयर ने आशा ताई को सीआईडी में मौका दिया 1956 में उसके बाद बीआर चोपड़ा की नया दौर, 1957 मांग के साथ तुम्हारा, साथी हाथ बढ़ाना और उड़ें जब जब जुल्फें तेरी, साहिर लुधियानवी के गीतो को मोहम्मद रफी का साथ मिला उन्हें कामयाबी मिली पहली बार उन्होंने फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री के लिए सभी गीत गाये थे बीआर चोपड़ा ने गुमराह 1963, वक्त 1965, हमराज़ 1965, आदमी और इंसान 1966 और धुंध 1973 में मौका दिया,1966 में फिल्म तीसरी मंज़िल के साथ संगीत निर्देशक आरडी बर्मन से उनकी टयूनिंग बन गयी थी डांस नंबर आजा आजा सुना आशा भोंसले ने तो आरडी बर्मन को लगा कि वह इस पाश्चात्य धुन के गाने को नहीं गा सकेंगी लिहाज़ा बर्मन ने इस धुन को बदलने की पेशकश कर दी आशा भोंसले ने मना कर दिया, और इस गीत को चुनौती के रूप में लिया रिहर्सल के दस दिनों के बाद गीत पूरा किया और ओ हसीना ज़ुल्फोंवाली,ओ मेरे सोना रे रफी के साथ सभी तीन युगल के साथ, कामयाब रही 1960 70 के दौरान,हेलेन, जिन पर ओ हसीना जुल्फों वाली फिल्माया गया था हेलेन के लगभग सभी कैबरे न. को आशा ने अपनी आवाज़ दी पिया तू आजा अब कारवां और ये मेरा दिल डॉन, 1980 के दशक तक, भोसले,को स्टोरियोटाईप कैबरे सिंगर और पॉप गायिका के रूप में कोड जाता था, 1981 में वह रेखा अभिनीत फिल्म उमराव ज़ान के लिए दिल चीज़ क्या है, आंखों की मस्ती के,ये क्या जगह हैं दोस्तों,जुस्तज़ू जिसकी थी के लिए अलग शैली तैयार की थी, फिल्म के संगीत निर्देशक खययाम ने जिसका नतीज़ा भी सामने था कभी अपने कैरियर में गज़ल ना गाने वाली आशा को गज़ल गाने के लिए पहला राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड मिला इज़ाज़त 1987 मेरा कुछ सामान के लिए एक और राष्ट्रीय पुरस्कार जीता,1995 में, 62 वर्षीय भोंसले ने फिल्म रंगीला में अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर के लिए गाया था तनहा तनहा,रंगीला रे,संगीत निर्देशक एआर रहमान, के साथ साथ कई गाने रिकॉर्ड हुए 2000 के दशक में लगान का राधा कैसे ना जले 2001, प्यार तूने क्या किया कमबख्त इश्क 2001,ये लम्हा फिलहाल 2002 ,लकी 2005 । संगीत निर्देशकों के साथ भागीदारी,ओ पी नैयर ने आशा के साथ र्कई फिल्मों में लाज़वाब संगीत दिया कई लोगों को दोनों के बीच रोमांटिक रिश्ते का शक भी था नैयर छम छमा छम की संगीत रिकर्डिंग पर पहली बार 1952 में आशा,से मिले थे और फिल्म पहली बार मंगलू 1954 में मौका दिया पर सीआईडी में बड़ा ब्रेक मिला था 1956 में,हालांकि,नया दौर, 1957 की कामयाबी ने इस जोड़ी को मशहूर कर दिया था बताया जाता है के 1959 के बाद, वह भावनात्मक रूप से और पेशेवर तौर पर भी नैयर से जुड़ गयी थी ओ पी नैयर और आशा भोसले की टीम ने कई लाज़वाब गीत दिए तुमसा नहीं देखा 1957 आइये मेहरबान मधुबाला हावड़ा ब्रिज, 1958 एक मुसाफिर एक हसीना 1962, कश्मीर की कली 1964 ये हैं रेशमी जुल्फों का अंधेरा मुमताज मेरे सनम,1965 पर फिल्माया पर फिल्माया हैं आओ हुजूर तुमको किस्मत,और जाइए आप कहाँ;मेरे सनम भी लोकप्रिय थे वे, जैसी कई हिट फिल्मों के लिए गाने भी दर्ज की गई है ओपी नैयर उड़े जब जब जुल्फें, तेरी नया दौर,प्यार का राही हूं एक मुसाफिर एक हसीना, दीवाना हुआ बादल जैसे अपने सबसे लोकप्रिय युगल के लिए आशा भोंसले मोहम्मद रफी की जोड़ी का इस्तेमाल किया कश्मीर की कली इशारों इशारों में आशा ने फिल्म प्राण जाए पर वचन ना जाए 1974 में ओपी नैयर के लिए आखिरी बार गाया चैन से हमको कभी आपने ज़ीने न दिया ज़हर भी माँगा अगर इस गीत को कई अवार्ड मिले पर यह गीत फिल्म में शामिल नहीं किया गया,वे 5 अगस्त, 1972 को अलग हो गये थे,खययाम,खययाम ने आशा की प्रतिभा को पहचाना अपनी पहली फिल्म बीवी 1948 के अलावा खययाम ने 1950 के दशक में दर्द और फिर सुबह होगी,में आशा को मौका दिया लेकिन इस टीम का असली काम उमराव ज़ान के गीतों के लिए याद किया जाताहै। रवि,संगीतकार रवि ने अपने पसंदीदा Female singers में आशा को माना वह अपनी पहली फिल्म वचन 1955 की लोरी चन्दामामा से लेकर घराना,गृहस्थी,वक्त,चौदहवीं का चांद, गुमराह, बहू बेटी, चाइना टाउन, आदमी और इंसान, धुंध और हमराज़ काजल और फूल और पत्थर तक रवि आशा की आवाज़ का बेहतर इस्तेमाल करते रहे, किशोर कुमार के साथ लोकप्रिय गीत कैट माने बिल्ली दिल्ली का ठग का भजन तोरा मन दर्पण काजल आशा रवि के सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक माना जाता है,एक समय था जब संगीतकार आशा को उस वक्त याद करते थे जब बी ग्रेड नायिकाओं पर फिल्माये जाने वाले गाने को रिकॉर्ड करने की जरूरत होती थी,सचिन देव बर्मन बॉलीवुड के सबसे मशहूर संगीतकार सचिन देव बर्मन ने आशा को काला पानी, काला बाज़ार,इंसान जाग उठा, लाजवंती,सुजाता और तीन देवियाँ जैसी फिल्मों में कई हिट गाने दिए इन गीतों में से सबसे ज्यादा मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के साथ युगल थे क्या आज भी को फिल्म सुजाता के इस गाने को कोई भूल सकता है तुम जियो हज़ारों साल, साल के दिन पचास हज़ार, बिमल रॉय की बंदिनी 1963 में गीत अब के बरस से उनके स्थिति और मज़बूत हो गयी थी,ज्वेल थीफ 1967 तनूजा पर फिल्माया गया गीत रात अकेली है बहुत लोकप्रिय हुआ था, जयदेव जब एसडी बर्मन के सहायक जयदेव ने जब बतौर जब संगीत निर्देशक के रूप में अपनी पारी की शुरुआत की तो हम दोनों 1961, मुझे जीने दो 1963, पानी 1971 बूँद और अन्य फिल्मों में आशा को ही मौका दिया 1971 में,इस जोड़ी ने आठ गैर फिल्म भक्ति गीत और गजल की एलपी जारी की थी जयदेव की 1987 में उनकी मौत के बाद पर, जयदेव के कम प्रसिद्ध गीतों का संकलन एलबम सुरांजलि जारी किया था । शंकर जयकिशन,शंकर-जयकिशन के साथ आशा को काम करने का कम मौका मिला पर्दे में रहने दो शिकार 1968 आशा को उनका दूसरा फिल्म फेयर पुरस्कार मिला जिंदगी एक सफर हैं सुहाना अंदाज़ 1971 जिसमें उन्होंने यूडलिंग किशोर कुमार के साथ की थी, जब राज कपूर ने मेरा नाम जोकर 1970 में आशा को फिर मौका दिया तब इस बार भी संगीतकार शंकर जयकिशन ही थे.राहुल देव बर्मन उर्फ़ पंचम,आशा ताई पंचम मिले तब वो तीन बच्चों की मां थी उनकी भागीदारी तीसरी मंज़िल 1966 से शुरू हुई थी कैबरे, रॉक, डिस्को, गजल और शास्त्रीय धुनें पर आशा ताई ने अपनी आवाज़ दी 1970 के दशक में, आशा और पंचम की जुगल बंदी ने धूम मचा दी थी कैबरे पिया तू आजा अब कारवां,दम मारो दम हरे रामा हरे कृष्णा,1971 दुनिया में अपना देश, 1972 चुरा लिया है तुमने यादों की बारात, 1973 मेरा कुछ सामान, खाली हाथ शाम आयी हैं,कतरा कतरा 1980 के दशक में इजाज़त से उन्हेंने फिर अवार्ड हासिल किये-आशा को आर डी बर्मन"Bubs" कह कर बुलाते थे 1980 में दोनों ने शादी कर ली राहुल देव बर्मन ने आशा ताई को बंगाली भाषा के लिये कई गानों में मौका दिया,जो हिट रहे,इलैयाराजा,दक्षिण भारतीयी फिल्म संगीतकार इलैयाराजा ने 1980 के दशक की शुरुआत में आशा को फिल्म Moondram 1982 में मौका दिया 1983 में सदमा के नाम से बनी थी और 1990 के दशक के उत्तरार्ध तक जारी रहा इस दौर में अवधि से कई हिट न. तमिल में थे 2000 में, आशा ताई ने कमल हासन की राजनीतिक फिल्म हे राम के लिए थीम गीत गाया गायक हरिहरन के साथ एक युगल गीत भी था,आर ए रहमान,ए आर रहमान और आशा रंगीला 1994 से साथ जुड़े,तनहा तनहा, रंगीला रे जैसे गीत,मुझे दे रंग,राधा कैसे ना जले,लगान,उदित नारायण के साथ युगल, कहीं आग लगे ताल, हे भंवरे की दौड़,केजे येसुदास के साथ युगल,1999 धुआँ,मीनाक्षी, 2004 रहे, अनु मलिक,संगीतकार अनु मलिक और आशा का साथ अन्नू मलिक की पहली फिल्म सोहनी महिवाल 1984 से लेकर अब तक बना हुआ है गौर तलब है की आशा ताई ने अन्नू मलिक के पिता सरदार मलिक के लिए भी गाया था सारंगा 1960 मे,मदन मोहन के साथ मेरा साया 1966 झुमका गिरा रे सलिल चौधरी के साथ जागते रहो 1956 छोटी सी बात 1975 में,जानेमन जानेमन,ष्ठंडी ठंडी सावन की फुहार जैसे मशहूर गीत गए,संगीतकार संदीप चोव्टा के साथ कमबख्त इश्क, फिल्म प्यार तूने क्या किया 2001, गाया आशा ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, नौशाद, रवींद्र जैन,एन दत्ता और हेमंत कुमार जतिन ललित,बप्पी लाहिड़ी,कल्याणजी आनंदजी,उषा खन्ना,चित्रगुप्त,और रोशन के साथ भी काम किया गीतकार गुलजार, संगीत निदेशक आर.डी. बर्मन और आशा भोंसले एक साथ आए थे, डबल एल्बम, दिल पड़ोसी है, जो 8 सितंबर, 1987 को जारी किया गया था.1990 के दशक में, आशा ताई ने remixed आरडी बर्मन गाने के साथ प्रयोग किया. तब खय्याम सहित कई लोगों ने पुरानी धुन के साथ छेड़छाड़ करने के लिए आलोचना की थी. फिर भी, राहुल और मैं जैसे एलबम काफी लोकप्रिय हो गये थे 1997 में, पॉप एलबम लेस्ली लुईस के साथ जनम समझा करो. रिलीज़ हुआ जिसे 1997 एमटीवी पुरस्कार सहित कई पुरस्कार मिले पाकिस्तानी गायक अदनान सामी के नज़र मिलाओ युगल गाया. दोनों एक साथ फिर से साथ आये एलबम बरसे बादल में. एलबम में आठ गाने, भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित हैं.आशा ताई ने कई एलबम के लिए गजलें गाई है मेराज - ऐ - गजल, आबशार -ऐ-ग़ज़ल, कशिश. मेहदी हसन, गुलाम अली, फरीदा खानम और जगजीत सिंह- 2005 में, आशा ने चार ग़ज़ल maestros के लिए श्रद्धांजलि के रूप में एलबम जारी किया . एलबम फरीदा ख़ानम का आज जाने की जिद न करो , गुलाम अली चुपके चुपके, आवारगी और दिल में एक लहर , जगजीत के सिंह आहिस्ता आहिस्ता और मेहदी हसन रंजिश हाय साही, रफ्ता रफ्ता, मुझे तुम नज़र जारी किये इसके अलावा गोल्डन कलेक्शन: यादगार गजल (गैर फिल्म गुलाम अली, आरडी बर्मन और नज़र हुसैन जैसे संगीतकारों द्वारा गजल), गोल्डन कलेक्शन उनके 60 वें जन्मदिन पर , ईएमआई तीन कैसेट जारी किये गये थे .2006 में, एक और एलबम आशा और दोस्त रिलीज़ हुए जिसमें वो फिल्म अभिनेता संजय दत्त और उर्मिला मातोंडकर और प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी ब्रेट ली के साथ है, 1980,1990 के दशक में, आशा ने विश्वयात्रा, के तहत कनाडा, दुबई, ब्रिटेन, अमेरिका और कई अन्य देशों में संगीत कायर्कर्म पेश किये 1989 में, 20 दिनों में 13 अमेरिकी शहरों में प्रदर्शन किया.आशाताई को खाना पकाने का शौक है. वह अक्सर बॉलीवुड हस्तियों के लिए कड़ाई गोश्त और बिरयानी पकती रही हैं आशा ताई के रेस्तरां और दुबई और कुवैत में जो पारंपरिक उत्तर - पश्चिमी भारतीय भोजन उपलब्ध कराता है. आशा ताई बर्मिंघम, ब्रिटेन में हाल ही में एक नया रेस्तरां खोला गया है.आशा भोसले ने सात बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार हासिल किया और 18 बार फ़िल्मफ़ेयर नामांकन मिला वह 1967 और 1968 में अपने पहले दो पुरस्कार जीते. (इस से पहले फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट फिमेल प्लेबैक अवॉर्ड को मंगेशकर अवॉर्ड कहा जाता था क्योंकि हर बार फिमेल प्लेबैक अवॉर्ड सिर्फ लता को मिलता था 1967,1968 में आशा ताई ने इस पर अपना कब्ज़ा कर लिया तो 1969 में लता दीदी ने यह कह कर इस अवॉर्ड के लिए मना कर दिया की नई प्रतिभाओं को बढ़ावा मिलना चाहिए ) 1979 में फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट फिमेल प्लेबैक अवॉर्ड आशा ताई के हिस्से में गया और उन्होंने ने भी लता दीदी की राह पकड़ ली अनुरोध किया है कि इसके बाद नामांकन के लिए उसके नाम पर विचार नहीं किया जाये 1996 में रंगीला के लिए विशेष पुरस्कार और 2001 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिया गया था. आशा और लता ने एक साथ कम ही गाने गाये फिल्म दमन 1951 के लिए पहली बार गया चोरी चोरी,1956,मिस मैरी, 1957,शारदा 1957, मेरे महबूब में क्या नही मेरे मेहबूब, 1963, ऐ काश किसी दीवाने को आए दिन बहार के, 1966,मैं चली मैं चली पड़ोसन, 1968, के बाद छाप तिलक सब मैं तुलसी तेरे आंगन की,1978, दोनों की आवाज़ का जादू एक साथ दिखा उत्सव,1984 में मन क्यों बहका के बाद इन दोनों ने फिर एक साथ नहीं गाया कहा जाता है की लता और आशा के बीच कुछ नाराजगियां थे लता के अपने कैम्प थे बहुत से संगीतकार और निर्माता निर्देशक लता के अलावा किसी और और को मौका नहीं देते फिर भी आशा ने कई लता के खास माने गये संगीतकारों के साथ काम किया ओपी नैयर ही एकलौते संगीतकार रहे जिन्होंने कभी लता को मौका नहीं दिया और वे आशा के साथ हिट पर हिट फिल्में देते रहे,’मंगेशकर बैरियऱ’को पार करने का दम सिर्फ आशा ने ही दिखाया था ’मंगेशकर बैरियर’ ने कई गायाकिओं को दबा दिया था,फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट फिमेल प्लेबैक अवॉर्ड- 1968: "गरीबों की सुनो" (दस लाख, 1966)-1969: "पर्दे में रहने करो" (शिकार, 1968)-1972: "पिया तू आजा अब" (कारवां, 1971)-1973: "दम मारो दम '(हरे रामा हरे कृष्णा, 1972)- (नैना, 1973) "लगी हैं रात"-1975: "चैन से हमको कभी" (प्राण जाए पर वचन न जाए, 1974)-1979: "ये मेरा दिल" (डॉन, 1978)-विशेष पुरस्कार 1996 -(रंगीला, 1995)-लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार-2001 - फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार- राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार-बेस्ट फिमेल प्लेबैक सिंगर के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दो बार जीता है:-1981: दिल चीज़ क्या है (उमराव जान)-1986: मेरा कुछ सामान (इजाज़त)-आइफा पुरस्कार बेस्ट फिमेल प्लेबैक के लिए आईफा पुरस्कार-2002: "राधा कैसा ना जले" (लगान)-अन्य पुरस्कार- 1987: एशिया कोकिला.पुरस्कार (भारत - पाक एसोसिएशन, ब्रिटेन) -1989: लता मंगेशकर पुरस्कार (मध्य प्रदेश सरकार).-1997: स्क्रीन वीडियोकॉन अवार्ड लिए (एल्बम जानम समझा करो)-1997: एमटीवी पुरस्कार (एलबम जानम समझा करो).-1997: चैनल वी अवार्ड (एलबम जानम समझा करो)-1998: दयावती मोदी पुरस्कार-1999: लता मंगेशकर पुरस्कार (महाराष्ट्र सरकार)-2000: मिलेनियम (दुबई)-2000: जी गोल्ड बॉलीवुड पुरस्कार-2001: एमटीवी पुरस्कार (कमबख्त इश्क के लिए)-2002: बीबीसी लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड-2002: ज़ी सिने अवार्ड सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायन के लिए (लगान राधा कैसे ना जले के लिए)-2002: हॉल ऑफ फेम के लिए जी सिने विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया.-2002: सनसुई मूवी अवार्ड (लगान राधा कैसे ना जले के लिए)-2003: भारतीय संगीत के लिए उत्कृष्ट योगदान के लिए स्वरालय येसुदास पुरस्कार-2004: भारतीय वाणिज्य और उद्योग चैंबर के संघ द्वारा जीवित किंवदंती पुरस्कार.-2005: एमटीवी Immies, आज जाने की जिद न करो के लिए सर्वश्रेष्ठ महिला पॉप-2005: संगीत में सबसे स्टाइलिश.-1997 में, आशा भारतीय विरासत, उस्ताद अली अकबर खान के साथ एलबम के लिए ग्रैमी अवार्ड के लिए नामित 2000 में भारतीय सिनेमा में उत्कृष्ट योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्राप्त किया. अमरावती और जलगांव विश्वविद्यालय से साहित्य में डॉक्टरेट की मानद उपाधि.- भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.-2011 में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में संगीत के इतिहास में सबसे दर्ज कलाकार के रूप में आधिकारिक तौर पर भोंसले को स्वीकार किया."1947 के बाद से 11,000 एकल, युगल और कोरस समर्थित गाने और 20 से अधिक भारतीय भाषाओं में रिकॉर्डिंग के लिए स्टूडियो रिकॉर्डिंग (एकल)" के लिए सम्मानित किया गया था.
हिंदी
फिल्मों में ऐसे बहुत से ऐसे नाम है जिनकी शुरुआती ज़िंदगी के बारे में
बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है,ऐसे ही एक फिल्म कार थे बाबू राम इशारा
जिन्होंने 1970 के दशक में अपनी बोल्ड फिल्मों से तहलका मचा दिया था बाबू
राम इशारा (बी.आर.इशारा) इस फानी दुनिया को अलविदा कह गये, बी.आर.इशारा की
पैदाइश 7 सितंबर 1934 में चिंतपूर्णी में हुई थी. चिंतपूर्णी तब पंजाब का
हिस्सा था (अब हिमांचल ,वो हिमाचल प्रदेश के उना के रहने वाले थे फिल्मों
की चाह में उना से भाग कर बम्बई आ गये और हिंदी फिल्मों के सेट पर " tea
boy " के रूप में काम करने लगे,और ना जाने कब वो छोटी छोटी हिंदी
फिल्मों के संवाद लेखक बन गये. 1969 में इन्साफ का मंदिर की कहानी लिखी थी
,1970 में रिलीज़ हुई गुनाह और कानून से लोग उन्हें पहचानने लगे
थे,बी.आर.इशारा के पास जो कहानिया थी उस दौर के हिसाब से बेहद बोल्ड थी जो
उस वक्त के मध्यम वर्ग में मौजूद " यौन" भावना को लेकर थी.सामाजिक और
रोमांटिक फिल्मों के दौर में बोल्ड सब्जेक्ट वाली फिल्मों के लिए निर्माता
नहीं मिलते थे,आई.एम्.कन्नू को बी.आर.इशारा की कहानी पसंद आई और 1970 में
रिलीज़ हुई थी,"चेतना" (जिसका यह गीत आज भी लोकप्रिय है --में तो हर मोड़
पर दूंगा तुझको सदा) हीरो थे नए नवेले अनिल धवन साथ में थे शत्रुघन सिन्हा.
हेरोइन थी रेहाना सुलतान जो गोल्ड मेडल थी FTII, पुणे (graduated
1966) जो 1970 की मशहूर फिल्म दस्तक से अपने फ़िल्मी कैरियर का आगाज़ कर
चुकी थी इस फिल्म के लिए वो National Award as Best Actress 1970 का जीत
चुकी थी. "चेतना" बोल्ड स्टोरी बोल्ड बेडरूम सीन्स की वज़ह से हिट रही.
फिल्म चेतना की शूटिंग रिकार्ड 28 दिनों में पूरी की गयी थी,चेतना बम्बई की
एक सेक्स वर्कर की कहानी थी फिल्म का सन्देश था की सेक्स वर्कर भी अपना
घर बसा सकती है, चेतना के बाद 1971 ,मन तेरा तन मेरा,1972 मान जाइए,एक नज़र
(अमिताभ बच्चन और जाया भादुड़ी इस फिल्म का मशहूर गाना था पत्ता पत्ता
बूटा बूटा हाल हमारा जाने है ) 1972 में सायरा नाम की एक नयी हेरोइन को
फिल्म "ज़रूरत" में लाये और अब सायरा का फ़िल्मी नाम था रीना रॉय,
"ज़रूरत" भी बोल्ड स्टोरी बोल्ड बेडरूम सीन्स की वज़ह से हिट रही. 1973 में
नयी दुनिया नए लोग,हाथी के दांत,एक नाव दो किनारे,और आई थी दिल की राहें
जैसी गंभीर फिल्म.1973 में चरित्र के ज़रिये बी.आर.इशारा ने उस वक्त के
मशहूर क्रिकेटर सलीम दुर्रानी (हीरो ) के साथ परवीन बाबी( हेरोइन) को पेश
किया था, चरित्र फिल्म चेतना का सिक्वल थी. 1974 में देव साहब के साथ
प्रेम शास्त्र,1974 में दावत,बाज़ार बंद करो भी आई,1975 में सारिका और राज
किरण को फिल्म कागज़ की नाव के ज़रिये पेश किया अब तक सारिका बाल कलाकार
(मास्टर सूरज) के रूप में आती थी.राज किरण की यह पहली फिल्म थी,1978 में
राहू केतु और पल दो पल का साथ,1979 में घर की लाज,1981 खरा खोटा, कारण
कोटा और कारण रिलीज़ हुई ,1982 में लोग क्या कहेंगे ,1983 जय बाबा अमर
नाथ,1984 औरत का इंतकाम,हम दो हमारे दो,1985 सौतेला पति,1986 औरत,1987
बेसहारा,1988 वो फिर आयेगी,सिला,1994 जन्म से पहले,1996 सौतेला भाई और
हुकुमनामा,रिलीज़ हुई थी. सपन जगमोहन ने बतौर संगीतकार बी.आर.इशारा की
फिल्मों में लाज़वाब संगीत दिया, सपन जगमोहन की लाज़वाब धुनों पर मुकेश ने
कई गीत गाये, फिल्म ज़िंदगी और तूफ़ान 1975 का यह गीत एक हसरत थी की
आंचल का प्यार मिले आज भी लोकप्रिय है, बी.आर.इशारा की फिल्मों में से
ज्यादातर नए कलाकारों ने शुरुआत की ,फिल्म सन आफ इंडिया के वंडर बाल कलाकार
मास्टर साजिद को बतौर हीरो फिल्म ज़िंदगी और तूफ़ान 1975 में पेश किया,
बी.आर.इशारा ने अपनी कई फिल्मों की हेरोइन रही रेहाना सुलतान से 1984 में
शादी की थी. हिंदी फिल्मों में संवादकार,लेखक,निर्माता,निर्देशक के रूप में
दिए उनके योगदान के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा,बी.आर.इशारा की मौत
25 जुलाई 2012 को मुबई के अस्पताल में हुई
लीना
चंदावरकर ने हिंदी फिल्मों में अपनी पारी की शुरुआत सुनील दत्त की फिल्म
*मन का मीत 1968 से की थी इस फिल्म के हीरो थे सुनील दत्त के भाई सोम दत्त
1970 में सास भी कभी बहु थी,ज़वाब,हमजोली,1971 में जाने अनजाने,मैं सुन्दर
हूँ,महबूब की मेहँदी 1972 में प्रीतम,रखवाला,दिल का राजा,1973
मनचली,हनीमून,एक कुंवारा एक कुंवारी,1974 में अनहोनी,ईमान,चोर चोर, 1975
बिदाई,अपने रंग हज़ार,एक महल हो सपनो का,1976 में बैराग,
कैद,जग्गू 1977 में नामी चोर,यारों का यार,आखिरी गोली आफत, 1978 में
नालायक,1980 में ज़ालिम 1985 में सरफ़रोश में अभिनय किया, लीना चंदावरकर
की किस्मत में हर साल एक हिट लिखी थी उस दौर के हर बड़े हीरो के साथ
उन्होंने काम किया,दिलीप कुमार शम्मी कपूर,धर्मेन्द्र,राजेश खन्ना,संजीव
कुमार,विश्वजीत,विनोद खन्ना,शत्रुघन सिन्हा.लीना चंदावरकर का जन्म कर्णाटक
के धारवाड़ में 29 अगस्त 1950 को फौजी परिवार में हुआ था.Fresh Face
फिल्म फेयर कम्टीशन के ज़रिये वो लाइम लाईट में आयी 2007 में सोनी पर दिखाई
दी थी,लीना चंदावरकर का नाम रखवाला की शूटिंग के दौरान धमेद्र के साथ
जुडा,जिसे फ़िल्मी जुबां में गासिप कहा गया .लीना चंदावरकर ने अपने
फ़िल्मी करियर के चड़ते ग्राफ के बीच दिसम्बर 08 1975 को बम्बई में
सिद्धार्थ बांदोडकर के साथ शादी करे सबको चौंका दिया सिद्धार्थ गोवा के
पहले मुख्य मंत्री भाऊ साहेब बांदोडकर के बेटे थे,इस शादी को उस दौर
में फैरी टेल कहा गया था. शाशिकलाताई काकोडकर, सिद्धार्थ की बड़ी बहन थी
और वे भी गोवा की मुख्य मंत्री रही.18 दिसम्बर 1975 को सिद्धार्थ एक
हादसे का शिकार हो गये उनके अपने ही रिवाल्वर से उन्हें गोली लग गयी इस
हादसे से गोवा से लेकर दिल्ली तक तक हडकंप मच गया क्योंकी घायल होने वाला
सिद्धार्थ तब की मुख्य मंत्री का भाई था,पहले गोवा फिर बम्बई में
सिद्धार्थ का इलाज़ हुआ,कई महीने अस्पताल में रहने के बाद वो घर लौट
आये,1976 के बीच में सिद्धार्थ के जखम जो ठीक होने के बाद फिर से उभरे
लिहाजा बम्बई के जसलोक अस्पातल में उन्हें फिर से भर्ती किया गया जहाँ वो 7
नवंबर 1976 को महज़ 26 साल की उम्र में जिंदगी से जंग हर गये.इस मौत से
गोवा थम गया थासिद्धार्थ के अंतिम संस्कार वाले दिन पूरा गोवा बंद था,लोग
शामिल थे सिद्धार्थ की अंतिम यात्रा में, मुख्यमंत्री शाशिकलाताई काकोडकर
ने गोवा में सिद्धार्थ की याद में memorial stands बनवाया जो उनकी माँ
सुनंदाबाई के memorial stands के पास है. Shashikalatai has dedicated the
Siddharth Bhavan in memory of her beloved brother.लीना महज़ 26 साल की
उम्र में विधवा हो चुकी थी,हिंदी फिल्मों से दूर थी.1980 में लीना ने अपनी
उम्र से 20 साल बड़े किशोर कुमार से शादी कर और वो उनकी चौथी और आखिरी
बीबी थी,किशोर और लीना के बेटे का नाम सुमित है 13 अक्टोबर 1987 को 39 साल
की उम्र में लीना फिर विधवा हो गयी,आज कल वे सुमित और अपने सौतेले बेटे
अमित कुमार और अमित की पत्नी और अमित की माँ के साथ रह रही है.लीना को
"चाइनीज़ डौल" भी कहा जाता था .
फिल्म
साहिब बीबी और गुलाम में छोटी बहु (मीना कुमारी ) अकेलेपन से तंग आकर शराब
का सहारा लेती है ऐसा ही हुआ असलियत में उनकी ज़िन्दगी जब उन्हें सहारे की
ज़रूरत थी तब उनको सहारा नहीं मिला,मीना
कुमारी (1अगस्त,1932-31 मार्च,1972) बेमिसाल अदाकारा,जिन्हें "ट्रेजेडी
क्वीन" का खिताब मिला,मीना कुमारी का असली नाम महज़बी बानो था और ये बंबई
में पैदा हुई थीं । उनके वालिद अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के
मझे हुये कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीतकार का भी काम किया
था। उनकी वालिदा प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो),भी मशहूर नृत्यांगना
और अदाकारा थी जिनका ताल्लुक टैगोर परिवार से था। महज़बी ने पहली बार
किसी फिल्म के लिये छह साल की उम्र में काम किया था। उनका नाम मीना कुमारी
विजय भट्ट की खासी लोकप्रिय फिल्म बैजू बावरा से पड़ा। मीना कुमारी की
प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थे। मीना कुमारी के
आने के साथ भारतीय सिनेमा में नयी अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरु हुआ था
जिसमें नरगिस , निम्मी, सुचित्रा सेन और नूतन शामिल थीं। 1953 तक मीना
कुमारी की तीन सफल फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : दायरा, दो बीघा ज़मीन और
परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिये नया युग शुरु हुआ।
परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूकि
इस फिल्म में भारतीय नारियों के आम जिदगी की तकलीफ़ों का चित्रण करने की
कोशिश की गयी थी। लेकिन इसी फिल्म की वजह से उनकी छवि सिर्फ़ दुखांत
भूमिकाएँ करने वाले की होकर सीमित हो गयी। लेकिन ऐसा होने के बावज़ूद उनके
अभिनय की खास शैली और मोहक आवाज़ का जादू भारतीय दर्शकों पर हमेशा छाया
रहा। मीना कुमारी की शादी मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही के साथ हुई
जिन्होंने मीना कुमारी की कुछ मशहूर फिल्मों का निर्देशन किया था। लेकिन
स्वछंद प्रवृति की मीना अमरोही से 1964 में अलग हो गयीं। उनकी फ़िल्म
पाक़ीज़ा को और उसमें उनके रोल को आज भी सराहा जाता है । शर्मीली मीना के
बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कवियित्री भी थीं लेकिन कभी भी
उन्होंने अपनी कवितायें छपवाने की कोशिश नहीं की। उनकी लिखी कुछ उर्दू की
कवितायें नाज़ के नाम से बाद में छपी। मीना कुमारी उम्र भर एक पहेली बनी
रही महज चालीस साल की उम्र में वो मौत के मुह में चली गयी इसके लिए मीना के
इर्दगिर्द कुछ रिश्तेदार,कुछ चाहने वाले और कुछ उनकी दौलत पर नजर गढ़ाए वे
लोग हैं, जिन्हें ट्रेजेडी क्वीन की अकाल मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया जा
सकता है। मीना कुमारी को एक अभिनेत्री के रूप में, एक पत्नी के रूप में,एक
प्यासी प्रेमिका के रूप में और एक भटकती-गुमराह होती हर कदम पर धोखा खाती
स्त्री के रूप में देखना उनकी जिंदगी का सही पैमाना होगा। मीना कुमारी की
नानी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के छोटे भाई की बेटी थी, जो जवानी की दहलीज
पर कदम रखते ही प्यारेलाल नामक युवक के साथ भाग गई थीं। विधवा हो जाने पर
उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया। दो बेटे और एक बेटी को लेकर बम्बई आ गईं।
नाचने-गाने की कला में माहिर थीं इसलिए बेटी प्रभावती के साथ पारसी थिएटर
में भरती हो गईं। प्रभावती की मुलाकात थियेटर के हारमोनियम वादक मास्टर अली
बख्श से हुई। उन्होंने प्रभावती से निकाह कर उसे इकबाल बानो बना दिया। अली
बख्श से इकबाल को तीन संतान हुईं। खुर्शीद, महज़बी (मीना कुमारी) और तीसरी
महलका (माधुरी)। अली बख्श रंगीन मिजाज के व्यक्ति थे। घर की नौकरानी से
नजरें चार हुईं और खुले आम रोमांस चलने लगा। परिवार आर्थिक तंगी से गुजर
रहा था। महजबीं को मात्र चार साल की उम्र में फिल्मकार विजय भट्ट के सामने
खड़ा कर दिया गया। इस तरह बीस फिल्में महजबीं (मीना) ने बाल कलाकार के रूप
में न चाहते हुए भी की। महज़बीं को अपने पिता से नफरत सी हो गई और पुरुष का
स्वार्थी चेहरा उसके जेहन में दर्ज हो गया। फिल्म बैजू बावरा (1952) से
मीना कुमारी के नाम से मशहूर महजबीं ने अपने वालिद की इमेज को दरकिनार
करते हुए उनसे हमदर्दी जताने वाले कमाल अमरोही की शख्सियत में अपना बेहतर
आने वाला कल दिखाई दिया,वे उनके नजदीक होती चली गईं। नतीजा यह रहा कि दोनों
ने निकाह कर लिया। लेकिन यहाँ उसे कमाल साहब की दूसरी बीवी का दर्जा मिला।
उनके निकाह के इकलौते गवाह थे जीनत अमान के अब्बा अमान साहब। कमाल अमरोही
और मीना कुमारी की शादीशुदा जिंदगी करीब दस साल तक एक सपने की तरह चली। मगर
औलाद न होने की वजह से उनके ताल्लुतक में दरार आने लगी। लिहाज़ा दोनों अलग
हो गये कहते है उस रात मीना कुमारी ने जब कमाल अमरोही का घर छोड़ा था, किसी ने भी उनकी मदद नहीं की भारत भूषण,प्रदीप कुमार,राज कुमार किसी ने
भी उनका साथ नहीं दिया,पैदा होते ही वालिद अली बख्श ने रुपये के तंगी और
पहले से दो बेटियों के बोझ से घबरा कर इन्हे एक मुस्लिम अनाथ आश्रम में
छोड़ दिया था, मीना कुमारी की माँ के काफी रोने -धोने पर वे इन्हे वापस ले
आए। परिवार हो या शादीशुदा जिंदगी मीना कुमारी के हिस्से में सिर्फ
तन्हाईयाँ हीं आई,फिल्म फूल और पत्थर (1966) के हीरो ही-मैन धर्मेन्द्र से
मीना की नजदीकियाँ, बढ़ने लगीं। इस दौर तक मीना कामयाब,मशहूर व बॉक्स ऑफिस
पर सुपर हिट हीरोइन के रूप में जानी जाने लगी थी,धर्मेन्द्र का करियर
डाँवाडोल चल रहा था। उन्हें मीना का मजबूत पल्लू थामने में अपनी सफलता
महसूस होने लगी। गरम धरम ने मीना को सूनी-सपाट अंधेरी जिंदगी को एक ही-मैन
की रोशन से भर दिया। कई तरह के गॉसिप और गरमा-गरम खबरों से फिल्मी
पत्रिकाओं के पन्ने रंगे जाने लगे। इसका असर मीना-कमाल के रिश्ते पर भी
हुआ। मीना कुमारी का नाम कई लोगों से जोड़ा गया। बॉलीवुड के जानकारों के
अनुसार मीना-धर्मेन्द्र के रोमांस की खबरें हवा में बम्बई से दिल्ली तक के
आकाश में उड़ने लगी थीं। जब दिल्ली में वे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.
राधाकृष्णन से एक कार्यक्रम में मिलीं तो राष्ट्रपति ने पहला सवाल पूछ लिया
कि तुम्हारा बॉयफ्रेंड धर्मेन्द्र कैसा है? फिल्म बैजू बावरा के दौरान
भारत भूषण भी अपने प्यार का इजहार मीना कुमारी से कर चुके थे। जॉनी
(राजकुमार) को मीना कुमार से इतना इश्क हो गया कि वे मीना के साथ सेट पर
काम करते अपने डायलोग भूल जाते थे। इसी तरह फिल्मकार मेहबूब खान ने
महाराष्ट्र के गर्वनर से कमाल अमरोही का परिचय यह कहकर दिया कि ये प्रसिद्ध
स्टार मीना कुमारी के पति हैं। कमाल अमरोही यह सुन नीचे से ऊपर तक आग
बबूला हो गए थे। धर्मेन्द्र और मीना के चर्चे भी उन तक पहुँच गए थे।
उन्होंने पहला बदला धर्मेन्द्र से यह लिया कि उन्हें पाकीजा से आउट कर
दिया। उनकी जगह राजकुमार की एंट्री हो गई। कहा तो यहाँ तक जाता है कि अपनी
फिल्म रजिया सुल्तान में उन्होंने धर्मेन्द्र को रजिया के हब्शी गुलाम
प्रेमी का रोल देकर मुँह काला कर दिया था। पाकीजा फिल्म निर्माण में सत्रह
साल का समय लगा। इस देरी की वजह मीना-कमाल का अलगाव रहा। लेकिन मीना जानती
थी कि फिल्म पाकीजा कमाल साहब का कीमती सपना है। उन्होंने फिल्म बीमारी की
हालत में की। मगर तब तक उनकी लाइफ स्टाइल बदल चुकी थी। गुरुदत्त की फिल्म
साहिब, बीवी और गुलाम की छोटी बहू परदे से उतरकर मीना की असली जिंदगी में
समा गई थी। मीना कुमारी पहली हेरोइन थी,जिन्होंने बॉलीवुड में पराए मर्दों
के बीच बैठकर शराब के प्याले पर प्याले खाली किए। धर्मेन्द्र की बेवफाई ने
मीना को अकेले में भी पीने पर मजबूर किया। वे छोटी-छोटी बोतलों में शराब
भरकर पर्स में रखने लगीं। जब मौका मिला एक शीशी गटक ली। कहते है की
धर्मेन्द्र ने भी मीना कुमारी का इस्तेमाल किया उन दिनों मीना कुमारी की
तूती बोलती थी और धर्मेन्द्र नए कलाकार मीना कुमारी ने धर्मेन्द्र की हर
तरह से मदद की फूल और पत्थर की कामयाबी के धर्मेन्द्र उनसे धीरे धीरे अलग
होने लगे थे,1964 में धर्मेन्द्र की वज़ह से ही कमाल अमरोही ने मीना को
तलाक दे दिया एक बार फिर से धोका मिला मीना कुमारी को,पति का भी साथ छुड
गया और प्रेमी भी साथ छोड़ गया है धर्मेन्द्र ने कभी उनसे सच्चा प्यार नहीं
किया धर्मेन्द्र के लिए मीना तो बस एक जरिया भर थी यह बेबफाई मीना सह ना
सकी सह्राब की आदि हो चुकी मीना की मौत लीवर सिरोसिस की वज़ह से हो गयी
दादा मुनि अशोक कुमार, मीना कुमारी के साथ अनेक फिल्में कर चुके थे। एक
कलाकार का इस तरह से सरे आम मौत को गले लगाना उन्हें रास नहीं आया। वे
होमियोपैथी की छोटी गोलियाँ लेकर इलाज के लिए आगे आए। लेकिन जब मीना का यह
जवाब सुना 'दवा खाकर भी मैं जीऊँगी नहीं, यह जानती हूँ मैं। इसलिए कुछ
तम्बाकू खा लेने दो। शराब के कुछ घूँट गले के नीचे उतर जाने दो' तो वे भीतर
तक काँप गए। आखिर 1956 में मुहूर्त से शुरू हुई पाकीजा 4 फरवरी 1972 को
रिलीज हुई और 31 मार्च,1972 को मीना चल बसी। शुरूआत में पाकीज़ा को ख़ास
कामयाबी नहीं मिली मिली थी पर मीना कुमारी की मौत ने फिल्म को हिट कर दिया
तमाम बंधनों को पीछे छोड़ तनहा चल दी बादलों के पार अपने सच्चे प्रेमी की
तलाश में। पाकीजा सुपरहिट रही। अमर हो गईं ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी। मगर
अस्पताल का अंतिम बिल चुकाने लायक भी पैसे नहीं थे उस तनहा मीना कुमारी
के पास। अस्पताल का बिल अदा किया वहाँ के एक डॉक्टर ने,जो मीना का जबरदस्त
प्रशंसक था। "बैजू बावरा","परिणीता","एक ही रास्ता", शारदा"."मिस
मेरी","चार दिल चार राहें","दिल अपना और प्रीत पराई","आरती","भाभी की
चूडियाँ","मैं चुप रहूंगी","साहब बीबी और गुलाम","दिल एक
मंदिर","चित्रलेखा","काजल","फूल और पत्थर","मँझली दीदी",'मेरे अपने",पाकीजा
के किरदारों में उन्होंने जान डाल दी थी,मीना कुमारी ने 'हिन्दी सिनेमा' में
जिस मुकाम को हासिल किया वो आज भी मिसाल बना हुआ है । वो लाज़वाब अदाकारा
के साथ शायरा भी थी,अपने दिली जज्बात को उन्होंने जिस तरह कलमबंद किया
उन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है कि मानो कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों
सुईयाँ चुभो रहा हो. गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी
में दी, वह बहुत कम कलमकारों के बूते की बात होती है. गम का ये दामन शायद
'अल्लाह ताला' की वदीयत थी जैसे। तभी तो कहा उन्होंने -कहाँ अब मैं इस गम
से घबरा के जाऊँ कि यह ग़म तुम्हारी वदीयत है मुझको चाँद तन्हा है,आस्मां तन्हा दिल मिला है कहाँ -कहाँ तन्हां
बुझ गई आस, छुप गया तारा थात्थारता रहा धुआं तन्हां जिंदगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हां है और जां तन्हां हमसफ़र कोई गर मिले भी कहीं दोनों चलते रहे यहाँ तन्हां जलती -बुझती -सी रौशनी के परे सिमटा -सिमटा -सा एक मकां तन्हां राह देखा करेगा सदियों तक छोड़ जायेंगे ये मकां तन्हा टुकडे -टुकडे दिन बिता, धज्जी -धज्जी रात मिली जितना -जितना आँचल था, उतनी हीं सौगात मिली जब चाह दिल को समझे, हंसने की आवाज़ सुनी जैसा कोई कहता हो, ले फ़िर तुझको मात मिली होंठों तक आते -आते, जाने कितने रूप भरे जलती -बुझती आंखों में, सदा-सी जो बात मिली गुलज़ार साहब ने उनको एक नज़्म दिया था. लिखा था : शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना बुनती है रेशम के धागे लम्हा -लम्हा खोल रही है पत्ता -पत्ता बीन रही है एक एक सांस बजाकर सुनती है सौदायन एक -एक सांस को खोल कर आपने तन पर लिपटाती जाती है अपने ही तागों की कैदी रेशम की यह शायरा एक दिन अपने ही तागों में घुट कर मर जायेगी
जिस वक्त मीना कुमारी की हमउम्र हेरोइन पेड़ के चक्कर लगाकर प्रेम गीत गा रही
थी तब मीना कुमारी ने "मेरे अपने""गोमती के किनारे"में अपने बालों में
सफ़ेदी लगाकर बुज़ुर्ग किरदार किये थे,"दुश्मन" में वो भाभी के किरदार में
थी,जवाब में जीतेन्द्र की बड़ी बहन का किरदार बखूबी निभाया उस दौर की सभी
हीरोइनों ने यह रोल करने से मना कर दिया अपनी इमेज खराब होने का वास्ता
देकर 1971 पाकीज़ा,दुश्मन,मेरे अपने 1970 जवाब,विद्या 1967 मझली दीदी,नूरजहाँ,चन्दन का पालना,बहू बेगम 1966 फूल और पत्थर 1965 काजल,भीगी रात 1964 गज़ल,बेनज़ीर,चित्रलेखा 1963 दिल एक मन्दिर,अकेली मत जाइयो,किनारे किनारे 1962 साहिब बीबी और ग़ुलाम,मैं चुप रहूँगी,आरती 1961 प्यार का सागर,भाभी की चूड़ियाँ 1960 कोहिनूर,दिल अपना और प्रीत पराई 1959 अर्द्धांगिनी ,चार दिल चार राहें 1958 सहारा,फ़रिश्ता,यहूदी,सवेरा 1957 मिस मैरी,शारदा 1956 मेम साहिब,एक ही रास्ता,शतरंज 1955 आज़ाद,बंदिश 1954 बादबाँ 1953 परिनीता 1952 बैजू बावरा,तमाशा, 1951 सनम 1946 दुनिया एक सराय फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार 1966 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार - काजल 1963 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार - साहिब बीबी और ग़ुलाम 1955 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार - परिनीता 1954 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार - बैजू बावरा
Zarina
Wahab(17 July 1959 )Vishakapatnam, Andhra Pradesh,is an actress and
former model, who was critically acclaimed for starring roles, such as
in Chit Chor and Gopal Krishna in the 1970s. She has also appeared in
Malayalam films including the critically acclaimed Madanolsavam,
Chamaram, Palangal and Adaminte Makan Abu.Zarina was born into a Andhra
Muslim family in Vishakapatnam, Andhra Pradesh.
She is fluent in Telugu, Urdu, Hindi and English. She was trained at
Film and Television Institute of India (FTII), Pune. Zarina has three
sisters and one brother.Filmmaker Raj Kapoor was unimpressed with her
look, when he met her at FTII. So Zarina worked on her appearance and
attended film parties and events. She eventually got noticed and was
cast in films. She was usually cast as the middle-class, natural beauty.
She had a major hit film in Basu Chatterjee's Chit Chor (1976). She
earned a Filmfare nomination as Best Actress for her role in Gharonda
(1977).She has acted in Telugu, Tamil, Malayalam films, and has become
fluent in Malayalam.She made a comeback to Malayalam films with
Calendar, which released in 2009. She appeared in My Name Is Khan as the
mother of Rizwan Khan (Shah Rukh Khan's character).She prefers Telugu
films, and has encouraged her daughter Sana to start acting in a South
Indian film, the way she had in a Telugu film Gajula Kistayya (1975)
with Krishna.Sana has tried her hand at acting in 2006. Wahab currently
plays older roles in television serials.Wahab met actor Aditya Pancholi
on the sets of Kalank Ka Tika.[8] They married in 1986 and have a
daughter, Sana and son Suraj. Her husband is younger than her. News of
their turbulent marriage, her husband's temper and rumors of infidelity
have been in the gossip columns.Yet, they are still together.